बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हैप्पी न्यू ईयर या नववर्ष, तय कीजिए

 दृ श्य एक। सुबह के पांच बजे का समय है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानी वर्ष प्रतिपदा का मौका है। ग्वालियर शहर के लोग शुभ्रवेश में जल विहार की ओर बढ़े जा रहे हैं। जल विहार के द्वार पर धवल वस्त्र पहने युवक-युवती खड़े हैं। उनके हाथ में एक कटोरी है। कटोरी में चंदन का लेप है। वे आगंतुकों के माथे पर चंदन लगा रहे हैं। भारतीय संगीत की स्वर लहरियां गूंज रही हैं। सुर-ताल के बेजोड़ मेल से हजारों मन आल्हादित हो रहे हैं। बहुत से लोगों ने तांबे के लोटे उठाए और जल कुण्ड के किनारे पूर्व की ओर मुंह करके खड़े हो गए। सब अघ्र्य देकर नए वर्ष के नए सूर्य का स्वागत करने को तत्पर हैं। तभी सूर्यदेव ने अंगडाई ली। बादलों की चादर को होले से हटाया। अपने स्वागत से शायद सूर्यदेव बहुत खुश हैं। तभी उनके चेहरे पर विशेष लालिमा चमक रही है। सूर्यदेव के आते ही जोरदार संघोष हुआ। सबने आत्मीय भाव से, सकारात्मक ऊर्जा से भरे माहौल में एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं दीं। 
       दृश्य दो। दिसम्बर की आखिरी रात। पुलिस परेशान है कि 'हैप्पी न्यू ईयर वालों' को कैसे संभाला जाएगा? शराब पीकर बाइक-कार को हवाईजहाज बनाने वालों को कैसे आसानी से लैंड कराया जा सकेगा? खैर पुलिस के तनाव के बीच जैसे ही रात १२ बजे घड़ी की दोनों सुईयां एक जगह सिमटीं, जोरदार धमाकों की आवाज आती है। आसमान आतिशबाजी से जगमग हो उठा। आस-पास के घरों से म्यूजिक सिस्टम पर कान-फोडू संगीत बज उठा है। देर शाम से नए साल के स्वागत में शराब पी रहे लौंडे अपने बाइक पर निकल पड़े हैं। कुछ बाइकर्स कॉलोनी में भी आए हैं। सीटी बजाते हुए, चीखते-चिल्लाते हुए, धूम मचा रहे हैं। नारीवादी आंदोलन के कारण खुद को 'ठीक से' पहचान सकीं लड़कियों ने भी लड़कों से पीछे नहीं रहने की कसम खा रखी है। शोर-शराबे के बीच जैसे-तैसे सो सके। सुबह उठे तो अखबार में फोटो-खबर देख-पढ़कर जाना कि नए साल का स्वागत बड़ा जोरदार हुआ। कई लीटर शराब पी ली गई। बहुत-से मुर्गे-बकरे भी निपट गए। कुछ लोग पीकर सड़क किनारे गटर के ढक्कन पर पाए गए तो कुछ लोग सड़क दुर्घटना में घायल हो गए, जिनकी एक जनवरी अस्पताल में बीती। और भी बहुत कुछ है बताने को। 
       दो तस्वीर आपने देखीं। इनमें नया कुछ नहीं है। कुछ दिन से यह सब बताने वाले चित्र आपके फेसबुक पेज और व्हाट्सअप पर आ रहे होंगे। हो सकता है आपने इन्हें लाइक-शेयर-कमेन्ट भी किया हो। हो सकता है आप थोड़ी देर के लिए भारतीय हो गए हों और आपने इन्हें आगे बढ़ा दिया हो। आपको अचानक से अपनी संस्कृति खतरे में नजर आई हो। बहरहाल, समस्या यहां सिर्फ संस्कृति संरक्षण की नहीं है। यहां यह प्रश्न भी नहीं है कि मेरी संस्कृति अच्छी, उनकी संस्कृति घटिया। यहां प्रश्न लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी नहीं है। असल में प्रश्न तो यह है कि हमें किस तरफ आगे बढ़ाना चाहिए? हमें भारतीय मूल्यों, भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ाना चाहिए या फिर पश्चिम से आए कचरे को भी सिर पर रखकर दौड़ लगा देना है? क्या भारतीय संस्कृति पुरातनपंथी है? क्या वर्ष प्रतिपदा 'बैकवर्ड' समाज का त्योहार है और न्यू ईयर 'फॉरवर्ड' का? प्रश्न तो यह भी है कि वास्तव में हमारा आत्म गौरव कब जागेगा? कब हमारी तरुणाई अंगडाई लेगी? कब हम अपने मूल्यों में अधिक भरोसा दिखाएंगे? कब हम अपनी चीजों को दुनिया से सामने प्रतिष्ठित करेंगे? 
       समय तो तय करना पड़ेगा, खुद को बदलने का। सोचते-सोचते, भाषण देते-देते, कागज कारे करते-करते बहुत वक्त बीत गया है। अब समय आ गया है कि हम भारतीय हो जाएं। आखिर कब तक प्रगतिशील दिखने के लिए दूसरे का कोट-जैकेट पहने रहेंगे? अब हम जान रहे हैं कि एक जनवरी को हमारा नववर्ष नहीं है। कारण भी क्या हैं कि एक जनवरी को नववर्ष मनाया जाए? सिर्फ यही कि अंग्रेजी कैलेण्डर बदलता है। अब तय कीजिए क्या यह हमारे लिए उत्सव मनाने का कारण हो सकता है? यदि हो सकता है तो निश्चित ही हमारे पुरखे तय कर गए होते। हम तो वैसे भी उत्सवधर्मी हैं, त्योहार मनाने के मौके खोजते हैं। लेकिन, हमने इस नववर्ष को उत्सव घोषित नहीं किया, क्योंकि हमारे लिए एक जनवरी को नया साल मनाने का कोई कारण नहीं था। हिन्दू जीवनशैली पूर्णत: वैज्ञानिक है। यह तथ्य सिद्ध हो चुका है। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने प्रकृति के चक्र को समझकर बताया कि चैत्र से नववर्ष शुरू होता है। उस वक्त मौसम बदलता है। वसंत ऋतु का आगमन होता है। प्रकृति फूलों से मुस्काती है। फसल घर आती है तो किसानों के चेहरे पर खुशी चमकती है। दुनिया के दूसरे कैलेण्डर से भारतीय कैलेण्डर की तुलना करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मनीषियों की कालगणना कितनी सटीक और बेहतर थी। वर्ष प्रतिपदा को ही नववर्ष मनाने का एक प्रमुख कारण यह है कि भारतीय कालगणना के मुताबिक इसी दिन पृथ्वी का जन्म हुआ था। 
       बहुत से विद्वान कहते हैं कि जब ईस्वी सन् ही प्रचलन में है तो क्यों भारतीय नववर्ष को मनाने पर जोर दिया जाए। जब एक जनवरी से ही कामकाज का कैलेण्डर बदल रहा है तो इसे ही नववर्ष मनाया जाना चाहिए। जवाब वही है, सनातन। जब सब काम ग्रेगेरियन कैलेण्डर से ही किए जा रहे हैं तो फिर निजी जीवन में जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक की सभी प्रक्रियाओं के लिए पंचाग क्यों देखा जाता है। क्योंकि अंतर्मन में विश्वास बैठा है कि कालगणना में भारतीय श्रेष्ठ थे। भारतीय कैलेण्डर का पूर्णत: पालन करने पर कोई क्या कहेगा, इसकी चिंता हमें खाए जाती है। सारी चिंताएं छोड़कर अपने कैलेण्डर को प्रचलन में लाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। एक मौका हाथ आया था लेकिन पाश्चात्य प्रेम में फंसे हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वह मौका खो दिया था। वर्ष 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद ने पंचाग सुधार समिति की स्थापना की थी। समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की थी। लेकिन, पंडितजी ने इस सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया। खुद को सेक्यूलर कहने वाले प्रधानमंत्री ने ऐसे कैलेण्डर को मान्यता दी, जिसका संबंध एक सम्प्रदाय से है। जनवरी से शुरू होने वाले नववर्ष का संबंध ईसाई सम्प्रदाय और ईसा मसीह से है। रोम के सम्राट जूलियस सीजर इसे प्रचलन में लाए। जबकि भारतीय नववर्ष का संबंध हिन्दू धर्म से न होकर प्रकृति से है। यानी खुद को सेक्यूलर कहने वाले विद्वानों को भी अंग्रेजी नववर्ष का विरोध कर पंथ निरपेक्ष भारतीय कैलेण्डर के प्रचलन के लिए आंदोलन करना चाहिए। 
       बहरहाल, खुद से सवाल कीजिए कि अपने नववर्ष को भूल जाना कहां तक उचित है? अगर भारतीयपन बचा होगा तो निश्चित ही आप जरा सोचेंगे। यह भी सोचेंगे कि वास्तव में उत्सव के रंग एक जनवरी के नववर्ष में दिखते हैं या फिर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में। उत्सव मनाने का तरीका पाश्चात्य का अच्छा है या भारत का? कब तक गुलामी के प्रतीकों को गले में डालकर घूमेंगे? अब अपने मूल्यों, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपने ज्ञान-विज्ञान को दुनिया में स्थापित करने का वक्त आ गया है। 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

