मंगलवार, 21 नवंबर 2017

बेटी के लिए कविता-3


भले ही तुम हो गई हो
तीन साल की।
फर्क क्या आया? 
आज भी तुम्हारी भाषा-बोली को 
हम दो लोग ही समझते हैं।

हाँ, तुम्हारा भाई भी समझने लगा है
बल्कि, कर्ई दफा 
हमसे ज्यादा वह ही तुम्हें समझता है
जैसे हम दूसरों को बताते हैं
किसी अनुवादक की तरह 
तुमने क्या बोला?
ठीक उसी तरह, कई दफा
वह हमें बताता है
तुमने क्या बोला?

चलो, अच्छा है
हम संवाद के लिए
परस्पर निर्भर हैं। 
उच्चारण स्पष्ट हो जाए
तब भी, एक-दूसरे को समझने की
परस्पर निर्भता बनी रहे। 
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ऋष्वी के जन्मदिन की तीसरी वर्षगाँठ पर... 21 नवंबर, 2017

शनिवार, 18 नवंबर 2017

कांग्रेस की दृष्टि में धर्मनिरपेक्षता अर्थात् हिंदू विरोध

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा, दीपावली पर हिंदू संत को गिरफ्तार कर लिया, परंतु क्या ईद पर मौलवी को पकडऩे का साहस किया जा सकता है?
 भारत  के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी पुस्तक 'कोअलिशन इयर्स 1996-2012' के एक अध्याय में कांग्रेस के हिंदू विरोध एजेंडे और छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर किया है। वैसे तो यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। दोनों आरोपों को लेकर कांग्रेस अकसर कठघरे में खड़ी दिखाई देती है। परंतु, जब प्रणब मुखर्जी इस संबंध में लिख रहे हैं, तब इसके मायने अलग हैं। वह खांटी कांग्रेसी नेता हैं। वह कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और अनुभवी राजनेता हैं। उन्होंने कांग्रेस को बहुत नजदीक से देखा है। कांग्रेस का उत्थान एवं पतन दोनों उनकी आँखों के सामने हुए हैं। आज कांग्र्रेस जिस गति को प्राप्त हुई है, उसके संबंध में भी उनका आकलन होगा। पूर्व राष्ट्रपति प्र्रणब मुखर्जी ने अपनी नई किताब में लिखा है- 'मैंने वर्ष 2004 में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए थे। एक कैबिनेट बैठक के दौरान मैंने गिरफ्तारी के समय को लेकर काफी नाराजगी जताई थी। मैंने पूछा था कि क्या देश में धर्मनिरपेक्षता का पैमाना केवल हिन्दू संतों महात्माओं तक ही सीमित है? क्या किसी राज्य की पुलिस किसी मुस्लिम मौलवी को ईद के मौके पर गिरफ्तार करने का साहस दिखा सकती है? ' 
          यदि इस प्रश्न के उजाले में उत्तर तलाशने का प्रयास करें तो हम पाएंगे कि सोनिया गांधी के नेतृत्व में आने के बाद से कांग्रेस तुष्टीकरण से आगे बढ़ कर हिंदू विरोधी नीति पर आ गई। यह अकेली घटना नहीं है। 1998 से अब तक ऐसे अनेक प्रकरण हमारे सामने हैं, जो सिद्ध करते हैं कि कांग्रेस के लिए धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) हिंदू विरोध का पर्याय हो गई। हालाँकि कांग्रेस की नीति प्रारंभ से ही थोड़ी-बहुत हिंदू विरोध की रही है। स्वयं को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए सदैव ही हिंदू विरोधी नीति पर चलना कांग्रेस के लिए सुविधाजनक रहा है। बहरहाल, हम 1998 के बाद की कुछ प्रमुख घटनाओं की बात करते हैं, जिन्होंने कांग्रेस की हिंदू विरोधी नीति को प्रकट किया। 1998 से 2004 तक कांग्रेस ने सत्ता में वापसी के लिए एक विशेष समुदाय को आकर्षित किया। कांग्रेस ने भरोसा दिलाया कि उनकी सरकार में विशेष समुदाय की चिंता प्राथमिकता से की जाएगी। अवसर आने पर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यह खुलकर कहा भी कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। बाटला मुठभेड़ (2008) में मारे गए दो आतंकवादियों की तस्वीर देख कर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी रो पड़ी थीं। यह बात कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने यह दावा किया था। हालाँकि बाद में कांग्रेस ने किरकिरी होने पर इस बात को खुर्शीद का निजी बयान बता दिया था। 
          बहरहाल, वर्ष 2004 में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने अपनी हिंदू विरोधी नीति का पालन प्रारंभ कर दिया। जिस प्रकरण की पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जिक्र किया है, उसकी कल्पना कभी 2004 से पहले किसी ने नहीं की थी। हिंदू बाहुल्य देश में, हिंदू समाज के सबसे बड़े संत को, हिंदुओं के सबसे बड़े त्योहारों में से एक दीपावली के दिन गिरफ्तार करने की बात क्या 2004 से पहले सपने में भी सोची जा सकती थी? परंतु, यह दुर्भाग्यपूर्ण दिन हिंदुस्थान ने देखना पड़ा। 11 नवम्बर, 2004 को हत्या के आरोप में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को आंध्रप्रदेश की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। उस समय डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री और प्रणब मुखर्जी रक्षा मंत्री थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो कुछ नहीं बोले, परंतु प्रणब मुखर्जी ने इस प्रकरण में अपनी नाराजगी प्रकट की। (जैसा कि उन्होंने अपनी पुस्तक में लिख है।) परंतु, कांग्रेस सरकार पर उनकी नाराजगी का कोई असर नहीं हुआ। उनके इस प्रश्न का उत्तर भी किसी ने नहीं दिया कि क्या ईद के दिन इसी प्रकार किसी मौलवी को गिरफ्तार करने का साहस दिखाया जा सकता है। कांग्रेस ने इस गिरफ्तारी पर तमिलनाडु सरकार से कोई सवाल नहीं पूछा और न ही किसी प्रकार का विरोध ही किया। देश में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ही विरोध प्रदर्शन किया और शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती की रिहाई की माँग की। उस समय आम समाज ने यह मान लिया था कि हिंदू धर्मगुरु की गिरफ्तारी के मामले में जयललिता की सरकार को केंद्र की संप्रग सरकार का मौन समर्थन प्राप्त है। परंतु, हिंदू प्रतिष्ठान को बदनाम करने का यह षड्यंत्र असफल साबित हुआ। न्यायालय ने शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती एवं अन्य पर लगे सभी आरोप खारिज कर दिए। 
         बाद में, 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' शब्द देकर कांग्रेस ने हिंदू विरोधी छवि को और अधिक पुष्ट किया। मालेगाँव और समझौता एक्सप्रेस विस्फोट में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि हिंदू आतंकवादी हो गए हैं। हालाँकि, कांग्रेस अपनी इस अवधारणा को कभी सिद्ध नहीं कर पाई। हिंदू आतंकवाद को सिद्ध करने के लिए उसने जो षड्यंत्र रचे थे, अब उनसे भी पर्दा उठ रहा है। देश यह जानकर स्तब्ध है कि कैसे इस्लामिक आतंकवाद का बचाव करने के लिए कांग्रेस के नेताओं ने 'भगवा' जैसे पवित्र रंग-शब्द को आतंकवाद से जोडऩे के लिए गहरी साजिशें रचीं। भारतीयता की पहचान 'भगवा' पर कालिख पोतने का प्रयास किया गया। आज भी देश में एक वर्ग भगवा शब्द का उपयोग हिंदुओं को गाली देने के लिए करता है। जाँच एजेंसियों पर दबाव बनाया गया कि वह ऐसी कहानी और तथ्य गढ़ें, जिनसे हिंदू आतंकवाद की थिअरी को सिद्ध किया जा सके। परंतु, हम सब जानते हैं कि झूठ के पाँव नहीं होते हैं। इसलिए उनका यह झूठ अधिक दूर तक चल नहीं सका।  
          वर्ष 2007 में रामसेतु प्रकरण में भी यही हुआ। भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाले रामसेतु को तोड़ने की जिद कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने ठान ली थी। हिंदू समाज के तीव्र विरोध को भी दरकिनार कर कांग्रेस सरकार रामसेतु को तोडऩे के लिए आतुर दिखाई दे रही थी। लोकतंत्र में जनभावनाओं की अनदेखी और दुराग्रह के लिए कोई स्थान नहीं होता है। चूँकि आस्थाओं का प्रश्न हिंदू समाज का था, इसलिए सरकार को परवाह नहीं थी। जबकि इसी देश में दूसरे मत-संप्रदायों के विरोध पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय भी संसद मे पलट दिए गए। हद तो तब हो गई, जब 'सेतु' को तोडऩे पर उतावली कांग्रेस ने 'राम' पर ही चोट कर दी। कांग्रेस ने न्यायालय में हलफनामा देकर कहा कि राम का कोई अस्तित्व नहीं है। राम एक काल्पनिक पात्र हैं। यह राम के अस्तित्व पर और करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट नहीं थी, तो क्या थी? यह कांग्रेस के हिंदू विरोधी स्वभाव का प्रकटीकरण ही तो था। राम इस देश का इतिहास ही नहीं, अपितु पहचान भी है। कांग्रेस ने उसी पहचान को मिटाने का दुस्साहस किया था।  
          कांग्रेस ने वर्ष 2011 में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के नाम पर ऐसा कानून बनाने का प्रयास किया था, जिसकी चक्की में हर हाल में हिंदू समाज को ही पिसना था, भले ही वह सांप्रदायिक हिंसा के लिए दोषी हो या नहीं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी की सलाहकार परिषद ने 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-2011' का मसौदा तैयार किया था। सोनिया गाँधी की इस परिषद में ज्यादातर हिंदू विरोधी व्यक्ति शामिल थे। यह कानून भी हिंदुओं के दमन के लिए तैयार कराया गया था और इस काम में परिषद के ज्यादातर सदस्य माहिर थे। उन्होंने ऐसा मसौदा तैयार किया, जो अगर लागू हो जाता, तब प्रत्येक सांप्रदायिक दंगे के लिए हिंदू को दोषी बनाया जाता। भाजपा, आरएसएस और हिंदू समाज ने इस विधेयक का इतना विरोध किया कि कांग्रेस को इसे ठण्डे बस्ते में डालना पड़ा। 
          यह कुछेक प्रकरण हैं, ऐसे और भी प्रकरण हैं। एक लेख में सबकी चर्चा करना संभव नहीं। कांग्रेस के हिंदू विरोधी व्यवहार को देख कर ही देश की जनता ने वर्ष 2014 में उसे मात्र 44 सीटों पर समेट दिया और बाद में राज्यों से भी विदा कर दिया। वर्ष 2014 की ऐतिहासिक और शर्मनाक पराजय के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता (ईसाई) एके एंटनी ने भी पराजय के कारणों की समीक्षा में माना कि 'हिंदू विरोधी छवि के कारण यह दुर्गति हुई है। तुष्टीकरण की नीति पर चलते-चलते कांग्रेस की जो हिंदू विरोध छवि बन गई है, उससे उसे मुक्त होना होगा।' परंतु, कांग्रेस ने इस रिपोर्ट को नहीं माना और वह बदस्तूर हिंदू विरोध की नीति पर चल रही है। हाल में पशुओं को बचाने के केंद्र सरकार के आदेश का विरोध करने के लिए कांग्रेस ने वीभत्स तरीका अपनाया। केरल में कांग्रेस ने खुलेआम हिंदू आस्था की प्रतीक गाय का गला काटा और चौराहे पर खड़े होकर गौमाँस खाया एवं वितरित किया। सोनिया गाँधी के बेटे एवं कांग्रेस के उपाध्यक्ष (जल्द ही अध्यक्ष होंगे) राहुल गाँधी भी अपने बयानों से बार-बार हिंदू समाज को लक्षित करते हैं। ऐसे अनेक अवसर समय-समय पर आते हैं, जब कांग्रेस स्पष्टतौर पर हिंदू विरोधी पाले में खड़ी नजर आती है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल होने के नाते कांग्रेस को भी विचार करना चाहिए कि 'धर्मनिरपेक्षता' के नाम पर वह जिस प्रकार का व्यवहार करती है, क्या वह देशहित में है?
      (पांचजन्य, १२ नवम्बर, २०१७ में प्रकाशित लेख)


