मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सद्भाव के दृश्य

 भारतीय  संस्कृति में गुरु पूर्णिमा/ व्यास पूर्णिमा का बहुत महत्त्व है। समूचे भारत में यह उत्सव बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बीते रविवार को भी देशभर में गुरु पूर्णिमा उत्सव व्यापक स्तर पर मनाया गया। इस दौरान धर्म नगरी काशी से सुंदर और सार्थक चित्र सामने आए हैं। यह चित्र दो समुदायों को जोड़ने वाले हैं। बनारस में गुरु पूर्णिमा का उत्सव हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी मनाया। हिंदू उत्सवों में मुस्लिम चेहरों को देखना दुर्लभ होता है। अमूमन ईद और इफ्तार पार्टी में बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोग शामिल होते हैं। अनेक स्थानों पर इफ्तार पार्टी का आयोजन ही हिंदू समाज की ओर से किया जाता है। लेकिन, हिंदू उत्सवों में मुस्लिम सहभागिता कम ही होती है। इसलिए जब देश में कुछ समाजविरोधी तत्वों के द्वारा दोनों संप्रदायों के बीच वैमनस्य का वातावरण उत्पन्न करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है, तब इस प्रकार के दृश्य एक उम्मीद की तरह उपस्थित होते हैं। दो समुदायों को नजदीक लाते हैं। आपसी सौहार्द का निर्माण करते हैं।
          धर्म नगरी काशी में रविवार को बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग भी हिन्दू धर्म गुरुओं का आशीर्वाद लेने पहुंचे, इनमें महिलाएं भी शामिल रहीं। काशी में गुरु-शिष्य परंपरा के अनूठे समागम के लिए सुबह से ही आश्रम-मठों के बाहर लाइनें लग गईं थीं। दिन चढऩे के साथ बारिश के बावजूद भी शिष्यों की भीड़ बढ़ती गई। अघोरेश्वर भगवान अवधूत राम आश्रम से लेकर गड़वा घाट, शंकाराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के विद्या मठ के बाहर तथा आसपास इलाकों में मेले जैसा नजारा देखने को मिला। सबसे अलग पातालपुरी मठ का नजारा रहा, यहां मुस्लिम समुदाय के लोग पीठाधीश्वर महंत बालक दास का आशीर्वाद लेने पहुंचे। मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी के साथ मुस्लिम महिलाओं ने महंत बालक दास को अंगवस्त्र और गुलाब का फूल भेंट करने के साथ उनकी आरती उतारकर आशीर्वाद लिया। हनुमान चालीसा के लिए प्रसिद्ध नाजनीन ने स्वरचित 'उर्दू श्रीराम आरती' भी भेंट की, तो मो. मजीद अंसारी की अगुवाई में मुस्लिम शिष्यों ने माला पहनाकर उनका सम्मान किया। 
           इस अवसर पर महंत बालकदास ने उचित ही कहा कि रामानंद ने कबीर को शिष्य बनाकर जो परंपरा शुरू की थी, आज वही भारत की राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी बन गई है। कोई भी पीठ और धर्माचार्य को इंसानों में भेद नहीं करना चाहिए। गुरु सभी को ज्ञान देता है और ज्ञान जाति-धर्म का मोहताज नहीं है। गुरु के बिना ज्ञानी नहीं और गुरु-शिष्य के बीच धर्म-जाति का भेद नहीं हो सकता है। यही कारण है कि जब दारा शिकोह उपनिषद और भारतीय संस्कृति का ज्ञान प्राप्त करने के लिए काशी के घाट पर पहुँचते हैं, तब अनेक पंडों के विरोध के बाद भी योगीराज बाबा लालदास दारा ने उसे अपना शिष्य बनाया। 
          गुरु पूर्णिमा बाहरी तौर पर हिंदू उत्सव जरूर दिखाई देता है, लेकिन यह इस प्रकार का उत्सव है, जिसमें सब शामिल हो सकते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई गुरु होता ही है। किसी न किसी के प्रति हमारी आस्था होती ही है। हम किसी ने किसी से सीखते ही हैं। गुरु पूर्णिमा ऐसे ही श्रेष्ठ व्यक्तित्व या प्रतीक के प्रति आदर भाव प्रकट करने का अवसर होता है। इसलिए गुरु पूजन के कार्यक्रमों को हमें धर्म की दृष्टि से देखने की अपेक्षा, सामाजिक दृष्टि से देखना चाहिए। यह उत्सव अपने श्रेष्ठजनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर है। हिंदू ओर मुस्लिम दोनों मिलकर प्रेमभाव से जब उत्सव मनाएंगे, तब सामाजिक सौहार्द बढऩा स्वाभाविक ही है। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (13-07-2017) को "झूल रही हैं ममता-माया" (चर्चा अंक-2666) (चर्चा अंक-2664) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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