हिन्दी का योद्धा

 द मदार लेखन शैली और प्रभावशाली वक्तृत्व कला डॉ. वेदप्रताप वैदिक की ताकत है। लेकिन, हिन्दी के सम्मान के लिए लड़ाई उनकी पहचान है। रूसी, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं को जानने वाले डॉ. वेदप्रताप वैदिक अपने हिन्दी प्रेम को लेकर सर्वाधिक चर्चित तब हुए जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर अपना शोध प्रबंध हिन्दी में लिखा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के प्रशासन ने उनके शोध प्रबंध को अस्वीकार कर दिया। उनसे कहा गया कि जाइए, अपना शोध प्रबंध अंग्रेजी में लिखकर लाइए। लेकिन, महज 13 साल की उम्र में हिन्दी के लिए सत्याग्रह कर जेल जाने वाले डॉ. वैदिक क्या यूं ही हार मान जाते। यह मामला भारत के सर्वोच्च सदन भारतीय संसद तक पहुंचा। वर्ष 1966-67 में संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ। डॉ. राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, आचार्य कृपलानी, हीरेन मुखर्जी और चन्द्रशेखर सहित तमाम राजनेताओं ने डॉ. वैदिक का समर्थन किया। आखिर में इन्दिरा गांधी की पहल पर जेएनयू के संविधान में संशोधन हुआ। डॉ. वैदिक के शोध प्रबंध को स्वीकार किया गया। तब से देशभर में डॉ. वेदप्रताप वैदिक की पहचान हिन्दी के योद्धा की हो गई। देशभर में घूम-घूमकर, हिन्दी में भाषण देकर आवाम को सम्मोहित करने वाले नरेन्द्र मोदी ने जब ऐतिहासिक विजय के बाद राष्ट्रपति को अंग्रेजी में पत्र लिखा तो उनका विरोध करने वालों में डॉ. वेदप्रताप वैदिक सबसे आगे रहे। जबकि आम चुनाव-2014 से पूर्व वे मोदी के समर्थन में लेख पर लेख लिखे जा रहे थे।
       पत्रकारिता में 50 साल से अधिक समय बिताने वाले डॉ. वैदिक के चिंतन और विचारों का जादू भारत में ही नहीं विदेश में भी चलता है। दुनियाभर में, असरदार शख्शियतें छोटे कद के लेकिन ऊंचे माथे वाले डॉ. वैदिक से प्रभावित हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के शासनकाल में राजनेता न होने के बाद भी डॉ. वैदिक को डिप्टी पीएम कहा जाता रहा। इंदिरा गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक उनके मुरीद रहे। बाबा रामदेव के 'कालाधन वापस लाओ' अभियान के तो वे सेनापति रहे हैं। 
       करीब 80 देशों की यात्रा कर चुके डॉ. वेदप्रताप वैदिक की हाल ही में पाकिस्तान यात्रा काफी हंगामाखेज रही। मुम्बई ब्लास्ट के मास्टर माइंड हाफिज सईद के साथ मुलाकात ने डॉ. वैदिक की देशभक्ति पर ही प्रश्न चिह्न खड़े करवा दिए। हालांकि सब जानते हैं कि डॉ. वैदिक एशिया महाद्वीप में शांति के लिए प्रयासरत हैं। 
       इंदौर में 30 दिसम्बर, 1944 को जन्मे डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने 1958 में बतौर प्रूफ रीडर पत्रकारिता कदम रखा था। इसके बाद तो उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को नित नई ऊंचाइयां दीं। वे 12 साल तक नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक फिर सम्पादक के पद पर रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। फिलवक्त भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष और नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।
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"वेदप्रताप वैदिक के संस्कार समाजवादी और हिन्दी के रहे हैं। इसलिए उनके लेखन में सदैव प्रखरता और आक्रामकता रही है। उनकी राष्ट्रवादिता संदेह से परे है और उनके उद्देश्यों पर कभी शक नहीं किया जा सकता।"
 - रघु ठाकुर, प्रख्यात समाजवादी चिन्तक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

हिन्दुत्व का सिपाही

 दु नियाभर का काम, सांसद होने से बाय प्रोडक्ट मिली तमाम व्यस्तताएं और सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता के बाद भी आप उन्हें नियमित पढ़ पाते हैं, राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का मजबूती से पक्ष रखने के लिए कटिबद्ध तरुण विजय ही यह कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साप्ताहिक समाचार-पत्र पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक के नाते भी हम सब उन्हें जानते हैं। वर्ष 1961 में जन्मे तरुण विजय महज 25 वर्ष की आयु में दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन आरएसएस के मुखपत्र 'पाञ्चजन्य' के संपादक हो गए और लगातार 22 साल तक यहां रहे।
      तरुण विजय के तर्क, विमर्श क्षमता, स्वाध्याय और लेखनी की ताकत है कि वामपंथी विचारधार की ओर झुके समाचार-पत्र जनसत्ता में उनका कॉलम 'दक्षिणावर्त' सर्वाधिक लोकप्रिय है। वे अपने विरोधियों को तर्कों से चित करते हैं। वे खुलेमन के हैं, विरोधियों का स्वागत करते हैं, उनसे सार्थक संवाद की परम्परा बनाने की कोशिश करते हैं। तरुण विजय और पाञ्चजन्य तब बहुत चर्चा में आए जब उन्होंने कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का साक्षात्कार पाञ्चजन्य में छाप दिया। मीडिया, कांग्रेस, भाजपा और आरएसएस में हंगामा खड़ा हो गया। लेकिन, यही तो सच्चा लोकतंत्र है, जहां विरोधी की बात भी सुनी जाती है और उसे समझने का प्रयास भी किया जाता है। 
      संवेदनशील पत्रकार एवं लेखक तरुण विजय पाञ्चजन्य से अलग होने के बाद संघ के प्रचारक होकर वनवासियों के बीच काम करने के लिए दादरा और नगर हवेली चले गए। वंचित और मुख्यधारा से पिछड़े समाज के लिए बेहतर करने की उनकी हमेशा से कोशिश रही है। दलित और जनजातीय समुदाय के लोगों को सम्मान दिलाने के लिए उन्होंने प्रशिक्षित और योग्यता प्राप्त दलित एवं जनजातीय पुजारियों को हिन्दू मंदिरों के गर्भगृह में देवपूजन तथा कर्मकाण्ड का अधिकार प्रदान करने के लिए राज्यसभा में अधिनियम पेश किया।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे तरुण विजय ने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत प्रतिष्ठित अखबार ब्लिट्ज से की थी। बाद में, खुद को स्वतंत्र पत्रकार के रूप में स्थापित किया। वे टाइम्स ऑफ इंडिया, पायोनियर और जनसत्ता सहित देशभर के तमाम अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे हैं। उन्होंने वामपंथी कलुषगाथा, समरसता के सूत्र, मानसरोवर यात्रा सहित कई किताबों का संपादन और लेखन भी किया है। श्री विजय जितने बड़े पत्रकार, विचारक और लेखक हैं, उतने ही उम्दा फोटोग्राफर भी हैं। सिंध नदी और हिमालय की धवल चोटियां उन्हें फोटोग्राफी के लिए बुलाती हैं। उनके मुताबिक सिंधु नदी की शीतल बयार, कैलास पर शिवमंत्रोच्चार, चुशूल की चढ़ाई या बर्फ से जमे झंस्कार पर चहलकदमी - इन सबको मिला दें तो कुछ-कुछ तरुण विजय नजऱ आएंगे।
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"तरुण जी की पत्रकारिता इस मायने में प्रशंसनीय है कि यहाँ राजनीति का 'र' राष्ट्र के 'र' पर हावी नहीं होता। नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए अनुकरणीय यह वह लीक है जहाँ कलम स्वार्थ के लिए नहीं स्वदेश के लिए उठी है।"
- हितेश शंकर, संपादक, पाञ्चजन्य