रविवार, 5 नवंबर 2017

हिंदी मीडिया के चर्चित चेहरों से मुलाकात कराती किताब

 हम  जिन्हें प्रतिदिन न्यूज चैनल पर बहस करते-कराते देखते हैं। खबरें प्रस्तुत करते हुए देखते हैं। अखबारों और पत्रिकाओं में जिनके नाम से प्रकाशित खबरों और आलेखों को पढ़कर हमारा मानस बनता है। मीडिया गुरु और लेखक संजय द्विवेदी की किताब 'हिंदी मीडिया के हीरो' पत्रकारिता के उन चेहरों और नामों को जानने-समझने का मौका उपलब्ध कराती है। किताब में देश के 101 मीडिया दिग्गजों की सफलता की कहानी है। किन परिस्थितियों में उन्होंने अपनी पत्रकारिता शुरू की? कैसे-कैसे सफलता की सीढिय़ां चढ़ते गए? उनका व्यक्तिगत जीवन कैसा है? टेलीविजन पर तेजतर्रार नजर आने वाले पत्रकार असल जिन्दगी में कैसे हैं? उनके बारे में दूसरे दिग्गज क्या सोचते हैं? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब यह किताब देती है। किताब को पढ़ते वक्त आपको महसूस होगा कि आप अपने चहेते मीडिया हीरो को नजदीक से जान पा रहे हैं। यह किताब पत्रकारिता के छात्रों सहित उन तमाम युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो आगे बढऩा चाहते हैं। पुस्तक में जमीन से आसमान तक पहुंचने की कई कहानियां हैं। पत्रकारों का संघर्ष प्रेरित करता है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे युवाओं को यह भी समझने का अवसर किताब उपलब्ध कराती है कि मीडिया में डटे रहने के लिए कितनी तैयारी लगती है। इस तरह के शीर्षक से कोई सामग्री किताब में नहीं है, यह सब तो अनजाने और अनायस ही पत्रकारों के जीवन को पढ़ते हुए आपको जानने को मिलेगा।

सोमवार, 30 अक्तूबर 2017

जम्मू-कश्मीर पर कांग्रेस का अलगाववादी सुर

 कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर पर भारत विरोधी टिप्पणी करके अपनी पार्टी को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पर चिदंबरम का बयान अलगाववादियों और पाकिस्तानियों की बयानबाजी की श्रेणी का है। यदि चिदंबरम का नाम छिपा कर किसी से भी यह पूछा जाए कि जम्मू-कश्मीर की आजादी का नारा कौन लगाता है, तब निश्चित ही उत्तर में अलगाववादियों और पाकिस्तानी नेताओं का नाम ही आएंगे। प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का नाम भी अनेक लोग ले सकते हैं। कांग्रेस के शीर्ष श्रेणी के नेता पी. चिदंबरम ने बीते शनिवार को कहा था कि जब कश्मीरी कहें आजादी तो समझिए स्वायत्तता। उन्होंने कहा कि 'कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 का अक्षरश: सम्मान करने की मांग की जाती है। इसका मतलब है कि वो अधिक स्वायत्तता चाहते हैं। चिदंबरम का यह बयान भारतीय हित को नुकसान पहुँचाता है।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

गौ-हत्यारों एवं तस्करों के विरुद्ध कब मुखर होंगे हम

 गौरक्षा  के नाम पर पिछले समय में हुई कुछ हिंसक घटनाओं पर देश का तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग एवं मीडिया काफी मुखर रहा है। रहना भी चाहिए। संविधान एवं कानून के दायरे से बाहर जाकर गौरक्षा हो भी नहीं सकती। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं भी गौरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा का विरोध कर चुके हैं। इसके बाद भी कथित बुद्धिजीवी एवं पत्रकारों ने हिंसा की घटनाओं को आधार बना कर गौरक्षा जैसे पुनीत कार्य और सभी गौरक्षकों को लांछित करने का प्रयास किया है। इसके लिए वह असहिष्णुता, मॉबलिंचिंग और नॉटइनमायनेम जैसी मुहिम चला चुके हैं। परंतु, उनकी प्रत्येक मुहिम संदेहास्पद रही है। उनके प्रत्येक आंदोलन का उद्देश्य और एजेंडा भेदभावपूर्ण रहा है, इसलिए उन्हें सफलता नहीं मिली।

गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

अयोध्या की दीपावली

 दीपावली  भारत का प्रमुख पर्व है। त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन के बाद दीपावली मनाई गई थी। श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर और अत्याचारी रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे। समूची अयोध्या उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। कार्तिक अमावस्या के अंधेरे को दूर करने के लिए प्रत्येक अयोध्यावासी ने अपने राजा राम के लिए देहरी-देहरी दीप जलाए थे। अयोध्या जग-मग हो उठी थी। तभी से पूरे देश में दीपावली मनाई जाती रही है। परंतु, दु:ख की बात है कि राम जिस देश की आत्मा हैं, उसी देश में उनके साथ न्याय नहीं हो रहा है। पहले राम के जन्मस्थल पर बने मंदिर को ध्वस्त कर वहाँ विधर्मियों और आक्रांताओं ने मस्जिद तामीर करा दी थी। अब वहाँ मस्जिद तो नहीं है, परंतु मंदिर भी नहीं है। अपने ही घर में राम तंबू में हैं। सहिष्णु और उदार हिंदू समाज न्याय के मंदिर की ओर अपेक्षा से देख रहा है। उसे न्याय की प्रतीक्षा है। केन्द्र और राज्य में सरकार बदलने से जनमानस में एक भरोसा पैदा हुआ है। सरकार की ओर से भी मंदिर निर्माण पर सकारात्मक संकेत दिए जा रहे हैं। हालाँकि, सभी पहले न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

सेवागाथा डॉट ओआरजी : सेवा के अनुपम और अनुकरणीय प्रयासों का पता

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है। वह समाज के उत्थान के लिए कार्यरत है। लगभग 92 वर्षों की यात्रा में संघ ने समाज में व्यापक स्थान बनाया है। आरएसएस के संबंध में अकसर उसके ही कार्यकर्ता कहते हैं कि संघ में आए बिना संघ को समझा नहीं जा सकता। वास्तविकता भी यही है। संघ विरोधियों और संकीर्ण राजनेताओं के कारण संघ की चर्चा राजनीतिक गलियारे में अधिक होती है, जबकि राजनीति से संघ का लेना-देना बहुत अधिक नहीं है। संघ तो समाज के बाकि क्षेत्रों में अधिक सक्रिय है। सेवा का क्षेत्र भी ऐसा ही है। भला कितने सामान्य नागरिक जानते होंगे कि पूरे देश में आरएसएस के स्वयंसेवक एक लाख 70 हजार से अधिक नियमित सेवा कार्य चलाते हैं। यह सब काम संघ बिना किसी प्रचार के करता है। 'प्रसिद्धि परांगमुखता' संघ का सिद्धाँत है। संघ के लिए सेवा उपकार या पुण्यकार्य की भावना से किया जाने वाला कार्य नहीं है, बल्कि यह तो स्वयंसेवकों के लिए 'करणीय कार्य' है। किंतु, समय की आवश्यकता है कि समाज में यह भरोसा पैदा किया जाए कि देश में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो रचनात्मक, सकारात्मक और सृजनात्मक कार्यों में संलग्न हैं। देश का वातावरण ऐसा है कि अच्छाई का प्रचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि अच्छे कार्यों में और लोग जुटें।

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

संघ के प्रति दुष्प्रचार कांग्रेस का एकमात्र ध्येय

कल्पना परुलेकर को मिली सजा से नहीं लिया सबक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद गुड्डू ने आरएसएस को बदनाम करने फेसबुक पर साझा किया फर्जी चित्र
यह फर्जी फोटो है,
असली फोटो लेख के आखिर में देखें
 राजनीति  में अपने विरोधियों को घेरने के लिए झूठ और तथ्यहीन जानकारियों का उपयोग अमर्यादित ढंग से करने की प्रवृत्ति में बढ़ गई है। यह प्रवृत्ति स्वच्छ राजनीति के लिहाज से कतई अच्छी नहीं है। विरोध करना और अपने विरोधी को घेरना अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसके लिए झूठ का सहारा लेकर उनकी छवि बिगाड़ना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में राजनेताओं, पार्टियों और संगठनों ने संज्ञान लेना प्रारंभ किया है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 में कांग्रेस की तत्कालीन विधायक कल्पना परुलेकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी तस्वीर का उपयोग किया था। पिछले दिनों ही कांग्रेस की पूर्व विधायक कल्पना परुलेकर को फर्जी फोटो के मामले में न्यायालय ने सजा सुनाई है। किंतु लगाता है कि कांग्रेस के नेता अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि कल्पना परुलेकर को मिली सजा से सबक न लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी फोटो का सहारा लिया है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सलामी देते हुए स्वयंसेवकों का फोटो साझा किया है। यह दो फोटो को मर्फ करके बनाया गया फर्जी फोटो है, जो एबीपी न्यूज चैनल के वायरल सच कार्यक्रम में भी झूठा साबित हो चुका है। संघ के इंदौर विभाग के प्रचार प्रमुख सागर चौकसे ने इस मामले में प्रेमचंद गुड्डू और अन्य के विरुद्ध हीरा नगर थाने (इंदौर) में शिकायत दर्ज कराई है। इसके साथ ही इंदौर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक और इंदौर के पुलिस अधीक्षक को त्वरित कार्रवाई के लिए ज्ञापन दिया है। हालाँकि, पुलिस में शिकायत के बाद और अपने झूठ की पोल खुलने पर कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने फर्जी फोटो और आपत्तिजनक संदेश अपने फेसबुक पेज से हटा लिया है।