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

भाषा का सिपाही

 प त्रकारिता के गिरते मूल्यों और घटती साख के बीच राहुल देव एक ऐसा नाम है जो पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों और भारतीय भाषाओं के वजूद के लिए लम्बी लड़ाई लड़ रहा है। हिन्दी पत्रकारिता में राहुल देव का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने 30 साल से भी अधिक वक्त इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया में बिताया है। इतने लम्बे सफर के दौरान एक दिन भी ऐसा नहीं आया, जब उन पर किसी ने कोई आरोप लगाया हो। झक सफेद दाड़ी और बालों के बीच चमकता राहुल देव का भाल धवल पत्रकारिता का पैरोकार है। 
     वर्ष 1997 में सुरेन्द्र प्रताप सिंह की मृत्यु के बाद लोकप्रिय न्यूज चैनल 'आजतक' पर एंकरिंग की जिम्मेदारी सम्भालने वाले राहुल देव पत्रकारिता में भाषा के स्वरूप और उसके संस्कार को लेकर बेहद संजीदा हैं। समाचार-पत्रों और न्यूज चैनल्स में भाषा के सरलीकरण और बोलचाल की भाषा के नाम पर भारतीय भाषाओं के साथ हो रहे खिलवाड़ से चिंतित नजर आते हैं। 'भारतीय भाषाओं का भविष्य और हमारी भूमिका' विषय पर ग्वालियर में आयोजित व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि अंग्रेजियत के कारण मात्र हिन्दी ही नहीं वरन् भारतीय भाषाओं के वजूद पर संकट आ गया है। हमारी भाषाओं में जबरन अंग्रेजी के शब्द ठूंसे जा रहे हैं। उनका मानना है कि भाषा कोई भी हो, उसकी पवित्रता बनी रहनी चाहिए। अंग्रेजी बोलो तो शुद्ध। हिन्दी में बाचतीत करो तो फिर वह भी हिन्दी ही हो, उसमें अंगे्रजी के शब्द न हों। उनका मानना है कि मीडिया की भाषा के कारण नई पीढ़ी गंभीर और परिष्कृत भाषा से विमुख हो रही है। मीडिया में हिंग्लिश के प्रयोग से काफी दिक्कतें खड़ी हो रही हैं। इस खतरनाक प्रयोग को रोकने की जरूरत है। भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंतित राहुल देव सम्यक फाउण्डेशन के मार्फत एक मुहिम चला रहे हैं। वे इस फाउण्डेशन के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि भाषा के साथ व्यक्ति और समाज के संस्कार भी बदलते हैं। हिन्दी के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने आशंका जताई कि अगर हिन्दी की स्थिति यही रही तो 2050 तक भारत में लिखाई और पढ़ाई के सारे गंभीर काम अंग्रेजी में किए जा रहे होंगे और हिन्दी सिर्फ मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी। 'सम्यक फाउण्डेशन' के माध्यम से वे सामाजिक विकास, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, एचआईवी-एड्स और सामाजिक मूल्यों के प्रति भी लोगों को जागरूक करने में लगे हैं। इसके साथ ही युवाओं को समाजोन्मुखी पत्रकारिता का प्रशिक्षण देना और उन्हें शोधकार्य करने का अभ्यास भी वे बखूबी करा रहे हैं।
     खुद का प्रोडक्शन हाऊस शुरू कर कई न्यूज चैनल्स के लिए बेहतरीन कार्यक्रम और महत्वपूर्ण वृत्तचित्र बनाने वाले राहुल देव ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं और न्यूज चैनल्स में काम किया। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ है। दि पायोनियर, करेंट, दि इलस्ट्रेटड वीकली, दि वीक, प्रोब, माया, जनसत्ता और आज समाज में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के अलावा उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी लम्बे समय तक काम किया। टीआरपी की जगह हर हाल में कंटेंट को प्राथमिकता देने वाले राहुल देव ने आजतक, दूरदर्शन, जी न्यूज, जनमत और सीएनईबी न्यूज चैनल में शानदार सफर गुजारा है। 
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"बाजारवाद के प्रभाव में जब भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी की गरिमा को क्षति पहुंचाई जा रही है, तब राहुल देव भाषाओं की गरिमा के लिए लड़ रहे हैं। यह अपने आप में अनूठी और साहस की बात है।"
- जयंत सिंह तोमर, गांधीवादी चिन्तक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख 

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

अनथक यात्री

 स फल लोग कभी कुर्सी पर बैठकर आराम नहीं कर सकते। उन्हें लगातार काम में व्यस्त रहने में ही आराम मिलता है। जिस उम्र में अधिकतर लोग अपने काम से ही नहीं अपनी जिम्मेदारियों से भी सेवानिवृत्ति ले लेते हैं, 71 वर्षीय विजय सहगल आज भी पत्रकारिता, लेखन और अध्यापन में सक्रिय हैं। उनके उत्साह और ऊर्जा को देखकर युवाओं को भी रश्क हो जाए। भारतीय जीवन मूल्यों और पत्रकारिता के उच्च आदर्शों को लेकर जीने वाले विजय सहगल का समूचा जीवन प्रखर पत्रकार, संवेदनशील साहित्यकार और प्रेरक मीडिया अध्यापक का अनूठा मिश्रण है। 
      सुबाथू (हिमाचल प्रदेश) के प्रसिद्ध लेखक, प्रकाशक, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी प्रेमचंद सहगल के घर 16 जुलाई, 1943 को जन्मे विजय सहगल करीब चार दशक से पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने जालंधर से प्रकाशित वीर प्रताप से बतौर उप-संपादक अपनी पत्रकारिता की सार्थक पारी की शुरुआत की। इसके बाद श्री सहगल ने टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, धर्मयुग और मुम्बई से प्रकाशित सारिका में काम किया। खबरों पर उनकी पकड़, भाषा की गहरी समझ और कुशल नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों के चलते 1978 में दैनिक ट्रिब्यून की स्थापना पर उन्हें सहायक सम्पादक की महती जिम्मेदारी सौंपी गई। वर्ष 1990-2003 तक बतौर सम्पादक विजय सहगल दैनिक ट्रिब्यून को नई ऊंचाइयां देते रहे। फिलहाल वे दिव्य हिमाचल के राजनीतिक समीक्षक और सलाहकार सम्पादक हैं। 
      मानवीय और सामाजिक सरोकारों की पूंजी के सहारे विजय सहगल ने हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के सफर में जो मुकाम हासिल किया है, वह कम लोगों को ही नसीब होता है। साहित्य में कहानीकार के तौर पर खास पहचान रखने वाले श्री सहगल का उपन्यास 'बादलों के साए', कहानी संग्रह 'आधा सुख' और यात्रा वृत्तांत 'आस्था की डगर' बेहद चर्चित हैं। भारत में हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास, हिन्दी पत्रकारिता के विविध आयाम, हिन्दी पत्रकारिता - दिशा और दशा जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों के सहलेखक होने के साथ ही उन्होंने हिमाचल में हिन्दी पत्रकारिता के उद्भव व विकास पर शोधग्रंथ लिखकर अभूतपूर्व योगदान दिया है। वे चंडीगढ़ साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट और इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स सहित पत्रकारिता से संबंधित संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। श्री सहगल फोकस हरियाणा, ईटीवी, डे एण्ड नाइट न्यूज और ए-1 तहलका सहित अन्य टीवी चैनल्स पर विभिन्न विषयों पर होने वाले विमर्शों में शामिल रहते हैं।  
      उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, बुरकिना फासो अर्जेंटीना, घाना, मलेशिया, अमरीका और कनाडा का प्रवास कर चुके विजय सहगल को उनकी उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए मातृश्री पत्रकारिता पुरस्कार, यशपाल साहित्य परिषद सम्मान, उदंत मार्तंड पत्रकारिता पुरस्कार और पंजाब कला साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। श्री सहगल हिन्दी पत्रकारिता के सुनहरे हस्ताक्षरों में से एक हैं।  
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"वैचारिक जगत की सभी वैचारिक धाराओं का समन्वय करते हुए वास्तविकता की पत्रकारिता करने वाले पुरोधा श्री विजय सहगल एक अत्यंत सहज एवं सरल व्यक्ति हैं। उनकी प्रकृति में बंधुत्व एवं संवेदनाओं का आनंददायी समिश्रण हर कोई अनुभव करता हैं।" 
- प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

रौबदार संपादक

 ल गभग 50 साल से पत्रकारिता में सक्रिय श्रवण गर्ग हिन्दी मीडिया के नायाब हीरे हैं। वे उस कुम्हार की तरह हैं, जो काली-पीली मिट्टी से बेहद खूबसूरत और जरूरी बर्तनों को आकार देता है। हिन्दी पत्रकारिता में दैनिक भास्कर को ब्रांडनेम बनाने के लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा। लोहे को छूकर सोना बना देने की उनकी पारसमणि की अलौकिक क्षमता का उपयोग फिलहाल जागरण ग्रुप कर रहा है। जागरण ग्रुप ने छजलानी बंधु से देश का प्रतिष्ठित समाचार-पत्र नईदुनिया खरीदा और उसे फिर से शिखर पर पहुंचाने की महती जिम्मेदारी रौबदार और संजीदा संपादक श्रवण गर्ग को सौंप दी है। 
     67 वर्ष में भी 'युवा ऊर्जा' से भरे श्रवण गर्ग के बारे में कहा जाता है कि उन्हें ना सुनने की आदत नहीं है। श्री गर्ग समस्याएं और बहाने नहीं सुनते, वे समाधान प्रिय सम्पादक हैं। गुस्से के तेज लेकिन अमूमन शांत दिखने वाले श्रवण गर्ग के कैबिन में अधूरा काम लेकर जाने की हिम्मत बड़े-बड़े धुरंधर भी नहीं कर पाते हैं। समाधानकारक और सकारात्मक सोच की मदद से ही उन्होंने दैनिक भास्कर को मध्यप्रदेश से निकालकर देशभर में जमाया और बड़ा नाम बनाया। यह कोई आसान काम नहीं था। स्थितियों और लोगों को पहचानने की उनकी क्षमता अद्भुत है। हिन्दी मीडिया को उन्होंने कई संपादक और पत्रकार चुनकर-गढक़र दिए हैं। दैनिक भास्कर के संपादक रहे श्रवण गर्ग हिन्दी पत्रकारिता जगत में महज एक चर्चित नाम ही नहीं है बल्कि वे अच्छा और बड़ा काम करने वालों के लिए उदाहरण एवं प्रेरणा पुंज बन गए हैं। हिन्दी पत्रकारिता के बेजोड़ सम्पादक श्रवण गर्ग बाहर से जितने कड़े दिखते हैं, भीतर से उतने ही मुलायम हैं। लिखने-पढऩे के अलावा वे घुम्मकड़ी और फोटोग्राफी के भी शौकीन हैं।
     भारत की आजादी के साल में 14 मई को इंदौर में जन्मे श्रवण गर्ग की प्रारंभिक शिक्षा मिनी मुंबई के नाम से मशहूर इसी शहर में हुई। इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त श्री गर्ग को उनके माता-पिता इंजीनियर बनाना चाहते थे। कलकत्ता में इंजीनियरिंग में उनकी अच्छी-भली सरकारी नौकरी भी लग गई लेकिन हिन्दी मीडिया बांहें पसारे उन्हें बुला रहा था। सरकारी नौकरी छोडक़र वे अपने पसंदीदा क्षेत्र में काम करने चले आए। उन्होंने भारतीय विद्या भवन, दिल्ली से अंग्रेजी में पत्रकारिता का डिप्लोमा हासिल किया और वापस इंदौर लौट आए। नईदुनिया में काम शुरू किया। इसके बाद फ्री प्रेस, एमपी क्रॉनिकल (भोपाल) और कुछ समय इंडियन एक्सप्रेस समूह में भी बिताया। प्रभाष जी के साथ मिलकर दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस समूह का 'प्रजानीति' अखबार निकाला। बाद में यह बंद हो गया। बाद में जब दैनिक भास्कर के साथ जुड़े तो फिर श्रवण गर्ग भास्कर के पर्याय हो गए। एक तरह से दैनिक भास्कर के ब्रांड एम्बेसडर।
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"श्रवण गर्ग साहब संपादक नाम की संस्था के संभवतः आख़िरी वारिस हैं। एक ऐसे संपादक, जो हर हाल में बेहतर नतीज़े के लिए न केवल सिर्फ जूझते हैं, बल्कि अपनी पूरी टीम को झोंके रखते हैं। उनकी सम्पादकीय समझ का ही नतीज़ा है कि कई बड़े अख़बार सिर्फ इस कारण बड़े हो पाए क्यूंकि उनके संपादक श्रवण जी थे।" 
- प्रवीण दुबे, वरिष्ठ पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

'सिटी ऑफ जॉय' : कोलकाता

 को लकाता अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के लिए जितना प्रसिद्ध है, उतना ही अपनी भव्य इमारतों और दौड़ती-भागती जिन्दगी के लिए भी। यह दीगर बात है कि ज्यादातर भव्य इमारतें बूढ़ी हो चुकी हैं। ये ठीक वैसे ही दुर्दशा की शिकार हैं, जैसे नालायक औलाद की अनदेखी से बूढ़े मां-बाप का हाल होता है। साक्षात मां काली इस ऐतिहासिक शहर की संरक्षक देवी हैं। यह भगवान रामकृष्ण परमहंस और युवा नायक स्वामी विवेकानन्द की साधना-स्थली भी है। नजदीक ही हावड़ा स्थित बेलूर मठ में आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। यहां पक्षियों की चहचहाहट क्लासिकल संगीत का सुख देती है। दक्षिणेश्वरी और कालीघाट के काली मंदिर में आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। मैदान में हुगली (गंगा) किनारे टहलते हुए दिल बाग-बाग हो उठता है। कोलकाता के कॉफी हाउस आज भी बौद्धिक बहसों के अड्डे हैं। पुराने बाजारों का अपना ही ठाठ है। मिष्टी दोई, संदेश, रॉसगुल्ला का स्वाद और खुशबू कोलकाता से मोहब्बत करने के लिए काफी है।

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

एक्टीविस्ट जर्नलिस्ट

 ए क युवक, जिसे डॉक्टरों के मुताबिक 12-13 साल पहले करीब 30 वर्ष की आयु में ही दुनिया को अलविदा कह देना था। अंग्रेजी दवाओं के साइड इफैक्ट से जिसका शरीर खोखला हो चुका था। फेफड़े और लीवर डैमेज की स्थिति में थे। वह युवक छोटी उम्र से डायबिटीज जैसी बीमारी से जूझ रहा था। आंखों की रोशनी ऐसी हो गई थी कि उसे लगता था जैसे कि वह कुहासे के भीतर से देख रहा हो। वर्षों तक 2-3 घण्टे ही बमुश्किल सो सकता था। अल्सर और एसिडिटी का हाल यह था जैसे पेट में आग जल रही हो। अपने हौसले, अपने लड़ाका स्वभाव और नियमित छोटे-छोटे प्रयोगों के अभ्यास से वह युवक आज न केवल स्वस्थ है बल्कि शारीरिक और वैचारिक स्तर पर समाज को भी स्वस्थ करने की दिशा में प्रयत्नशील है। संत समीर समाजकर्मी हैं, आंदोलनकारी हैं और लड़ाका किस्म के पत्रकार हैं। अपनी बीमारियों से लड़ते-लड़ते समाजशास्त्र से स्नातकोत्तर करने वाले समीर जी स्वदेशी चिकित्सक भी हो गए।
      उत्तरप्रदेश के भगवानपुर गांव में 10 जुलाई, 1970 को जन्मे संत समीर फिलहाल हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका कादम्बिनी के मुख्य कॉपी संपादक हैं। नब्बे के दशक में वैकल्पिक पत्रकारिता के रास्ते उन्होंने खबरों की दुनिया में कदम रखा। प्रतिष्ठित फीचर सर्विस 'स्वदेशी संवाद सेवा' में समीर जी ने करीब आठ साल तक संपादन कार्य किया। वे बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद, वैश्वीकरण और डब्ल्यूटीओ जैसे मुद्दों पर बहस की शुरुआत करने वाली इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका 'नई आजादी उद्घोष' के संपादक और सलाहकार संपादक भी रहे। आजाद भारत में पहली बार बहुराष्ट्रीय उपनिवेश के खिलाफ अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में स्वदेशी-स्वावलंबन का आंदोलन खड़ा करने वालों में भी संत समीर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। बहरहाल, व्यावसायिक पत्रकारिता के तौर पर उन्होंने सबसे पहले पूर्वी उत्तरप्रदेश के अखबार 'जनमोर्चा' के लिए खबरनवीसी की। बाद में न्यूज एजेंसी 'ईएमएस' और क्रॉनिकल समूह के पाक्षिक 'प्रथम प्रवक्ता' से जुड़े। 
      'हिन्दी की वर्तनी' और 'अच्छी हिन्दी कैसे लिखें' सहित कई चर्चित किताबों के लेखक संत समीर के तमाम लेखों की अनुगूंज विधानसभाओं और संसद तक पहुंची है। हाल ही में दिल्ली चुनाव के बाद 'आप के विधायकों के नाम खुला खत' शीर्षक से लिखी गई उनकी लम्बी चिट्ठी खासी चर्चित हुई। सही मायने में यह चिट्ठी न केवल आम आदमी पार्टी बल्कि भ्रष्ट होती जा रही समूची भारतीय राजनीति के लिए एक दिशाबोध भी थी। बेहद संवेदनशील और विनम्र स्वभाव के संत समीर जिंदगी को बड़े करीब से जीते हैं। गरीब बच्चों को पढ़ाना, नि:शुल्क चिकित्सकीय परामर्श के साथ होम्योपैथी दवाएं बांटना और जिंदगी से निराश हो चुके लोगों का हौसला बढ़ाना, उनकी दिनचर्या का हिस्सा हो गए हैं। 
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"हिंदी पत्रकारिता में भाषा-संहार के इस युग में संत समीर उन विरले पत्रकारों में से हैं जो शुद्ध भाषा के आग्रही हैं और अच्छी हिंदी लिखने के लिए सहायक ग्रंथों की रचना भी कर रहे हैं।
- विजयदत्त श्रीधर, संस्थापक-संयोजक, सप्रे संग्रहालय, भोपाल
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
  