शनिवार, 30 सितंबर 2017

सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास


विजयादशमी उत्सव के उद्बोधन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि निर्भयतापूर्वक सज्जनशक्ति को आगे आना होगा, समाज को निर्भय, सजग और प्रबुद्ध बनना होगा
 विश्व  के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी उत्सव का बहुत महत्त्व है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर ही संघ की स्थापना स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। विजयादशमी के अवसर पर होने वाला सरसंघचालक का उद्बोधन देश-दुनिया में भारतवंदना में रत स्वयंसेवकों के लिए पाथेय का काम करता है। इस उद्बोधन से संघ की वर्तमान नीति भी स्पष्ट होती है, इसलिए स्वयंसेवकों के अलावा बाकी अन्य लोग भी सरसंघचालक के उद्बोधन को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इस दशहरे पर संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में महत्त्वपूर्ण विषयों पर संघ के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। अपने इस उद्बोधन में उन्होंने समाज की सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास किया है। समाज में सज्जन लोगों का प्रतिशत और उनकी शक्ति अधिक है, लेकिन महावीर हनुमान की तरह समाज को अपनी सज्जनशक्ति का स्मरण नहीं है। रामकथा में माता सीता की खोज पर निकले हनुमान सहित अन्य वीर जब समुद्र के विस्तार को देखते हैं, तब उनका उत्साह कम हो जाता है। तब जामवन्त ने हनुमान को उनके पराक्रम से परिचित कराया था। जब पराक्रमी हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण होता है, तब 100 योजन विशाल समुद्र भी उनके मार्ग में बाधा नहीं बन सका। जब समाज की सज्जनशक्ति को अपने बल का परिचय प्राप्त हो जाएगा, तब भारत को विश्वगुरु की खोयी हुई प्रतिष्ठा प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता। 

शनिवार, 23 सितंबर 2017

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना

 माननीय  न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले मं  तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा - 'सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?' इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है, लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नक्सली हिंसा पर खामोशी

 देश  में असहिष्णुता और हिंसा पर आजकल बहुत बहस हो रही है। विशेषकर, जब किसी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े या विशेष समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, तब असहिष्णुता का भूत अचानक से प्रकट होता है। जबकि अन्य हत्याओं पर न हमें असहिष्णुता दिखाई देती है और नहीं किसी प्रकार हमारे माथे पर बल पड़ता है। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में हिंदू समाज के साथ हो रही ज्यादती भी असहिष्णुता की श्रेणी में नहीं आती है और केरल में एक के बाद एक राष्ट्रीय विचारधारा से संबंद्ध व्यक्तियों की हत्याएं भी हमें विचलित नहीं करती हैं। नक्सली हिंसा पर तो तमाम बुद्धिजीवी गजब की खामोशी साध जाते हैं। अनेक अवसर पर तो प्रसन्नता भी जाहिर करते हैं। नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या के दौरान अपने यह कम्युनिस्टों को जश्न मनाते देखा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता, लेखक एवं पत्रकार नक्सलियों की हिंसा का बचाव करते दिखते हैं। जबकि यह खूंखार किस्म के असहिष्णु हैं। कम्युनिस्ट नक्सलियों का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से दोनों सहोदर हैं। नक्सलियों की बर्बरता को देखकर इन्हें किसी भी प्रकार आतंकवादियों से कमतर नहीं माना जा सकता। बीते रविवार झारखंड के गुमला में पति-पत्नी को गोलियों से भूनकर इस बात को सिद्ध कर दिया है।

रोहिंग्या मुद्दे पर सरकार का पक्ष राष्ट्रहित में

कश्मीरी पंडितों को उनकी भूमि और न्याय दिलाये बिना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना, अपने लोगों के साथ बेईमानी है. ये लोग वर्षों से तम्बू में सो रहे हैं, पहले इनके लिए आवाज़ बुलंद करो.
 यह  सुखद है कि राष्ट्रहित में वर्तमान सरकार कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारें प्रत्येक मामले को पहले वोट की तराजू पर तोलती थीं और उस वजन के आधार पर निर्णय करती थीं। जबकि वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर अपने निर्णयों से बताया है कि उसके लिए राष्ट्रहित सबसे पहले है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सरकार ने अनेक प्रकार की आलोचनाओं की चिंता न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपना स्पष्ट पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने बीते सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से रोहिंग्या मुद्दे पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें प्रत्यर्पित करने का निर्णय सरकार का नीतिगत फैसला है। केंद्र सरकार ने बिना लाग-लपेट के कह दिया है कि उनमें से कुछ का संबंध पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों से है। 
          शीर्ष न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष जानना चाहा, तब केंद्र सरकार ने अपना उक्त पक्ष रखा और कहा कि यह देश हित में लिया गया एक 'आवश्यक कार्यकारी' फैसला है। केंद्र सरकार का कहना गलत नहीं है कि कई रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध आतंकवादी समूहों से है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। घोर शांतिप्रिय बौद्ध बाहुल्य देश म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय को लेकर जिस प्रकार का वातावरण बना है, वह भी इस ओर इशारा करता है। शरणार्थियों को आश्रय नहीं देने और संप्रग सरकार के समय में आ चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के निर्णय की आलोचना करने से पहले हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि आखिर वह कौन-से कारण हैं कि इस्लामिक देश भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए तैयार नहीं है।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

पतन का प्रतीक अमर्यादित भाषा

 विरोध  की भाषा बताती है कि वह कितना नैतिक है और कितना अनैतिक। जब विरोधी भाषा की मर्यादा को त्याग कर गली-चौराहे की भाषा में बात करने लगें, समझिए कि उनका विरोध खोखला है। उनका विरोध चिढ़ में बदल चुका है। अपशब्दों का उपयोग करने वाला व्यक्ति भीतर से घृणा और नफरत से भरा होता है। वह पूरी तरह कुंठित हो चुका होता है। अमर्यादित भाषा से वह अपने भीतर की कुंठा को ही प्रकट करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की भाषा में उपरोक्त स्थिति दिखाई देती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके एवं वर्तमान में कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों जिस प्रकार के अपशब्दों का उपयोग देश के प्रधानमंत्री के लिए किया था, उसी परिपाटी को अब वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने आगे बढ़ाया है। शब्द इस प्रकार के हैं कि उनका सार्वजनिक उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। मनीष तिवारी ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस के नेता किस स्तर तक नरेन्द्र मोदी के प्रति घृणा का भाव रखते हैं।

सोमवार, 18 सितंबर 2017

अफसरी से बाहर आओ अल्फोंस साहब

 'भूखे  तो नहीं मर रहे हैं ना, इसलिए चुकाइए टैक्स।' केंद्रीय पर्यटन मंत्री अल्फोंस कन्ननथम का यह कथन बताता है कि वह मंत्री तो बन गए हैं, लेकिन अभी उनकी अफसरी नहीं छूटी है। उनके इस कथन से यह भी साबित होता है कि वह देश-समाज की वास्तविकता से परिचत नहीं हैं। उन्हें भारतीय जनमानस की समझ भी नहीं है। उनकी राजनीतिक समझ भी शून्य है। अन्यथा इस प्रकार का बयान नहीं देते। चूँकि वह एक नेता के रूप में जनता के बीच कभी रहे नहीं, सीधे मंत्री बने हैं, इसलिए उन्हें नहीं पता कि इस प्रकार के बयान जनता के मन पर क्या असर छोड़ते हैं और पार्टी को अनर्गल बयानों का क्या नुकसान उठाना पड़ता है। यह पहली बार नहीं है जब अल्फोंस अपने कथन से स्वयं तो विवाद में आए ही, बल्कि भाजपा के सामने भी संकट खड़ा किया है। इससे पूर्व मंत्री बनने के तत्काल बाद ही वह अनावश्यक रूप से बीफ के विषय में भी बोल चुके हैं।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी की अस्मिता का प्रश्न

 सर्वसमावेशी  भाषा होना हिन्दी का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। हिन्दी ने बड़ी सहजता और सरलता से, समय के साथ चलते हुए कई बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने आंचल में समेट लिया है। पहले से ही समृद्ध हिन्दी का शब्द भण्डार और अधिक समृद्ध हो गया है। हिन्दी को कभी भी अन्य भाषाओं के शब्दों से परहेज नहीं रहा। भारतीय भाषाएं तो उसकी अपनी सगी बहनें हैं, उनके साथ तो हिन्दी का लेन-देन स्वाभाविक ही है। लेकिन, हिन्दी ने बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी बिना किसी फेरबदल के, उनके स्वाभाविक सौंदर्य के साथ स्वीकार किया है। वास्तव में, हिन्दी जीवंत भाषा है। वह समय के साथ बही है, कहीं ठहरी नहीं। जीवंत भाषाएं शब्दों की छुआछूत नहीं मानती हैं। शब्द जिधर से भी आए, हिन्दी ने आत्मसात कर लिए। शब्दों का आना, हिन्दी के आंचल में जगह पाना, स्वाभाविक और स्वत: था, तब तक तो ठीक था लेकिन, जब से बाहरी भाषाओं के शब्दों को हिन्दी के आंचल में जबरन ठेला जाने लगा है, अस्वाभाविक हो गया है। यह हिन्दी की अस्मिता का प्रश्न बन गया है। ऐसी स्थिति में प्रश्र यह रह ही नहीं जाता है- 'हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रचलन हिन्दी के लिए आशीर्वाद है या अभिशाप? '

नये भारत में वंशवाद को स्थान नहीं

 अमेरिका  के बर्कले विश्वविद्यालय में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ओर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा का प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने एक बार फिर अपनी अपरिपक्वता को जाहिर किया है। वंशवाद पर राहुल गांधी का बयान बताता है कि उन्हें देश के जनमानस की कतई समझ नहीं है। अब राजा-महाराजाओं का जमाना नहीं है। यह लोकतंत्र है। लोकतंत्र में कोई भी समझदार व्यक्ति वंशवाद का समर्थक नहीं होता। लोकतंत्र और वंशवाद परस्पर विरोधाभासी हैं। नये भारत में तो वंशवाद के लिए किंचित भी स्थान नहीं है। वंशवाद के समर्थन में राहुल गांधी ने जिनके नाम बताए, उन्हें भी समाज की स्वीकृति नहीं है। अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश की जनता ने अस्वीकार कर दिया। अभिषेक बच्चन भी अपने पिता, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के प्रभाव के बाद भी भारतीय सिनेमा में स्थान नहीं बना पाए हैं। 'बच्चन' उपनाम होने के बाद भी अभिषेक को सिनेप्रेमियों ने नकार दिया है। अर्थात् राहुल गांधी के वंशवाद के गुब्बारे की हवा तो खुद ही निकाल ली। उनका स्वयं का उदाहरण भी इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि देश की जनता वंशवाद के नाम पर हर किसी को सहन करने के लिए तैयार नहीं है।

रविवार, 10 सितंबर 2017

गौरी लंकेश हत्याकांड : जवाब माँगते कुछ सवाल

गौरी लंकेश क्या लिखती थीं, उसका बहुत छोटा उदहारण है यह
 लोकतंत्र  और सभ्य समाज में हत्या के लिए किंचित भी स्थान नहीं है। किसी भी व्यक्ति की हत्या मानवता के लिए कलंक है। चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो या फिर लेखक, पत्रकार और राजनीतिक दल का कार्यकर्ता। हत्या और हत्यारों का विरोध ही किया जाना चाहिए। लोकतंत्र किसी भी प्रकार तानाशाही या साम्यवादी शासन व्यवस्था नहीं है, जहाँ विरोधी को खोज-खोज कर खत्म किया जाए। लोकतंत्र में वामपंथी कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या का विरोध ही किया जा सकता है, समर्थन नहीं। किंतु, जिस तरह से लंकेश की हत्या के तुरंत बाद पूरे देश में एक सुर से भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व को हत्यारा ठहराया गया, क्या यह उचित है? यह पत्रकारिता का धर्म तो कतई नहीं है। अनुमान के आधार पर निर्णय सुनाना कहाँ जायज है? पत्रकारों को तथ्यों के प्रकाश में अपने सवाल उछालने चाहिए। पत्रकारों का यह काम नहीं है कि न्यायाधीश बन कर या बिना जाँच-पड़ताल तत्काल किसी मामले में निर्णय सुना दें। आखिर किस आधार पर पत्रकारों ने एक सुर में भाजपा और आरएसएस को लंकेश की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया और देश में राष्ट्रीय विचारधारा के प्रति घृणा का वातावरण बनाने का प्रयास किया? क्या सिर्फ इसलिए कि वह कम्युनिस्टों की घोर समर्थक थीं और स्वयं को कॉमरेड कहती थीं? क्या सिर्फ इसलिए कि गौरी लंकेश अपने फेसबुक-ट्वीटर अकांउट और अपनी पत्रिका 'लंकेश पत्रिके' में ज्यादातर भाजपा, आरएसएस एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लिखती थीं?

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

गौरी लंकेश हत्याकाण्ड : विरोध या सियासत

 वामपंथी  पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद देश में जिस प्रकार का वातावरण बनाया गया है, वह आश्चर्यचकित करता है। नि:संदेह हत्या का विरोध किया जाना चाहिए। सामान्य व्यक्ति की हत्या भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। समवेत स्वर में हत्याओं का विरोध किया जाना चाहिए। लेकिन, गौरी लंकेश की हत्या के बाद उठ रही विरोध की आवाजों से पत्रकार की हत्या के विरुद्ध आक्रोश कम वैचारिक राजनीति का शोर अधिक आ रहा है। आप आगे पढ़े, उससे पहले एक बार फिर दोहरा देता हूं कि सभ्य समाज में हत्याएं कलंक से अधिक कुछ नहीं। हत्या की निंदा ही की जा सकती है और हत्यारों के लिए कड़ी सजा की माँग। बहरहाल, लंकेश की हत्या के तत्काल बाद, बिना किसी जाँच पड़ताल के किसी राजनीतिक दल और सामाजिक-वैचारिक संगठन को हत्यारा ठहरा देने की प्रवृत्ति को क्या उचित कहा जा सकता है? पत्रकार और लेखक बिरादरी के लोग इस प्रकार के निर्णय देंगे, तब विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही इस बिरादरी के प्रति अविश्वास का वातावरण और अधिक गहराएगा। इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप राजनीतिक कार्यकर्ता भी नहीं लगाते। भारत में असहमति के स्तर को हम कितना नीचे ले जाना चाहते हैं? बिना किसी पड़ताल के हम कैसे इस निर्णय पर पहुँच सकते हैं कि गौरी लंकेश की हत्या उनके लिखने-पढ़ने और बोलने के कारण हुई है। क्या हत्या के और कोई कारण नहीं हो सकते? यदि हम लंकेश के भाई को सुने, तब हत्या के दूसरे कारण भी नजर आएंगे। उनके भाई ने तो हत्या में नक्सलियों के शामिल होने का संदेह जताया है।

रविवार, 3 सितंबर 2017

संस्कार की पाठशाला हैं महिलाएं एवं बुजुर्ग

हिन्दू गर्जना में प्रकाशित लेख
 भारतीय  परंपरा में परिवार व्यवस्था अद्धितीय है। हम जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति की पहली गुरु माँ और पहली पाठशाला परिवार होता है। परिवार संस्कार की पाठशाला है। परिवार में व्यक्ति का सामाजिक शिक्षण होता है। यहाँ हम जीवनमूल्य सीखते हैं। भारतीयता की धुरी परिवार अपने ढंग से मनुष्य को त्याग, सहयोग, सम्मान, दुलार, आत्मीयता, कर्तव्य और अनुशासन इत्यादि का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन, हमारा दुर्भाग्य है कि विरासत में प्राप्त अपनी सबसे बड़ी और सुघड़ रचना को हम छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। हम अपने शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र को ध्वस्त करने में व्यस्त हैं। आज समाज में हम मानवीयता का जो अवमूल्यन देख रहे हैं, उसका सबसे बड़ा कारण है परिवार व्यवस्था का कमजोर होना। जब हम भारत के प्राचीन इतिहास के पन्ने पलटने बैठते हैं, तब हमें ध्यान आता है कि हमारे यहाँ महिलाओं और बुजुर्गों का अत्यधिक सम्मान था। उनका अपमान तो बहुत दूर की बात थी, उनकी अनदेखी भी संभव नहीं थी। घर में उनका शीर्ष स्थान था। उनकी देखरेख में ही परिवार का संचालन होता था। लेकिन, आज इस प्रकार के परिवार की कल्पना भी मुश्किल है। हालाँकि हमारी परिवार व्यवस्था कमजोर जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हमारी संस्कृति की ताकत है कि वह अनेक झंझावात सहकर भी अपने संस्कारों को बचाते हुए गतिमान है।

शनिवार, 19 अगस्त 2017

नाम बदलने से दिक्कत कब होती है और कब नहीं

 उत्तरप्रदेश  के प्रमुख रेलवे स्टेशन 'मुगलसराय' का नाम भारतीय विचारक 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय' के नाम पर क्या रखा गया, प्रदेश के गैर-भाजपा दलों को ही नहीं, अपितु देशभर में तथाकथित सेकुलर बुद्धिवादियों को भी विरोध करने का दौरा पड़ गया है। मौजूदा समय में केंद्र सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध करना ही अपना धर्म समझने वाले गैर-भाजपा दल और कथित बुद्धिवादी अपने थके हुए तर्कों के सहारे भाजपा की नीयत को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। साथ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा को भी लपेटने का प्रयास कर रहे हैं। 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन' के विरोध में दिए जा रहे तर्क विरोधियों की मानसिकता और उनके वैचारिक अंधत्व को प्रदर्शित करते हैं। उनका कहना है कि भारतीय जनता पार्टी 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' को थोप रही है और इसके लिए वह मुगल संस्कृति को मिटाने का काम कर रही है। मुस्लिम समाज में भाजपा के लिए नफरत और अपने लिए प्रेम उत्पन्न करने के लिए विरोधी यह भी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि भाजपा की विचारधारा मुस्लिम विरोधी है, इसलिए चिह्नित करके मुस्लिम नामों को मिटाया जा रहा है। बड़े उत्साहित होकर वह यह भी पूछ रहे हैं कि भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का योगदान क्या है? मजेदार बात यह है कि कांग्रेस, कम्युनिस्ट या दूसरे दलों की सरकारें जब नाम बदलती हैं, तब इस तरह के प्रश्न नहीं उठते। सबको पीड़ा उसी समय होती है, जब भाजपा सरकार नाम बदलती है। भारतीय राजनीति की थोड़ी-बहुत समझ रखने वाला व्यक्ति भी बता सकता है कि मुगलसराय स्टेशन का नाम बदलने पर लगाए जा रहे आरोप और पूछे जा रहे प्रश्न, बचकाने और अपरिपक्व हैं।

सोमवार, 14 अगस्त 2017

दु:खद है बच्चों की मौत

 गोरखपुर  के बाबा राघव दास (बीआरडी) मेडिकल कॉलेज में छह दिनों के भीतर 60 से ज्यादा बच्चों की मौत हमारी अव्यवस्थाओं की सच्चाई है। एक ओर हम आजादी की 71वीं वर्षगाँठ मनाने की तैयारियां कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे बच्चे मर रहे हैं। बच्चों की जिंदगी इस तरह जाया होना, हमारे लिए कलंक है। देश में बीमारी या अभावों के कारण एक भी बच्चे की मृत्यु '70 साल के आजाद भारत' के लिए चिंता की बात है। किसी भी प्रकार का तर्क हमें बच्चों की मौत की जिम्मेदारी से नहीं बचा सकता। अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी से या फिर किसी बीमारी से ही क्यों न हो, इस तरह बच्चों या किसी भी उम्र के व्यक्ति की मौत हो जाना, बहुत दु:खद और दर्दनाक है। गोरखपुर की इस घटना ने देश को हिला कर रख दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चाहिए कि बच्चों की मौत के मामले पर मन में पूरी संवेदनशीलता रखें और व्यवहार में कठोरता। संवेदनशीलता, बच्चों और उनके परिवार के प्रति। कठोरता, लापरवाह और भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति। दोषियों को दण्डित करना जरूरी है। वरना कभी न कभी फिर से हम पर दु:खों का पहाड़ टूटेगा।

रविवार, 13 अगस्त 2017

वैचारिक संघर्ष नहीं, केरल में है लाल आतंक

राजेश के शरीर पर 83 घाव बताते हैं कि केरल में किस तरह लाल आतंक हावी है, केरल में दिखाई नहीं देता क़ानून का राज

 केरल  पूरी तरह से कम्युनिस्ट विचारधारा के 'प्रैक्टिकल' की प्रयोगशाला बन गया है। केरल में जिस तरह से वैचारिक असहमतियों को खत्म किया जा रहा है, वह एक तरह से कम्युनिस्ट विचार के असल व्यवहार का प्रदर्शन है। केरल में जब से कम्युनिस्ट सत्ता में आए हैं, तब से कानून का राज अनुपस्थिति दिखाई दे रहा है। जिस तरह चिह्नित करके राष्ट्रीय विचार के साथ जुड़े लोगों की हत्याएं की जा रही हैं, उसे देख कर यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि केरल में जंगलराज आ गया है। लाल आतंक अपने चरम की ओर बढ़ रहा है। 'ईश्वर का घर' किसी बूचडख़ाने में तब्दील होता जा रहा है। 29 जुलाई को एक बार फिर गुण्डों की भीड़ ने घेरकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राजेश की हत्या कर दी। हिंसक भीड़ ने पहले 34 वर्षीय राजेश की हॉकी स्टिक से क्रूरता पिटाई की और फिर उनका हाथ काट दिया। राजेश तकरीबन 20 मिनट तक सड़क पर तड़पते रहे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, किंतु उनका जीवन नहीं बचाया जा सका। राजेश के शरीर पर 83 घाव बताते हैं कि कितनी नृशंता से उनकी हत्या की गई।