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

सबके साथी

 ध रती पर अगर स्वर्ग कहीं है तो वह है जम्मू-कश्मीर। लेकिन, जम्मू-कश्मीर की बड़ी आबादी को भयंकर कष्ट भोगने को विवश होना पड़ रहा है। स्वर्ग का सुख उनके नसीब में नहीं है। लाखों की संख्या में कश्मीरी पण्डितों को अपने ही देश में विस्थापित होकर बसर करना पड़ रहा है। अपने ही देश में पराए बनकर खुशी से रहा जाता है क्या? जम्मू-कश्मीर के धवल शिखरों को जब आतंकवादियों और अलगाववादियों ने लाल रंग में रंगना शुरू किया, खासकर कश्मीरी पण्डितों को निशाना बनाया गया तो मजबूरन उन्हें अपना आशियाना छोडऩा पड़ा। इस विस्थापन में अपने परिवार के साथ एक बच्चे ने भी घर छोड़ा था। आज यह बच्चा देश का सम्मानित और प्रख्यात टीवी पत्रकार है। नाम है राजेश रैना। दुनिया के तमाम संघर्ष से तपकर आगे आए राजेश रैना सदैव दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। वे सौम्य हैं, सरल हैं और सहज हैं। 
      जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के खूबसूरत गांव सलिया में 01 अक्टूबर, 1970 को जन्मे राजेश रैना के दिल में आज भी अपनी धरती से जुदा होने का दर्द है। भले ही वे देश के सबसे बड़े रीजनल न्यूज नेटवर्क समूह ईटीवी के समूह सम्पादक हो गए हों। लेकिन, आज भी वे अपनी जमीन को शिद्दत से याद करते हैं, महसूस करते हैं। अपनी जमीन के लिए उनके मन की तड़प को कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि श्री रैना जम्मू से अपनी पढ़ाई पूरी करने के तत्काल बाद दूरदर्शन के न्यूज कास्टर बनकर सीधे श्रीनगर की खूबसूरत वादियों में पहुंच गए। तमाम आशंकाओं और खतरों के बीच यहां करीब छह साल तक उन्होंने पत्रकारिता की। इसके बाद एक निजी टीवी चैनल का हिस्सा होकर दिल्ली चले आए। लेकिन, दिल्ली में उनका दिल ज्यादा लगा नहीं। जम्मू-कश्मीर के बाद हैदराबाद को उन्होंने अपना दूसरा घर बना लिया। रामोजी राव के टीवी नेटवर्क ईटीवी (अब टीवी१८ ग्रुप का हिस्सा) से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा। रामोजी राव से प्रेरित होकर अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के दम पर राजेश रैना ने जो मुकाम हासिल किया है, मीडिया जगत में उसे पाने के सपने कई लोग देखते हैं। 
      हिन्दी, कश्मीरी, तेलगू, उर्दू और अंग्रेजी, पांच भाषाओं के जानकार और एक दशक से अधिक वक्त से इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सक्रिय राजेश रैना ने ईटीवी के उर्दू चैनल को नई ऊंचाइयां दी हैं। 15 अगस्त, 2014 को उर्दू ईटीवी की 13वीं वर्षगांठ शानदार अंदाज में पूरी हुई है। उनके गरिमापूर्ण नेतृत्व में ईटीवी उर्दू, ईटीवी कन्नड़ और ईटीवी गुजराती को सफलतापूर्वक लांच किया गया। शिखर पर पहुंचने के बाद भी मिलनसार स्वभाव के राजेश रैना जमीन से जुड़े हुए हैं। वे खुलकर लोगों से मिलते हैं, उन्हें पूरी तन्मयता के साथ सुनते और समझते हैं।
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"राजेश रैना उस शख्सियत का नाम है, जो सबको साथ लेकर चलते हैं और सबके साथ चलते हैं। ईटीवी उर्दू को ऊंचाईयां देने में उन्होंने जो मेहनत की है वह काबिले तारीफ है।" 
- तहसीन मुनव्वर, पत्रका
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
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सोमवार, 1 दिसंबर 2014

राष्ट्रवादी विचारक

 उ न्हें पत्रकार, संगठक, लेखक, चिंतक, विचारक, शिक्षाविद और साहित्यकार के रूप में पहचाना जाता है। उनको चाहने वाले हर भूमिका में उन्हें फिट पाते हैं। उन्होंने भी प्रत्येक जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाया है। पत्रकारिता के सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के संस्थापक कुलपति (तब महानिदेशक) होने का गौरव उन्हें हासिल है। जी हां, हम बात कर रहे हैं ध्येयनिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा की। उन्होंने अपने चार साल के कार्यकाल में शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक गतिविधियों से विश्वविद्यालय को देशभर में पहचान दिलाई। आज शायद ही देश का कोई मीडिया हाउस होगा जहां इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी पत्रकारिता को नये आयाम न दे रहे हों। 
      राजस्थान के गांव जोनाइचकलां में 01 मार्च 1934 को जन्मे श्री शर्मा पत्रकारिता और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के हित की सदैव चिंता करते रहे हैं। विद्यार्थियों के बीच रहना उन्हें बहुत भाता है। वे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से ही नहीं वरन् पंजाब यूनिवर्सिटी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर, रानी अहिल्याबाई यूनिवर्सिटी इंदौर, गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी बिलासपुर में भी पत्रकारिता के अध्यापन से जुड़े रहे हैं। किताबें नई राह दिखाती हैं, दिमाग की खिड़कियां खोलती हैं और ज्ञान का विस्तार करती हैं। किताबें एक से दूसरे हाथ पहुंचे, विद्यार्थी उनका लाभ ले सकें, इसीलिए उन्होंने अपनी किताबी दौलत माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय को समर्पित कर दी। साहित्य अकादमी हरियाणा से प्रकाशित 'जनसंचार' और 'हिंदी पत्रकारिता एवं विविध आयाम' उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं।   
      वर्ष 1952 में काशी हिंदी विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए बनारस से प्रकाशित जनसत्ता से बतौर संवाददाता पत्रकारीय जीवन की शुरुआत करने वाले राधेश्याम शर्मा ने भविष्य में पत्रकारिता को नए आयाम दिए। वे छह साल तक जबलपुर से प्रकाशित युगधर्म के संपादक रहे। 1978  में वे दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ से जुड़ गए और 1982 से 90 तक वहां संपादक रहे। 1997 में चंडीगढ़ और धर्मशाला से प्रकाशित दिव्य हिमाचल के संपादकीय सलाहकार रहे। देश के बड़े अखबारों में शुमार दैनिक भास्कर समूह ने भी चंडीगढ़ संस्करण को मजबूत करने के लिए लम्बे सफर के दौरान पत्रकारिता में कमाए श्री शर्मा के अनुभव का लाभ लिया। साहित्यिक अभिरुचि और पत्रकारिता जगत में उनकी प्रतिष्ठा को देखते हुए हरियाणा सरकार ने 2005 में उनको हरियाणा साहित्य अकादमी का निदेशक नियुक्त किया। दो साल के सेवाकाल में उन्होंने अपनी संगठक दक्षता से युवा साहित्यकारों, कवियों और लेखकों को अच्छी संख्या में अकादमी से जोड़ा। 
     हिन्दी पत्रकारिता में श्री शर्मा के योगदान को भारतीय पत्रकार जगत तो सदैव याद करेगा ही, मध्यप्रदेश सरकार ने भी मामा माणिकचंद वाजपेयी राष्ट्रीय पुरस्कार से उनकी ध्येयनिष्ठ, मूल्याधारित और उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता का सम्मान किया है। श्री शर्मा को बलराज साहनी, मातुश्री, राज बदलेव, बाबू बालममुकुंद गुप्त सहित गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
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"राष्ट्रवादी विचारक, सत्य को समर्पित पत्रकार, अध्यापक के रूप में गुरु एवं एक मार्गदर्शक मित्र श्री राधेश्याम शर्मा का समग्र व्यक्तित्व आज की पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है।
- प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

विश्व बंधुत्व और शांति का संदेश देता है सांची


साँची स्थित मुख्य स्तूप (स्तूप क्रमांक-1) फोटो : लोकेन्द्र सिंह/Lokendra /Singh 
 जी वन में चलने वाले रोज-रोज के युद्धों से आपका मन अशांत है, आपकी आत्मा व्यथित है, आपका शरीर थका हुआ है तो बौद्ध तीर्थ सांची चले आइए आपके मन को असीम शांति मिलेगी। आत्मा अलौकिक आनंद की अनुभूति करेगी। शरीर सात्विक ऊर्जा से भर उठेगा। सांची के बौद्ध स्तूप प्रेम, शांति, विश्वास और बंधुत्व के प्रतीक हैं। मौर्य सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर एकान्त स्थल की तलाश थी। ताकि एकांत वातावरण में बौद्ध भिक्षु अध्ययन कर सकें। सांची में उनकी यह तलाश पूरी हुई। जिस पहाड़ी पर सांची के बौद्ध स्मारक मौजूद हैं उसे पुरातनकाल में बेदिसगिरि, चेतियागिरि और काकणाय सहित अन्य नामों से जाना जाता था। यह ध्यान, शोध और अध्ययन के लिए अनुकूल स्थल है। कहते हैं महान सम्राट अशोक की महारानी ने उन्हें सांची में बौद्ध स्मारक बनाने का सुझाव दिया था। महारानी सांची के निकट ही स्थित समृद्धशाली नगरी विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं। सम्राट अशोक के काल में ही बौद्ध धर्म के अध्ययन और प्रचार-प्रसार की दृष्टि से सांची कितना महत्वपूर्ण स्थल हो गया था, इसे यूं समझ सकते हैं कि सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने भी कुछ समय यहीं रहकर अध्ययन किया। दोनों भाई-बहन बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए सांची से ही बोधि वृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गए थे। सांची के स्तूप सिर्फ बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ही श्रद्धा के केन्द्र नहीं हैं बल्कि दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं। ये स्तूप आज भी भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को देश-दुनिया में पहुंचा रहे हैं। दुनिया को शांति, सह अस्तित्व और विश्व बंधुत्व की भावना के साथ रहने का संदेश दे रहे हैं।