शनिवार, 12 अगस्त 2017

अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं हो पाए हामिद साहब

दैनिक समाचार पत्र राजएक्सप्रेस में प्रकाशित
 निवर्तमान  उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जाते-जाते ऐसी बातें कह गए, जो संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को नहीं कहनी चाहिए थी और यदि कहना जरूरी ही था तो कम से कम उस ढंग से नहीं कहना था, जिस अंदाज में उन्होंने कहा। असहिष्णुता के मुद्दे पर किस प्रकार 'बड़ी और गंभीर' बात कहना, इसके लिए उन्हें पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के भाषणों को सुनना/पढऩा चाहिए था। असहिष्णुता के मुद्दे पर पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी ने भी अनेक अवसर पर अपनी बात रखी, लेकिन उनकी बात में अलगाव का भाव कभी नहीं दिखा। जबकि हामिद साहब के अतार्किक बयान के बाद उपजा विवाद बता रहा है कि उनके कथन से देश को बुरा लगा है। यकीनन जब कोई झूठा आरोप लगाता है तब बुरा तो लगता ही है, गुस्सा भी आता है। राज्यसभा टीवी को दिए साक्षात्कार को देख-सुन कर सामान्य व्यक्ति को भी यह समझने में मुश्किल हो रही है कि आखिर किस दृष्टिकोण से भारत में मुस्लिम असुरक्षित हैं। जब भी किसी ने मुस्लिमों के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी की है, तब उसके विरोध में सबसे अधिक आवाज देश के बहुसंख्यक समाज की ओर से उठी हैं। मुसलमान भी किसी इस्लामिक देश की अपेक्षा भारत में अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। वे पाकिस्तान जाने की अपेक्षा भारत में ही रहना पसंद करते हैं। भारत में जितनी आजादी मुसलमानों को है, क्या उतनी कहीं और है? मान सकते हैं कि लोकतंत्र की सफलता इस बात से तय होती होगी कि वहाँ अल्पसंख्यक कितने सुरक्षित हैं? हामिद साहब भारत में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं है, बल्कि सफलताएं भी अर्जित कर रहे हैं। भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मुस्लिम शीर्ष तक पहुँचे हैं। लोकप्रियता अर्जित की है। राजनीति के क्षेत्र में भी अपना नेतृत्व दिया है। हामिद अंसारी साहब का परिवार और वे स्वयं भी भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। दूसरे अल्पसंख्यक समुदाय भी पूरे आनंद के साथ भारत-भूमि पर जीवन जी रहे हैं। उपराष्ट्रपति जैसे पद को सुशोभित करने वाले और उच्च शिक्षित व्यक्ति को ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए, जिससे देश के विभिन्न समुदायों में नकारात्मक भाव उत्पन्न हों। उन्हें मुस्लिम समाज को प्रेरित और सकारात्मकता की ओर अग्रेषित करने का प्रयास करना चाहिए था। जाते-जाते बड़प्पन दिखाना चाहिए था। बतौर उपराष्ट्रपति अपने अंतिम वक्तव्य में सकारात्मक बात कहनी चाहिए थी।

शनिवार, 5 अगस्त 2017

पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' जरूरी

 मौजूदा  दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समाचार माध्यमों को लेकर आम समाज का इस प्रकार चर्चा करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए ठीक नहीं है। कोई समाचार माध्यम जब किसी विचारधारा के साथ नत्थी कर दिया जाता है, जब उसकी खबरों के प्रति दर्शकों/पाठकों में एक पूर्वाग्रह रहता है। वह समाचार माध्यम कितनी ही सत्य खबर प्रकाशित/प्रसारित करे, समाज उसे संदेह की दृष्टि से देखेगा। समाचार माध्यमों को न तो किसी विचारधारा के प्रति अंधभक्त होना चाहिए और न ही अंध विरोधी। हालांकि यह भी सर्वमान्य तर्क है कि तटस्थता सिर्फ सिद्धांत ही है। निष्पक्ष रहना संभव नहीं है। हालांकि भारत में पत्रकारिता का एक सुदीर्घ सुनहरा इतिहास रहा है, जिसके अनेक पन्नों पर दर्ज है कि पत्रकारिता पक्षधरिता नहीं है। निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है। कलम का जनता के पक्ष में चलना ही उसकी सार्थकता है। बहरहाल, यदि किसी के लिए निष्पक्षता संभव नहीं भी हो तो न सही। भारत में पत्रकारिता का एक इतिहास पक्षधरता का भी है। इसलिए भारतीय समाज को यह पक्षधरता भी स्वीकार्य है लेकिन, उसमें राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती नहीं होनी चाहिए। किसी का पक्ष लेते समय और विपरीत विचार पर कलम तानते समय इतना जरूर ध्यान रखें कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा पर आँच न आए। हमारी कलम से निकल बहने वाली पत्रकारिता की धारा भारतीय स्वाभिमान, सम्मान और सुरक्षा के विरुद्ध न हो। कहने का अभिप्राय इतना-सा है कि हमारी पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' का भाव जागृत होना चाहिए। वर्तमान पत्रकारिता में इस भाव की अनुपस्थिति दिखाई दे रही है। हिंदी के पहले समाचार पत्र उदंत मार्तंड का ध्येय वाक्य था- 'हिंदुस्थानियों के हित के हेत'। अर्थात् देशवासियों का हित-साधन। वास्तव में यही पत्रकारिता का राष्ट्रीय स्वरूप है। राष्ट्रवादी पत्रकारिता कुछ और नहीं, यही ध्येय है। राष्ट्र सबसे पहले का असल अर्थ भी यही है कि देशवासियों के हित का ध्यान रखा जाए।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

'जय श्री राम' पर फतवा

 भारत  में 'जय श्री राम' कहने पर फतवे जारी होने लगें, तब यह विचार जरूर करना चाहिए कि क्या देश में सब कुछ ठीक चल रहा है? सभी मत-पंथ के प्रवर्तक यह दावा करते हैं कि उनका पंथ सर्व-धर्म सद्भाव की सीख देता है। प्रत्येक संप्रदाय के रहनुमा कहते हैं कि उनके पंथ की प्राथमिक शिक्षाओं में शामिल है कि औरों के धर्म का सम्मान करना चाहिए। अगर इस्लाम के संबंध में भी यह सच है, तब प्रश्न उठता है कि 'जय श्री राम' बोलने वाले बिहार सरकार के मंत्री खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी होना चाहिए था या फिर खुर्शीद आलम के खिलाफ फतवा जारी करने वाले मुफ्ती सोहेल कासमी का बहिष्कार होना चाहिए था? मुफ्ती फतवा जारी करने तक ही नहीं रुका है, बल्कि उसने कहा है कि राम और रहीम एक साथ नहीं रह सकते। यह कैसी अलगाववादी सोच को प्रस्तुत कर रहे हैं? क्या कुरान में यह लिखा है कि दो विभिन्न विचार एक-दूसरे के साथ एक-दूसरे का सम्मान करते हुए नहीं रह सकते?

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

मॉब लिंचिंग और उसका सच

 मौजूदा  समय में विपक्ष मुद्दा विहीन और भ्रमित दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि बीते सोमवार को संसद में 'मॉब लिंचिंग' जैसे बनावटी मुद्दे पर सरकार को घेरने का असफल प्रयास कांग्रेस ने किया। निश्चित ही भीड द्वारा की जा रही घटनाएं सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं हैं। इनकी निंदा की जानी चाहिए और इस प्रवृत्ति पर कठोरता से कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन, यह जिम्मेदारी किसकी है? क्या केंद्र सरकार 'मॉब लिंचिंग' की घटनाओं के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है? क्या यह राज्यों की कानून व्यवस्था से जुड़ा मसला नहीं है? राज्यों के मामले में केंद्र सरकार का दखल देना क्या उचित होगा? यह भी देखना होगा कि 'मॉब लिंचिंग' की घटनाएं अभी अचानक होने लगी हैं या फिर इस प्रकार की घटनाओं का अपना इतिहास है? जब कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े ने मॉब लिंचिंग के मुद्दे को संसद में उठाया, तब उनसे सत्ता पक्ष ने इसी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर चाहे। स्वाभाविक ही कांग्रेस के पास उक्त प्रश्नों के उत्तर नहीं थे।

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

राष्ट्रगीत के सम्मान में न्यायालय का निर्णय

 भारतीय  संविधान में 'वंदेमातरम्' को राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' के समकक्ष राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा ने 'वन्देमातरम्' गीत को देश का राष्ट्रगीत घोषित करने का निर्णय लिया था। यह अलग बात है कि यह निर्णय आसानी से नहीं हुआ था। संविधान सभा में जब बहुमत की इच्छा की अनदेखी कर वंदेमातरम् को राष्ट्रगान के दर्जे से दरकिनार किया गया, तब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वंदेमातरम् की महत्ता को ध्यान में रखते हुए 'राष्ट्रगीत' के रूप में इसकी घोषणा की। बंगाल के कांतल पाडा गाँव में 7 नवंबर, 1976 को रचा गया यह गीत 1896 में कोलकाता में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार गाया गया। गीत के भाव ऐसे थे कि राष्ट्रऋषि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का लिखा 'वंदेमातरम्' स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिवीरों का मंत्र बन गया था। 1905 में जब अंग्रेज बंगाल के विभाजन का षड्यंत्र रच रहे थे, तब वंदेमातरम् ही इस विभाजन और ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बुलंद नारा बन गया था। रविन्द्र नाथ ठाकुर ने स्वयं कई सभाओं में वंदेमातरम् गाकर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध जन सामान्य को आंदोलित किया। 

मंगलवार, 25 जुलाई 2017

चीन और कम्युनिस्टों की भाषा एक-सी

 पिछले  कुछ समय से भारत और चीन के साथ सीमा विवाद गहराया हुआ है। दरअसल, चीन की विस्तावादी नीति के मार्ग में भारत मजबूती के साथ खड़ा हो गया है। चीन सिक्कम क्षेत्र के डोकलाम क्षेत्र में सड़क बनाना चाहता है, जिस पर भारत को बहुत आपत्ति है। यह क्षेत्र भारत, भूटान और चीन को आपस में जोड़ता है। यह स्थल सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भूटान भी चीन की विस्तारवादी मानसिकता का डटकर विरोध कर रहा है। बहरहाल, सीमा पर भारत के सख्त और स्पष्ट रुख से चीन का मीडिया बौखला गया है। चीनी मीडिया लगातार भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है। चीनी मीडिया ने पहले भारत को 1962 के युद्ध की धौंस दिखाते हुए गीदड़ भभकी दी। चीनी मीडिया ने सोचा था कि भारत उसकी धमकी से डर जाएगा और उसके मार्ग से हट जाएगा। सीमा पर उसको मनमर्जी करने देगा। लेकिन, चीन की यह गीदड़ भभकी किसी काम नहीं आई। उसके बाद भी चीनी मीडिया भारत के संदर्भ में अनर्गल लिखता रहा। लेकिन, अभी हाल में चीनी मीडिया में जिस तरह की टिप्पणी आई है, वह चौंकाने वाली है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है- ''भारत में उभर रहे 'हिंदू राष्ट्रवाद' की वजह से भारत-चीन के बीच युद्ध हो सकता है। राष्ट्रवादी उत्साह में 1962 के युद्ध के बाद से ही चीन के खिलाफ बदला लेने की मांग भारत के भीतर उठ रही है। प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी को चुने जाने से देश में राष्ट्रवादी भावनाओं को बढ़ावा मिला है।''