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मीडिया में शिवसैनिक

 अ नूठी लेखन शैली, वाकपटुता, प्रतिबद्धता, गंभीर अध्ययन, बेबाक बयानी और धारदार तर्क प्रेम शुक्ल को निर्भीक पत्रकारों की श्रेणी में सबसे आगे खड़ा करते हैं। मंच से भाषण दे रहे हों, टीवी चैनल्स पर बहस में शामिल हों या फिर पत्रकार के रूप कलम चला रहे हों, प्रेम शुक्ल में दिल-दिमाग में कोई कन्फ्यूजन नहीं होता। उन्हें पता है कि कहां खड़ा होना है। सच्चाई का पक्ष लेना और सही बातों को बिना लाग-पलेट के कहना, यही उनको औरों से अलग करता है। तथाकथित सेकुलर पत्रकारों की जमात में उनकी राष्ट्रवादी लेखनी और वाणी सिंह गर्जना-सी प्रतीत होती है। खैर, प्रेम शुक्ल हिन्दी के लिए समर्पित उन चंद पत्रकारों में से हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उनकी रगों में खून के साथ-साथ अखबारी स्याही भी बहती है। देश के सबसे प्रभावशाली और चर्चित सांध्य दैनिक 'दोपहर का सामना' के कार्यकारी सम्पादक प्रेम शुक्ल बेहद सरल और मिलनसार स्वभाव के धनी हैं। प्रेम अपने नाम के अनुरूप सौम्य, निर्मल और नैसर्गिक हैं। 
       प्रेम शुक्ल मूलत: उत्तरप्रदेश के जिले सुल्तानपुर के छोटे-से गांव भोकार के हैं। यह दीगर बात है कि उनका जन्म मुम्बई के उपनगर बांद्रा में 1 अक्टूबर 1969 को हुआ। एक अरसा पहले उनके प्रपितामह रोजी-रोटी की तलाश में मुम्बई आए और फिर यह परिवार मायानगरी का होकर ही रह गया। तब किसने सोचा था, आज भी यह जानकार लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि एक उत्तर भारतीय नौजवान शिवसेना के मुखपत्र 'दोपहर का सामना' का सम्पादक है। वही शिवसेना, जिसे उत्तर भारतीयों की शत्रु की तरह दिखाया-बताया जाता है। उनके साप्ताहिक कॉलम 'टंकार' और 'दृष्टि' पढऩे के लिए लोग उतावले रहते हैं। इन दोनों विशिष्ट लेखमालाओं के जरिए श्री शुक्ल हिन्दुस्थान की गरिमा, हिन्दुत्ववादी अस्मिता और सभ्यता-संस्कृति को निरूपित करने का उपक्रम कर रहे हैं। प्रेम शुक्ल जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, मराठी साप्ताहिक विवेक, तरुण भारत सरीखे समाचार-पत्रों में भी काम कर चुके हैं। देश की पहली ऑडियो-वीडियो मैग्जीन 'लहरें' और ईटीसी न्यूज के कंसल्टिंग एडिटर के रूप में प्रेम शुक्ल ने कई सामाजिक, आर्थिक, आपराधिक और राजनैतिक घटनाओं-घोटालों से पर्दा उठाया है। 
      प्रेम शुक्ल महज पत्रकार ही नहीं बल्कि एक सक्रिय समाजसेवी, साहित्यकार और अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। उनके भीतर पुश्तैनी मिट्टी की सौंधी गंध बसी हुई है। मुंबई में वे उत्तर भारत के गौरव की तरह हैं। प्रेम शुक्ल बड़े स्तर पर भोजपुरी सम्मेलन, अवधी अधिवेशन और लाई-चना उत्सव मनाते हैं। मारीशस में रामकथा को जीवंत और लोकप्रिय बनाये रखने के लिए प्रयासरत् रामकथा वाचकों को सम्मानित-प्रोत्साहित करते हैं। प्रेम शुक्ल सूरीनाम और फिजी में भी हिन्दी भाषा और हिन्दी जनों के प्रिय हैं।  
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"राष्ट्रवादी पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ हैं प्रेम शुक्ल। हिन्दी पट्टी के लोगों के लिए अनुकूल जगह नहीं होने बाद भी उन्होंने मुम्बई में हिन्दी पत्रकारिता को बहुत सम्मान दिलाया है।" 
- अनिल सौमित्र, मीडिया एक्टिविस्ट 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

बुधवार, 26 नवंबर 2014

कवि पत्रकार

 प त्रकार की चेतावनी को नजरअंदाज करना कितना घातक साबित हो सकता है, दुनिया में इसका सबसे बड़ा उदाहरण है भोपाल गैस त्रासदी। राजकुमार केसवानी उस पत्रकार का नाम है, जो वर्ष 1984 में हुई भीषणतम गैस त्रासदी की ढाई साल पहले से चेतावनी देते आ रहे थे। हुक्मरानों ने अगर उनकी चेतावनी को संजीदगी से लिया होता तो संभवत: 3 दिसम्बर को वह काली रात न आई होती है, जिसके गाल में हजारों लोगों का जीवन चला गया और अब भी उसकी मार से हजारों लोग पीडि़त हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी गंभीर और संवेदनशील पत्रकारिता की सराहना हुई है। श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए पत्रकारिता का प्रतिष्ठित पुरस्कार 'बीडी गोयनका अवॉर्ड' उन्हें मिल चुका है।  
      26 नवंबर, 1950 को भोपाल की बाजेवाली गली में जन्मे राजकुमार केसवानी ने एलएलबी की पढ़ाई की है लेकिन उनका मन तो लिखत-पढ़त के काम की ओर हिलोरे मार रहा था। इसीलिए वकालात के पेशे में न जाकर, 1968 में कॉलेज के पहले साल से ही स्पोर्ट्स टाइम्स में सह संपादक का बिना वेतन का पद पाकर पत्रकारिता की दुनिया में चले आए। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स, इलस्ट्रेटेड वीकली, संडे आब्जर्वर, इंडिया टुडे, इंडियन एक्सप्रेस, द एशियन एज, ट्रिब्यून, आउटलुक, द इंडिपेंडेट, द वीक, न्यूज टाइम, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स और दिनमान जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों में काम किया है। वर्ष 1998 से 2003 तक एनडीटीवी के मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख रहे। 2003 में दैनिक भास्कर इन्दौर के सम्पादक बने। दैनिक भास्कर समूह में ही सम्पादक (मैग्जीन्स) की जिम्मेदारी संभालते हुए रविवारीय रसरंग को अलग ही पहचान दी। कंटेन्ट और भाषा (खासकर उर्दू) की शुद्धता के लिए इस शिद्दत से काम किया कि लोग रसरंग के दीवाने हो गए। रसरंग में ही 'आपस की बात' शीर्षक से लाजवाब स्तंभ लिखकर राजकुमार केसवानी रुपहले पर्दे के सुनहरे कल की याद दिलाते हैं। उनके पास विश्व-सिनेमा की बेस्ट क्लासिक फिल्मों के वीएचएस कैसेट्स, दुर्लभ हिन्दी फिल्मी और गैर फिल्मी रेकॉर्ड्स का अनूठा खजाना है। कैनेडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (सीबीसी) और व्हाइट पाइन पिक्चर्स, टोरंटो ने पत्रकारिता में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए एक वृत्तचित्र का निर्माण भी किया है। 
      जितना पैनापन राजकुमार केसवानी की पत्रकारिता में रहा है, उतनी ही मुलायमियत उनकी कविताओं में है। वे पेशेवर नहीं बल्कि मन के कवि हैं। कविता संग्रह 'बाकी बचें जो' में बच्चों के प्रति उनकी मोहब्बत, उनके अंदर बैठे बेहतरीन इंसान को सबके सामने लाती है। कवि लीलाधर मंडलोई उनकी कविताओं के बारे में कहते हैं- 'मितकथन राजकुमार केसवानी का गुण है। स्थानीयता उनकी पूँजी। कहन में सादगी। भाषा में गहरी लय और संगीत। वे तफसीलों में कम जाते हैं कविता में व्याख्यान की जगह वे भाव को तरजीह देते हैं।'
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"राजकुमार केसवानी पत्रकार के साथ-साथ बेहद संवेदनशील कवि भी हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर उनकी ख़बरों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई हैं।" 
- डॉ. विजय बहादुर सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

सोमवार, 24 नवंबर 2014

भूत भगाने वाला

 क रीब तीन साल पहले तक प्राइम टाइम में भूत-प्रेत की कहानियां, रियलिटी शो और मनोरंजन के नाम पर फूहड़ सामग्री दिखा रहे टीवी चैनल्स की स्क्रीन अब कुछ बदली-बदली सी नजर आती है। प्राइम टाइम में न्यूज चैनल्स पर सार्थक बहस और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर शुद्ध खबरें अब दिखने लगी हैं। युवा हो रही टीवी पत्रकारिता के चरित्र में यह सकारात्मक बदलाव कुछ लोगों की स्पष्ट सोच और संकल्प का नतीजा है। अलबत्ता, इस बदलाव में ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के लगातार तीसरी बार महासचिव चुने गए नवलकिशोर सिंह (एनके सिंह) की महती भूमिका है। टीआरपी की होड़ में दीवाने हुए न्यूज चैनल्स के प्रबंधकों-संपादकों को चैनल्स पर दिखाई जा रही सामग्री और उसके प्रभाव के प्रति चेताने में एनके सिंह को काफी मशक्कत करनी पड़ी। खैर, पत्रकारिता में सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध एनके सिंह काफी हद तक अपने प्रयत्नों में सफल हुए। वे एक संकल्प के साथ निरंतर टीवी पत्रकारिता और उसके कंटेन्ट को अधिक गंभीर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। 
      स्वभाव से मृदुभाषी और मिलनसार एनके सिंह फिलहाल देशभर के हिन्दी और अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं के लिए सामाजिक और राजनीतिक सरोकारों पर लेख लिख रहे हैं। वे न्यूज चैनल्स पर होने वाली बहसों में भी राजनीतिक और मीडिया विश्लेषक की हैसियत से शिरकत करते हैं। हाल ही में उन्होंने लाइव इंडिया न्यूज चैनल को राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स के बीच री-लॉन्च करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली है। वे लाइव इंडिया से ग्रुप एडिटर और एडिटर इन चीफ के तौर पर जुड़े हैं। अपने 33 साल के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने नेशनल हेराल्ड, द पायोनियर और न्यूज टाइम/ईनाडू में रिपोर्टर से लेकर विभिन्न भूमिकाओं में काम किया। करीब एक दशक पहले उन्होंने ईटीवी न्यूज से टीवी पत्रकारिता में कदम रखा और बाद में साधना न्यूज चैनल में राजनीति संपादक के रूप में काम किया। श्री सिंह ने द पायोनियर और ईनाडू/ईटीवी के कई एडिशन भी सफलतापूर्वक लॉन्च कराए। एनके सिंह ने देश-दुनिया से जुड़े कई गंभीर मसलों का कवरेज किया है। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी विध्वंस की घटना के तत्काल बाद श्री सिंह की खोजपरक खबर प्रकाशित हुई, जिसकी चर्चा देशभर में हुई। उनकी कुछ स्टोरी के कारण तो भारत सरकार को कई नियमों में भी संशोधन करने पड़े हैं। 
      व्यावसायिकता के इस दौर में भी एनके सिंह के लिए पत्रकारिता प्रोफेशन नहीं बल्कि पैशन है। पत्रकारिता उनको आध्यात्मिक अनुभव और संतुष्टी देती है। वे कहते हैं कि पत्रकारिता के लिए तड़प होनी चाहिए और यह तड़प गरीबी के अनुभव से आती है। आम भारतीय के दर्द से जुडऩे के लिए एनके सिंह बेहद साधारण जीवन जीते हैं। ट्रेन के स्लीपर क्लास में सफर करने का एक प्रयोग वे कर रहे हैं।
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"पत्रकारिता में निष्पक्षता एवं खरी-खरी अभिव्यक्ति के पक्षधर एनके सिंह की कथनी और करनी में मामूली अंतर भी नहीं दिखता है। प्रखर राजनीतिक चिंतन और निष्पक्ष विश्लेषण, आपकी पत्रकारिता की विशेषता है।" 
- श्रीकान्त सिंह, संपादक, मीडिया विमर्श 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

पीड़ितों की आवाज

 प्र ख्यात गांधीवादी चिंतक मणिमाला, सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता में एक जाना-पहचाना नाम हैं। पत्रकारिता उनके लिए फैशन नहीं पैशन है। पत्रकारिता उन्हें समाज में सार्थक बदलाव लाने का एक प्रभावी जरिया लगा। इसीलिए पढ़ाई के दौरान ही वे लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हो गईं। आज जब पत्रकारिता पर बाजार हावी है तब मणिमाला यशस्वी पत्रकार राजेन्द्र माथुर, बाबूराव विष्णु पराडक़र और प्रभाष जोशी की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। अपने 30 साल के पत्रकारिता के सफर में कभी उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनकी कलम न तो कभी रुकी और न ही कभी झुकी। महिलाओं, बच्चों और सामाजिक व्यवस्थाओं से जुड़े मसलों पर उन्होंने निर्भीक होकर लेखन किया है। 
      गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नईदिल्ली की निदेशक मणिमाला महात्मा के विचारों और जीवन सूत्रों को समाज तक पहुंचाने की महती जिम्मेदारी निभा रही हैं। शब्दों का चयन, विषय की प्रस्तुति का अनूठा अंदाज और भाषा का सहज प्रवाह उनके लेखन की सबसे बड़ी खूबसूरती है। अपने पत्रकारीय जीवन की विधिवत शुरुआत उन्होंने 1984 में प्रभात खबर जैसे मजबूत अखबार से की। नवभारत टाइम्स में बतौर संवाददाता काम करते हुए उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र पत्रकारिता में अपने लिए एक अलग मुकाम बनाया। वे अपनी तेजतर्रार छवि और धारधार लेखनी के लिए देशभर में पहचानी जाने लगीं। यही नहीं उन्हें बिहार की पहली महिला पत्रकार होने का श्रेय भी हासिल है। वे मलयालम मनोरमा समूह की मासिक पत्रिका वनिता की संपादक भी रहीं। दिल्ली में रहकर अन्य संस्थानों के साथ काम का भी अनुभव उन्हें हैं। फिलहाल वे गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पत्रिका 'अंतिम जन' की संपादक हैं। अंतिम जन में प्रकाशित होने वाले उनके सम्पादकीय पत्रकारिता, साहित्य और अन्य क्षेत्रों में खासे चर्चित होते हैं। इसके अलावा बाल विवाह पर धारावाहिक, दिवराला सती पर धारावाहिक, अपराध का त्रिकोण, स्त्री के बिना समाज और सीता के बिना राम, उनके चर्चित आलेख हैं। जीत लेंगे अंधेरे को (दलित महिला नेतृत्व एक सफर), गलत हो गया तो (कविता संग्रह), वजूद (कविता संग्रह) इराक : या इलाही कोई और न लूटे ऐसे, धर्मान्तरण : जरा सी जिन्दगी के लिए और हिन्दी पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार उनकी बेहद चर्चित किताबे हैं।
      उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए मणिमाला जी को वर्ष 2006 में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब के हाथों गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से नवाजा गया। वर्ष 2011 में संसद के सेन्ट्रल हॉल में राष्ट्रभाषा सेवा सम्मान प्रदान किया गया। 2003 में इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट अवार्ड दिया गया। 1998 में आउटस्टैंडिंग साउथ एशियन वुमन जर्नलिस्ट सम्मान दिया गया। जबकि सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 2013 में अन्ना साहेब पटवर्धन सामाजिक कार्य सम्मान, 2012 में गांधी-विनोबा स्मृति सम्मान, 1986 जनजागरण पत्रकारिता पुरस्कार और सोशल जर्नलिज्म अवार्ड से मणिमाला जी को सम्मानित किया गया।
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"पत्रकारिता में जुझारू और जुनूनी नाम तलाशना हो तो मणिमाला पहली पंक्ति में खड़ी नजर आएंगी। वे महज लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेतीं, बल्कि मैदान में उतरकर पीड़ितों के पक्ष में सीधे संघर्ष का माद्दा रखती हैं।" 
- सन्त समीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

मध्यप्रदेश की धड़कन है माण्डू

जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
 जि सने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश में देखा क्या? इसलिए भारत का दिल देखने निकलो तो माण्डव जाना न भूलिएगा। बादशाह अकबर हो या जहांगीर, सबको यह ठिया पसंद आया है। अबुल फजल तो सम्मोहित होकर कह गया था कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू प्रकृति की गोद में खूब दुलार पा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु तो माण्डू का सोलह श्रंगार करने के लिए ही यहां आती है। बारिश में तो यह अल्हड़ नवयौवन की तरह अंगड़ाई लेता नजर आता है। यहां आकर आपका दिल भी आशिक मिजाज हो ही जाएगा। रानी रूपमति के महल से दिखने वाला नैसर्गिक सौंदर्य आपको प्रेम सिखा ही देगा। जहाज महल पर खड़े होकर आप असीम सुकून की अनुभूति करेंगे। हिन्डोला महल में आपका मन डोले बिना नहीं रहेगा। होशंगशाह का मकबरा मन को मोह लेगा और ताजमहल की याद दिलाएगा। आल्हा-ऊदल की कथाएं रोमांच बढ़ा देंगी, आपकी भुजाओं की मछलियां बाहर आने को मचल उठेंगी। ईको प्वाइंट पर खड़े होकर जब आप जोर से अपना नाम पुकारेंगे तो लगेगा कि दुनिया आपको सुन रही है। अद्भुत है माण्डू। रानी रूपमति और बाज बहादुर की खूबसूरत मोहब्बत की तरह माण्डू भी बेहद हसीन है।