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

कितना आसान है हिंदुत्व का अपमान

 अपनी  ही भूमि पर हिंदुत्व का अपमान आसानी से किया जा सकता है, इस बात को एक बार फिर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता नरेश अग्रवाल ने सिद्ध कर दिया। राज्यसभा में बुधवार को उन्होंने हिंदुओं के भगवान राम, माता जानकी और भगवान विष्णु को लेकर अमर्यादित टिप्पणी कर दी। गली-चौराहे के नेता की तरह बोलते हुए उन्होंने हिंदुओं की आस्था के केंद्र राम, माता जानकी और विष्णु को शराब से जोड़ दिया। उनकी टिप्पणी सरासर हिंदुत्व का अपमान है। क्या यह सीधे तौर पर हिंदू आस्थाओं पर चोट नहीं है? बिना विचार किए कही गई अपनी इस टिप्पणी को लेकर नरेश अग्रवाल को तनिक भी अफसोस नहीं हुआ। उन्हें कतई यह नहीं लगा कि उन्होंने देश की बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने अग्रवाल के बयान पर आपत्ति जताते हुए उनसे माफी की माँग की तब उन्होंने साफ-तौर पर इनकार कर दिया। बाद में, बे-मन से कहा कि अगर उनकी टिप्पणी से किसी की भावना को ठेस पहुंची है, तो वह उसे वापस लेते हैं। स्पष्ट है कि उन्हें अपनी गलती के लिए कोई मलाल नहीं था।

बुधवार, 19 जुलाई 2017

एक राष्ट्र-एक ध्वज की कल्पना के विरुद्ध है कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की मंशा

 कर्नाटक  की कांग्रेस सरकार राज्य के लिए अलग झंडा बनाने की ओर बढ़ रही है। उसने कर्नाटक का ध्वज तय करने के लिए नौ सदस्यों की एक समिति भी गठित कर दी है। यह समिति झंडा का आकल्पन और उसके संवैधानिक पहलुओं की पड़ताल करेगी। फिलहाल तो केंद्र सरकार ने संविधान का हवाला देकर कर्नाटक के एम. सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की गैरजरूरी माँग को ठुकरा दिया है। राज्य के लिए अलग ध्वज की माँग न केवल बेतुकी है, बल्कि यह अलगाव और विभेद की भावना को उत्पन्न करने वाला अविवेक से भरा कदम भी है। हमने देखा है कि हिंदी भाषा के समानांतर भारतीय भाषाओं की अस्मिता के प्रश्न जब राजनीतिक दृष्टिकोण से उठाए गए, तब भारतीय भाषाओं का आपसी सौहार्द कैसे द्वेष में बदल गया?

रविवार, 16 जुलाई 2017

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-2

तुष्टीकरण की आग में जल रहे हैं पश्चिम बंगाल के हिंदू

कबीर चबूतरा में लेखक लोकेन्द्र सिंह
 रामकृष्ण  परमहंस, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस और रविन्द्र नाथ ठाकुर की जन्मभूमि पश्चिम बंगाल आज सांप्रदायिकता की आग में जल रही है। वहाँ हिंदू समुदाय का जीना मुहाल हो गया है। यह स्थितियाँ अचानक नहीं बनी हैं। बल्कि सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल में हिंदू समाज को हाशिए पर धकेला गया है। यह काम पहले कम्युनिस्ट सरकार की सरपरस्ती में संचालित हुआ और अब ममता बनर्जी की सरकार चार कदम आगे निकल गई है। आज परिणाम यह है कि पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में हिंदू अल्पसंख्यक ही नहीं हुआ है, अपितु कई क्षेत्र हिंदू विहीन हो चुके हैं। राजनीतिक दलों की देखरेख में बांग्लादेशी मुस्लिमों ने सीमावर्ती हिस्सों में जो घुसपैठ की जा रही है, उसके भयावह परिणामों की आहट अब सुनाई देने लगी है। मालदा, उत्तरी परगना, मुर्शिदाबाद और दिनाजपुर जैसे इलाकों में जब चाहे समुदाय विशेष हंगामा खड़ा कर देता है। घर-दुकानें जला दी जाती हैं। थाना फूंकने में भी उग्रवादी भीड़ को हिचक नहीं होती है। दुर्गा पूजा की शोभायात्राओं को रोक दिया जाता है। पश्चिम बंगाल की यह स्थिति बताती है कि सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से समृद्ध यह राज्य सांप्रदायिकता एवं तुष्टीकरण की आग में जल रहा है।  सांप्रदायिकता की इस आग से अब पश्चिम बंगाल का हिंदू झुलस रहा है। अपने उदारवादी स्वभाव के कारण इस प्रकार के षड्यंत्रों को अनदेखा करने वाले हिंदू समाज का मानस अब बदल रहा है। भविष्य में पश्चिम बंगाल में इस बदलाव के परिणाम दिखाई दे सकते हैं। आप इस संस्मरण से भी समझ सकते हैं कि कैसे पश्चिम बंगाल का हिंदू जाग रहा है। उसे अपने हित-अहित दिखाई देने लगे हैं।

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-1

मार्क्स और लेनिन को पढ़ने वाला, 
लिख-गा रहा है नर्मदा के गीत

धूनी-पानी में उदासीन संत रामदास जी महाराज के साथ लोकेन्द्र सिंह
  ऐसा  कहा जाता है- 'जो जवानी में कम्युनिस्ट न हो, समझो उसके पास दिल नहीं और जो बुढ़ापे तक कम्युनिस्ट रह जाए, समझो उसके पास दिमाग नहीं।' यह कहना कितना उचित है और कितना नहीं, यह विमर्श का अलग विषय है। हालाँकि मैं यह नहीं मानता, क्योंकि मुझे तो जवानी में भी कम्युनिज्म आकर्षित नहीं कर सका। उसका कारण है कि संसार की बेहतरी के लिए कम्युनिज्म से ज्यादा बेहतर मार्ग हमारी भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में दिखाया गया है। कोई व्यक्ति जवानी में कम्युनिस्ट क्यों होता और बाद में उससे विमुख क्यों हो जाता है? इसके पीछे का कारण बड़ा स्पष्ट है। एक समय में देश के लगभग सभी शिक्षा संस्थानों में कम्युनिस्टों की घुसपैठ थी, उनका वर्चस्व था। यह स्थिति अब भी ज्यादा नहीं बदली है। जब कोई युवा उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालयों में आता है, तब वहाँ कम्युनिस्ट शिक्षक उसके निर्मल मन-मस्तिष्क में कम्युनिज्म का बीज रोपकर रोज उसको सींचते हैं। बचपन से वह जिन सामाजिक मूल्यों के साथ बड़ा हुआ, जिन परंपराओं का पालन करने में उसे आनंद आया, माँ के साथ मंदिर में आने-जाने से भगवान के जिन भजनों में उसका मन रमता था, लेकिन जब उसके दिमाग में कम्युनिज्म विचारधारा का बीज अंकुरित होकर आकार लेने लगता है, तब वह इन्हीं सबसे घृणा की हद तक नफरत करने लगता है। इस हकीकत को समझने के लिए फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 'बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम' को देखा जा सकता है। बहरहाल, जब वह नौजवान महाविद्यालय से निकलकर असल जिंदगी में आता है, तब उसे कम्युनिज्म की सब अवधारणाएं खोखलीं और अव्यवहारिक लगने लगती हैं। कॉलेज में दिए जा रहे कम्युनिज्म के 'डोज' की जकडऩ से यहाँ उसके विवेक को आजादी मिलती है। उसका विवेक जागृत होता है, वह स्वतंत्रता के साथ विचार करता है। परिणाम यह होता है कि कुछ समय पहले जो विचार क्रांति के लिए उसकी रगों में उबाल ला रहा था, अब उस विचार से उसे बेरुखी हो जाती है। वह विचारधारा उसे मृत प्रतीत होती है। यानी विवेक जागृत होने पर कम्युनिज्म का भूत उतर जाता है। 

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

सद्भाव के दृश्य

 भारतीय  संस्कृति में गुरु पूर्णिमा/ व्यास पूर्णिमा का बहुत महत्त्व है। समूचे भारत में यह उत्सव बहुत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बीते रविवार को भी देशभर में गुरु पूर्णिमा उत्सव व्यापक स्तर पर मनाया गया। इस दौरान धर्म नगरी काशी से सुंदर और सार्थक चित्र सामने आए हैं। यह चित्र दो समुदायों को जोड़ने वाले हैं। बनारस में गुरु पूर्णिमा का उत्सव हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी मनाया। हिंदू उत्सवों में मुस्लिम चेहरों को देखना दुर्लभ होता है। अमूमन ईद और इफ्तार पार्टी में बड़ी संख्या में हिंदू समाज के लोग शामिल होते हैं। अनेक स्थानों पर इफ्तार पार्टी का आयोजन ही हिंदू समाज की ओर से किया जाता है। लेकिन, हिंदू उत्सवों में मुस्लिम सहभागिता कम ही होती है। इसलिए जब देश में कुछ समाजविरोधी तत्वों के द्वारा दोनों संप्रदायों के बीच वैमनस्य का वातावरण उत्पन्न करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है, तब इस प्रकार के दृश्य एक उम्मीद की तरह उपस्थित होते हैं। दो समुदायों को नजदीक लाते हैं। आपसी सौहार्द का निर्माण करते हैं।

शनिवार, 8 जुलाई 2017

भारतीय योद्धाओं के बलिदान ने लिखी इजरायल की आजादी की इबारत

 पराजय  का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने बड़ी सफाई से भारतीय योद्धाओं की अकल्पनीय विजयों को इतिहास के पन्नों पर दर्ज नहीं होने दिया। शारीरिक तौर पर मरने के बाद जी उठने वाले देश इजरायल की आजादी के संघर्ष को जब हम देखेंगे, तब हम पाएंगे कि यहूदियों को 'ईश्वर के प्यारे राष्ट्र' का पहला हिस्सा भारतीय योद्धाओं ने जीतकर दिया था। वर्ष 1918 में हाइफा के युद्ध में भारत के अनेक योद्धाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। समुद्र तटीय शहर हाइफा की मुक्ति से ही आधुनिक इजरायल के निर्माण की नींव पड़ी थी। इसलिए हाइफा युद्ध में भारतीय सैनिकों के प्राणोत्सर्ग को यहूदी आज भी स्मरण करते हैं। इजरायल की सरकार आज तक हाइफा, यरुशलेम, रामलेह और ख्यात के समुद्री तटों पर बनी 900 भारतीय सैनिकों की समाधियों की अच्छी तरह देखरेख करती है। इजरायल के बच्चों को इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भारतीय सैनिकों के शौर्य और पराक्रम की कहानियाँ पढ़ाई जाती हैं। प्रत्येक वर्ष 23 सितंबर को भारतीय योद्धाओं को सम्मान देने के लिए हाइफा के महापौर, इजरायल की जनता और भारतीय दूतावास के लोग एकत्र होकर हाइफा दिवस मनाते हैं। जहाँ, एक तरफ हमारे लिए गौरव की बात है कि इजरायल के लोग भारतीय योद्धाओं के बलिदान को अब तक सम्मान दे रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर दु:ख की बात है कि अपने ही देश भारत में इस महान जीत के नायकों के शौर्य के किस्से पढ़ाये और सुनाये नहीं जाते हैं। हालाँकि भारतीय सेना जरूर 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है। अब हम समझ सकते हैं कि भारत और इजरायल के रिश्तों में सार्वजनिक दूरी के बाद भी जो गर्माहट बनी रही, वह भारतीय सैनिकों रक्त की गर्मी से है।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

साहित्य में आचार्य सब होते हैं, 'काका' एक ही हैं

 साहित्य  में सबके अपने आचार्य और गुरु होते हैं, जिनसे हम सीखते हैं और अपने रचना कर्म को आगे बढ़ाते हैं। हम जिसके सान्निध्य में साहित्य का अध्ययन करते हैं, अमूमन वह कोई प्रख्यात साहित्यकार या फिर हमारा ही कोई प्रिय लेखक या कवि होता। इनके अपने नियम और कायदे-कानून होते हैं। इनके अपने नाज और नखरे भी होते हैं। यह सरल और सहज 'काका' नहीं हो सकते। क्योंकि, काका एक ही हैं-श्रीधर पराडकर। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य परिषद के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री श्रीधर पराडकर देश के प्रख्यात साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। हम सब उन्हें प्रेम से 'काका' कहते हैं और वे हैं भी हम सबके काका। साहित्य का ककहरा सीख रहे हम लोगों पर काका अपार स्नेह बरसाते हैं। काका श्रीधर पराडकर का व्यक्तित्व आकर्षक है। वे सात्विक ऊर्जा के स्रोत भी हैं। किसी कहानी की रचना के दौरान यदि आप बहुत उलझ गए हैं और उस उलझन से मन बहुत थकान महसूस कर रहा है, उस स्थिति में यदि आप काका के पास पहुँच जाएं, तब निश्चित ही आप सुकून पाएंगे। सात्विक ऊर्जा से भर उठेंगे। उनके चेहरे पर सदैव बनी रहने वाली बाल-सुलभ मुस्कान आपका भी तनाव खत्म कर देगी। उनके व्यक्तित्व का आकर्षण ऐसा है कि जो एक बार उनके संपर्क में आता है, हमेशा के लिए उनका होकर रह जाता है।

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

मध्यप्रदेश में पौधारोपण का विश्व कीर्तिमान

 प्रकृति  के बिना मनुष्य के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। जल-जंगल के बिना जन का जीवन संभव है क्या? साधारण बुद्धि का व्यक्ति भी इस प्रश्न का उत्तर जानता है। लेकिन, लालच से वशीभूत आदमी प्रकृति का संवर्द्धन करने की जगह निरंतर उसका शोषण कर रहा है। हालाँकि वास्तविकता यही है कि वह प्रकृति को चोट नहीं पहुँचा रहा है, वरन स्वयं के जीवन के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न कर रहा है। देर से ही सही अब दुनिया को यह बात समझ आने लगी है। पर्यावरण बचाने के लिए दुनिया में चल रहा चिंतन इस बात का प्रमाण है। भारत जैसे प्रकृति पूजक देश में भी पर्यावरण पर गंभीर संकट खड़े हैं। प्रमुख नदियों का अस्तित्व संकट में है। जंगल साफ हो रहे हैं। पानी का संकट है। हवा प्रदूषित है। वन्य जीवों का जीवन खतरे में आ गया है। पर्यावरण बचाने की दिशा में गैर-सरकारी संगठन और पर्यावरणविद् एवं प्रेमी व्यक्तिगत स्तर पर कुछ प्रयास कर रहे हैं। लम्बे संघर्ष के बाद उनके प्रयासों का परिणाम दिखाई भी दिया है। पर्यावरण के मसले पर समाज जाग्रत हुआ है। प्रकृति के प्रति लोगों को अपने कर्तव्य याद आ रहे हैं। पर्यावरण चिंतकों की ईमानदार आवाजों का ही परिणाम है कि सरकारों ने भी 'वोटबैंक की पॉलिटिक्स' के नजरिए से शुष्क क्षेत्र पर्यावरण पर गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया है।

रविवार, 2 जुलाई 2017

मोदी राजनीति का दस्तावेज 'मोदी युग'

 यह  मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि हमारे समय में भारतीय राजनीति के केंद्र बिन्दु नरेन्द्र मोदी हैं। राजनीतिक विमर्श उनसे शुरू होकर उन पर ही खत्म हो रहा है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से लेकर बाकि राजनीतिक दलों की राजनीतिक रणनीति में नरेन्द्र मोदी प्राथमिक तत्व हैं। विधानसभा के चुनाव हों या फिर नगरीय निकायों के चुनाव, भाजपा मोदी नाम का दोहन करने की योजना बनाती है, जबकि दूसरी पार्टियां मोदी की काट तलाशती हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक जहाँ प्रत्येक सफलता को नरेन्द्र मोदी के प्रभाव और योजना से जोड़कर देखते हैं, वहीं मोदी आलोचक (विरोधी) प्रत्येक नकारात्मक घटना के पीछे मोदी को प्रमुख कारक मानते हैं। इसलिए जब राजनीतिक विश्लेषक संजय द्विवेदी भारतीय राजनीति के वर्तमान समय को 'मोदी युग' लिख रहे हैं, तब वह कोई अतिशयोक्ति नहीं है। अपनी नई पुस्तक 'मोदी युग : संसदीय लोकतंत्र का नया अध्याय' में उन्होंने वर्तमान समय को उचित ही संज्ञा दी है। ध्यान कीजिए, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) और कांग्रेसनीत केंद्र सरकार को कब और कितना 'मनमोहन सरकार' कहा जाता था? उसे तो संप्रग के अंग्रेजी नाम 'यूनाइटेड प्रोगेसिव अलाइंस' के संक्षिप्त नाम 'यूपीए सरकार' से ही जाना जाता था। इसलिए जब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और भाजपानीत सरकार को 'मोदी सरकार' कहा जा रहा है, तब कहाँ संदेह रह जाता है कि भारतीय राजनीति यह वक्त 'मोदीमय' है। हमें यह भी निसंकोच स्वीकार कर लेना चाहिए कि आने वाला समय नेहरू, इंदिरा और अटल युग की तरह मोदी युग को याद करेगा। यह समय भारतीय राजनीति की किताब के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज हो रहा है। भारतीय राजनीति में इस समय को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। इसलिए 'मोदीयुग' पर आई राजनीतिक चिंतक संजय द्विवेदी की किताब महत्वपूर्ण है और उसका अध्ययन किया जाना चाहिए।

गुरुवार, 29 जून 2017

हिंदू उत्पीड़न पर जागे मानवाधिकार

 पाकिस्तान,  बांग्लादेश और मलेशिया में रह रहे हिंदुओं पर आई रिपोर्ट बताती है कि कैसे दुनिया के कई हिस्सों में हिंदुओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। उन्हें सामाजिक, आर्थिक और मानसिक उत्पीडऩ का सामना करना पड़ रहा है। खासकर, पाकिस्तान और बांग्लादेश से हिंदू उत्पीडऩ की घटनाएं अधिक सामने आती हैं। यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इन देशों के कट्टरपंथियों की नजर में हिंदुओं को जीने का अधिकार भी नहीं है। यहाँ हिंदू आबादी में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। हिंदुओं की हत्या और उनका धर्मांतरण यहाँ के कट्टरपंथी मुस्लिमों के लिए एक तरह से नेकी का काम है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में सिलसिलेवार ढंग से हिंदुओं की हत्या की जाती रही है। नाबालिग लड़कियों का अपहरण करके उनसे जबरन निकाह किया जाता है। हिंदुओं को बरगला कर और दबाव डाल कर उनका धर्मांतरण किया जाता है। अभी कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान के थार जिले में एक नाबालिग हिंदू लड़की का कथित तौर पर अपहरण करके उसका धर्मांतरण करा दिया गया। यह प्रमाणित सच है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की जनसंख्या के आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं कि वहाँ देश के बँटवारे के बाद से ही हिंदुओं को नारकीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है।

शनिवार, 24 जून 2017

पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वाले लोग कौन हैं?

 आईसीसी  चैंपियंस ट्रॉफी में भारत पर पाकिस्तान की जीत के बाद जम्मू-कश्मीर में ही नहीं, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में जश्न मनाया गया, पाकिस्तानी झंडे फहराए गए और पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे बुलंद किए गए।  पाकिस्तान की जीत पर आतिशबाजी भी की गई। भारत की हार पर पटाखों का यह शोर और पाकिस्तान की जय-जयकार किस बात का प्रकटीकरण है? आखिर भारत में कोई पाकिस्तान से इतनी मोहब्बत कैसे कर सकता है कि उसका विजयोत्सव मनाए? पाकिस्तान परस्त चंद लोगों की यह प्रवृत्ति एक पूरे समुदाय की निष्ठा और देशभक्ति पर प्रश्न चिह्न खड़ा करती है। दुनिया का कोई हिस्सा ऐसा नहीं होगा, जहाँ अपने देश की पराजय पर हर्ष व्यक्त किया जाता हो। भारत में पाकिस्तान परस्ती मानसिकता को परास्त करने की आवश्यकता है। पाकिस्तान की जय-जयकार करने वाले देशद्रोहियों को उनकी सही जगह दिखाने की आवश्यकता है। सुखद बात है कि पाकिस्तान की जीत पर जश्न मनाने वालों को पकड़कर जेल की हवा खिलाई जा रही है। सबसे पहले मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के मोहद गाँव से 15 युवकों को पकड़ा गया, जो पाकिस्तान की जीत के बाद उन्माद फैला रहे थे। देश में अन्य जगहों पर भी धरपकड़ जारी है। कर्नाटक के कोडागू जिले से तीन लोगों को पकड़ा गया है। उत्तराखंड के मसूरी में भी पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाने वाले तीन किशोरों को पकड़ा गया है। पाकिस्तान परस्त मानसिकता को हतोत्साहित करने के लिए इस प्रकार की कार्रवाई स्वागत योग्य है। यकीनन समाजकंटकों में कानून का डर होना चाहिए। देशविरोधियों को ऐसा सबक सिखाया जाना चाहिए कि देश को पीड़ा पहुँचाने की हरकत करने से पहले वह दस बार सोचें। दरअसल, इस प्रकार की प्रवृत्ति का दमन इसलिए भी आवश्यक है ताकि दो समुदायों के बीच बढ़ रही खाई की चौड़ाई को रोका जा सके।

बुधवार, 21 जून 2017

रामनाथ कोविंद : कम्युनिस्टों के दलित प्रेम का पर्दाफाश

 बिहार  के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम को सामने कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने एकबार फिर से सबको चौंका दिया है। सबके कयास धरे रह गए। भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक के पहले रामनाथ कोविंद का नाम किसी तरह की चर्चा में भी नहीं था। लेकिन, जब भाजपा की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की गई, तब विपक्ष मुश्किल में पड़ गया। अपने फैसले से सबको चौंकाने वाली मोदी-शाह की जोड़ी ने एक बार फिर से इस मुद्दे पर विरोधियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। इस दांव से सब हैरान हैं, शायद इस पर भाजपा विरोधियों को विरोध करना इतना आसान नहीं होगा। हालाँकि, समाज को बाँटने वाली विचारधारा के 'झूठ बनाने के कारखाने' में काम शुरू हो चुका है। दलित उत्थान का नारा लगाने वाले यह समूह अब इस बात के लिए पीड़ा जाहिर कर रहे हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए 'योग्यता' को वरीयता न देकर 'जाति' को प्राथमिकता देना उचित नहीं।

शनिवार, 10 जून 2017

शांति और संवाद की राह पर लौटें किसान

थाना जलाने के लिए उकसाती कांग्रेस विधायक
 मध्यप्रदेश  में किसान आंदोलन ने जिस तरह हिंसक एवं अराजक रूप धारण कर लिया है, उससे यह स्पष्ट होता है कि उसे भड़काया जा रहा है। पिछले दो दिन में इस प्रकार के वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें स्पष्ट दिखाई देता है कि कुछ लोग और नेता अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर उन लोगों की टिप्पणियाँ भी साझा की गई हैं, जिन्होंने किसानों के पीछे खड़े होकर शांतिपूर्ण आंदोलन को भड़काया। सरकार द्वारा किसानों की माँग मान लेने के बाद जो आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से समाप्त हो जाना चाहिए था, उसके अचानक उग्र होने के पीछे राजनीतिक ताकतें नहीं हैं, यह नहीं माना जा सकता। आग पर पानी डालने की जगह नेताओं द्वारा आग को हवा दी जा रही है। आज जिन नेताओं को किसानों के हित याद आ रहें, वह नेता उस दिन कहाँ थे, जब किसानों को उनकी सबसे अधिक जरूरत थी। तब न तो सरकार के विधायक मंत्री किसानों से मिलने आए थे और न ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता आंदोलन की अगुवाई करने खड़े हुए थे। लेकिन, अब कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी प्रशासन के मना करने के बाद भी तिकड़म भिड़ा कर वहाँ पहुँच गए। किसानों के बीच आकर किया भी तो क्या? क्या राहुल गाँधी ने किसानों से अंहिसा की राह चुनने की अपील की?

शुक्रवार, 9 जून 2017

कम्युनिस्टों का एजेंडा, सेना को करो बदनाम

 भारतीय  सेना सदैव से कम्युनिस्टों के निशाने पर रही है। सेना का अपमान करना और उसकी छवि खराब करना, इनका एक प्रमुख एजेंडा है। यह पहली बार नहीं है, जब एक कम्युनिस्ट लेखक ने भारतीय सेना के विरुद्ध लेख लिखा हो। पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट लेखक पार्थ चटर्जी ने सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत की तुलना हत्यारे अंग्रेस जनरल डायर से करके सिर्फ सेना का ही अपमान नहीं किया है, बल्कि अपनी संकीर्ण और बीमार सोच का भी परिचय दिया है। तथाकथित समाजविज्ञानी और इतिहासकार चटर्जी ने एक बार पुन: यह सिद्ध किया है कि कम्युनिस्टों के मन में सेना के प्रति कितना द्वेष भरा है। इतिहास गवाह है कि कम्युनिस्टों ने हमेशा सेना का अपमान करने का ही प्रयास किया है। कम्युनिस्ट कभी सेना को बलात्कारी सिद्ध करने के लिए बाकायदा शोध पत्र पढ़ते हैं, तो कभी सैनिकों की मौत पर जश्न मनाते हैं। कम्युनिस्ट सैनिकों को वेतन लेने वाले आम कर्मचारी से अधिक नहीं मानते हैं। सैनिकों की निष्ठा और देश के प्रति उनके समर्पण को पगार से तौलने का प्रयास वामपंथी विचारक ही कर सकते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर में सेना को बदनाम करने का षड्यंत्र या तो पाकिस्तान रचता है या फिर पाकिस्तान परस्त लोग। सेना पर लांछन लगाकर कम्युनिस्ट भी पाकिस्तान की लाइन पर आगे बढ़ते रहे हैं। वह कौन-सा अवसर है जब कम्युनिस्टों ने जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना को 'विलेन' की तरह प्रस्तुत करने की कोशिशें नहीं की हैं? जबकि भारतीय सेना जम्मू-कश्मीर में अदम्य साहस और संयम का परिचय देती है। जम्मू-कश्मीर के लोगों का भरोसा जीतने के लिए उनके बीच रचनात्मक कार्य भी करती है। जब भी प्राकृतिक आपदा आती है, तब यही सेना जम्मू-कश्मीर के लोगों के आगे ढाल बनकर खड़ी हो जाती है। जम्मू-कश्मीर और समूचे देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान दाँव पर लगाने वाली सेना और सेना प्रमुख की तुलना जनरल डायर से करना कहाँ तक उचित है? क्या यह सरासर सेना का अपमान नहीं है?

बुधवार, 7 जून 2017

दु:खद है किसानों की मौत

 मध्यप्रदेश  में दो जून से किसान आंदोलन प्रारंभ हुआ था। किसी ने नहीं सोचा था कि शांतिपूर्ण ढंग से प्रारंभ हुआ यह आंदोलन इतना उग्र हो जाएगा कि छह किसानों का जीवन छीन लेगा। कर्जमाफी और अपनी फसल के वाजिब दाम की माँग को लेकर मध्यप्रदेश के मंदसौर, रतलाम और उज्जैन में किसान प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसान संगठनों की माँगें मान भी ली थीं। मुख्यमंत्री ने तत्काल घोषणा कर दी थी कि सरकार किसानों से इस साल 8 रुपये किलो प्याज और गर्मी में समर्थन मूल्य पर मूंग खरीदेगी। खरीदी 30 जून तक चलेगी। कृषि उपज समर्थन मूल्य पर खरीदने के लिए 1000 करोड़ रुपये का एक फंड भी बनाने की घोषणा मुख्यमंत्री ने की है। सरकार द्वारा किसानों की प्रमुख माँग मान लेने के बाद एक-दो संगठन ने आंदोलन वापस लेने की घोषणा भी कर दी थी। प्रमुख संगठनों द्वारा आंदोलन वापस लेने की घोषणा के बाद मध्यप्रदेश सरकार और उसका प्रशासन लापरवाह हो गया। उसने आंदोलन से पूरी तरह ध्यान हटा लिया। जबकि, एक-दो संगठन आंदोलन पर अड़े हुए थे। किसानों की मौत साफतौर पर प्रशासन की लापरवाही का मामला है।

सोमवार, 5 जून 2017

कांग्रेस और पाकिस्तान की भाषा एक कैसे?

 गोहत्या  के खून के दाग अभी धुल भी नहीं पाए थे कि कांग्रेस पाकिस्तान की बोली बोलकर एक बार फिर जनता की नजरों में गिर गई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा नीत केंद्र सरकार के विरोध में कांग्रेस इतनी अंधी हो गई है कि उसे राष्ट्रहित दिखाई नहीं देते हैं। मोदी सरकार का विरोध करते-करते कांग्रेस के नेता भारत और उसकी संस्कृति के विरोध पर उतर आते हैं। कांग्रेस ने इस बार तो हद ही कर दी। मोदी सरकार की निंदा से भरी १६ पृष्ठ की एक पुस्तिका कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और राज बब्बर ने बीते शनिवार को जारी की है, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर के संबंध में एक भयंकर गलती की है। कांग्रेस ने पुस्तिका में चीन-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर का जिक्र करते हुए एक नक्शा प्रकाशित किया है। इस नक्शे में उसने जम्मू-कश्मीर के क्षेत्र को 'इंडियन ऑक्युपाइड कश्मीर' बताया है। जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में इस प्रकार की भाषा का उपयोग पाकिस्तान करता है या फिर पाकिस्तान परस्त अलगाववादी। भारत के प्रति निष्ठावान संगठन या व्यक्ति सम्पूर्ण जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानते हैं। पाक अधिक्रांत कश्मीर के क्षेत्र पर भी भारत अपना दावा जताता है। लेकिन, मोदी सरकार के विरोध में अंधी कांग्रेस भारत के अभिन्न अंग को 'भारत अधिकृत कश्मीर' बता गई। यह कांग्रेस की भूल है या फिर जम्मू-कश्मीर के मसले पर उसकी नीति?

बुधवार, 31 मई 2017

विरोध प्रदर्शन या क्रूरता का प्रकटीकरण

 पशुओं  को क्रूरता से बचाने के लिए केंद्र सरकार के आदेश का विरोध जिस तरह केरल में किया गया, कोई भी भला मनुष्य उसे विरोध प्रदर्शन नहीं कह सकता। यह सरासर क्रूरता का प्रदर्शन था। इसे अमानवीय और राक्षसी प्रवृत्ति का प्रकटीकरण कहना, किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति नहीं होगा। केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध में कांग्रेसी इतने अंधे हो जाएंगे, इसकी कल्पना भी शायद देश ने नहीं की होगी। कम्युनिस्टों का चरित्र इस देश को भली प्रकार मालूम है। केरल में रविवार को जिस प्रकार कम्युनिस्ट संगठनों ने केंद्र सरकार के आदेश का विरोध करने के लिए 'बीफ फेस्ट' का आयोजन किया, सार्वजनिक स्थलों पर गौमांस का वितरण किया, निश्चित तौर पर विरोध प्रदर्शन का यह तरीका निंदनीय है। लेकिन, कम्युनिस्ट पार्टियों के इस व्यवहार से देश को आश्चर्य नहीं है। कम्युनिस्टों का आचरण सदैव ही इसी प्रकार का रहा है, भारतीयता का विरोधी। केरल में कम्युनिस्ट जब अपनी विचारधारा से इतर राष्ट्रीय विचारधारा से संबंध रखने वाले इंसानों का गला काट सकते हैं, तब गाय काटने में कहाँ उनके हाथ कांपते? उनका इतिहास यही सिद्ध करता है कि हिंदुओं का उत्पीडऩ उनके लिए सुख की बात है। लेकिन, कम्युनिस्ट आचरण का अनुसरण करती कांग्रेस का व्यवहार समझ से परे है। देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी यह देखकर दु:खी है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल, जिसे उसने लंबे समय तक देश चलाने के लिए जनादेश दिया, आज वह उसकी ही आस्था और भावनाओं पर इस प्रकार चोट कर रहा है।

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