सोमवार, 17 नवंबर 2014

दर्द का बयान

 उ नका बचपन गरीबी में बीता। वे मेरठ में रहते थे। मिट्टी का कच्चा घर था। एक बरसात में उनका मकान गिर गया। उनके पास इतने भी पैसे न थे कि उनकी मुरम्मत करा पाते। समाज के वंचित वर्ग का हिस्सा होने के कारण उन्हें हर कदम पर समूची मानवता को लजाने वाला अपमान भी झेलना पड़ता था। उनके हौसले को सलाम है कि इस गरीबी और संघर्ष के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। चप्पल-जूते भी नहीं थे, उनके पास। स्कूल के लिए नंगे पैर ही आना-जाना पड़ता था। अच्छे कपड़े तो बहुत दूर की बात है, उनके पास स्कूल की गणवेश सिलवाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। दो-दो साल पुराने, फटे और छोटे हो गए कपड़े पहनकर वे स्कूल जाते थे। यहां पर भी संघर्ष ही उनका स्वागत करता था। शिक्षा के मंदिर में उन्हें शिक्षक ही अपमानित करते थे। उन्हें कहा जाता था कि क्या करोगे पढ़-लिखकर जूते-चप्पल ही तो बनाना है। लेकिन, धुन के पक्के मोहनदास नैमिशराय ने हार नहीं मानी। आग से तपकर निकले मोहनदास नैमिशराय आज दलित पत्रकारिता और साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।  
      उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर में 5 सितंबर 1949 को जन्मे बेहद मृदुभाषी, सहज और सरल व्यक्ति के धनी मोहनदास नैमिशराय सामाजिक सरोकारों और वंचित समूह के लिए समर्पित चर्चित पत्रिका 'बयान' के सम्पादक हैं। उन्होंने पांच वर्ष तक भारत सरकार के डॉ. आम्बेडकर प्रतिष्ठा, नई दिल्ली को बतौर सम्पादक और मुख्य सम्पादक अपनी सेवाएं दीं। प्रिंट पत्रकारिता, रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म और नाटक आदि में भी उन्होंने अपने लेखन कार्य से अमिट छाप छोड़ी है। संघर्षशील जीवन में भोगा गया यथार्थ, गरीबी का दंश और तिरस्कार से उपजी वेदना को श्री नैमिशराय ने अपने लेखन में उतारा है। उनका यह दर्द सम्पूर्ण दलित समाज का है। उनका चर्चित उपन्यास 'जख्म हमारे' इसकी बानगी है। उनके लेखन की विशेषता है कि समाज के दु:ख के साथ अपने दु:ख को जोड़ते हैं। वे सार्थक बदलाव की बात करते हैं, भविष्य की बात करते हैं, अतीत को पकडक़र रोते नहीं है, अमानवीय व्यवहार के लिए सवर्णों की भूल पर उन्हें कोसते भी नहीं हैं। 
      महानायक बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर पर पहला ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले मोहनदास नैमिशराय की करीब पचास कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कहानी संग्रह, कविता संग्रह, विचार-सार, अनुवाद, आत्मकथा, उपन्यास सहित अन्य विद्याओं की कृतियां शामिल हैं। उन्होंने भारतीय दलित आंदोलन का इतिहास चार भागों में लिखा है। 
     हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के गौरव मोहनदास नैमिशराय को कास्ट एण्ड रेस पुस्तक के लिए डॉ. आम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन पुरस्कार, कनाडा से सम्मानित किया जा चुका है। हिन्दी साहित्य के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्री नैमिशराय को पत्रकारिता के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी नवाजा गया है।
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"मोहनदास नैमिशराय आम्बेडकरवादी धारा के ऐसे लेखक हैं जिनके समूचे लेखन से सामाजिक समरसता की भावना को शक्ति मिलती है।"  
- संजय द्विवेदी, कार्यकारी संपादक, मीडिया विमर्श
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

सहजता है पहचान

 प त्रकारिता की एक व्याख्या यह भी है कि पत्रकारिता व्यक्ति को कुछ दे या न दे लेकिन घमण्ड इतना देती है कि पैर जमीन पर टिकते नहीं, अचानक ही 'आम लोगों' के बीच का आदमी 'बेहद खास' हो जाता है। सोचिए, यहां सहज और सरल रहना कितना मुश्किल होगा। पत्रकारिता में शानदार 35 साल गुजारकर और पांच साल से भी अधिक समय तक मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में नवदुनिया जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सम्पादक रहकर भी गिरीश उपाध्याय बेहद सहज और सरल ही नहीं बल्कि सर्वसुलभ और मिलनसार भी हैं। नई पीढ़ी के पत्रकारों से संवाद को वे सदैव तैयार रहते हैं, हर मसले पर उनके साथ खुलकर बात की जा सकती है। वे प्रेरक और मार्गदर्शक हैं। 
साहित्य और वैचारिकी उन्हें विरासत में मिली। मालवा के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार और हिन्दी की ख्यातनाम साहित्यिक पत्रिका 'वीणा' के सम्पादक रहे मोहनलाल उपाध्याय 'निर्मोही' उनके पिता थे। अपने पिता से गिरीश उपाध्याय ने माटी से जुड़ाव, सामाजिक सरोकार और देशहित में कलम साधना सीखा। वर्ष 1981 में दैनिक स्वदेश, इंदौर से उन्होंने अपने पत्रकारीय सफर की विधिवत शुरुआत की। वर्ष 1983 से 2001 तक समाचार एजेंसी यूनीवार्ता के लिए विभिन्न पदों पर रहते हुए मध्यप्रदेश के भोपाल, ग्वालियर, इंदौर-उज्जैन और राजस्थान की राजधानी जयपुर में एजेंसी पत्रकारिता को नए आयाम दिए। देश के सबसे बड़े रीजनल चैनल ईटीवी की हिन्दी सेवा से 2001 के अंत में जुड़े। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ईटीवी न्यूज चैनल का नेटवर्क खड़ा करने की अहम जिम्मेदारी सफलतापूर्वक पूरी की। यही नहीं हैदराबाद स्थिति ईटीवी के मुख्यालय में भी हिन्दी रीजनल चैनल का सेटअप तैयार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन किया। इसके बाद अमर उजाला अखबार के चंडीगढ़ संस्करण में पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ स्टेट ब्यूरो प्रमुख के नाते काम किया। देश बड़े समाचार-पत्र समूहों में शामिल राजस्थान पत्रिका में 2005 से 2008 तक बतौर डिप्टी एडिटर अखबार के कंटेन्ट पर काम किया। वर्ष 2008 संपादक होकर नवदुनिया, भोपाल चले आए। फिलहाल माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्वामी विवेकानन्द पीठ पर रिसर्च फैलो हैं। 
24 सितम्बर, 1958 को इंदौर में जन्मे गिरीश उपाध्याय लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित हैं। माधवराव सप्रे संग्रहालय भोपाल द्वारा माखनलाल चतुर्वेदी सम्मान और राष्ट्रीय पत्रकार न्यास द्वारा बापूराव लेले सम्मान उन्हें प्रदान किया जा चुका है। वर्ष 2011 में राज्य स्तरीय श्रेष्ठ पत्रकारिता सम्मान और 2012 में बेस्ट एडिटर सम्मान, भोपाल भी उन्हें मिल चुके हैं। चीन, जापान, हांगकांग और मलेशिया की यात्रा कर चुके गिरीश उपाध्याय सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता के हामी हैं। वर्तमान में वे इंडियन मीडिया सेंटर के मध्यप्रदेश चैप्टर के अध्यक्ष हैं और अपने स्तर पर पत्रकारिता में शुचिता और पत्रकारों की बेहतरी के लिए प्रयत्नशील हैं।  
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"गिरीश उपाध्याय हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनकी पत्रकारिता सनसनीखेज नहीं है। उनकी पत्रकारिता में देश और समाज सबसे पहले हैं। सकारात्मक पत्रकारिता के गुरुकुल हैं गिरीशजी।" 
- लोकेन्द्र पाराशर, संपादक, स्वदेश ग्वालियर 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 10 नवंबर 2014

खोज का जुनून

 प्र त्येक पत्रकार की इच्छा होती है कि वह राजनीतिक या फिर अपराध पत्रकारिता में सबसे चर्चित नाम बन जाए। मीडिया जगत में उसकी धमक हो। बड़े से बड़ा राजनेता या फिर अंडरवर्ल्ड के कुख्यात गुण्डे सबसे पहले उससे बात करें। लेकिन, इस मुकाम तक पहुंचने के लिए बड़ी मेहनत तो लगती ही है, यहां कदम जमाए रखना भी रोज कुंआ खोदकर पानी पीने जैसा है। दीपक शर्मा एक ऐसा ही नाम है, जो देश के सबसे बड़े और उलझे सूबे उत्तरप्रदेश की राजनीति की डोर को सुलझाकर हमारे सामने रखते हैं। केन्द्र सरकार की भी छोटी-बड़ी सब खबरों पर उनकी पैनी नजर रहती है। बात अगर इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज्म की हो तो दीपक शर्मा हिन्दी के बहुमुखी खोजी पत्रकारों में से एक हैं। उनके तेजतर्रार जोश को देखकर लगता नहीं, सबसे तेज होने का दावा करने वाले न्यूज चैनल आजतक की रफ्तार कभी धीमी होगी।
       मिलनसार, सहज और सरल स्वभाव के दीपक शर्मा ने वर्ष 2002 में विशेष संवाददाता के रूप में आजतक ज्वाइन किया। अभी वे एडीटर के रूप में आजतक में ही विशेष खोजी टीम का नेतृत्व करते हैं। इससे पहले वे दैनिक जागरण, पायोनियर और इंडिया टुडे में भी काम कर चुके हैं। भारत में आतंकी नेटवर्क और माफिया गिरोहों के विषय में वो गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं। चाहे तालिबान, मिलिशिया के साथ सीधी बातचीत करना हो या फिर कराची स्थित अंडरवल्र्ड सरगना दाऊद के गुर्गों के साथ बातचीत, दीपक शर्मा ने हमेशा अपने चैनल को आगे रखा है।
       अमूमन बड़ी खबरों को सबसे पहले ब्रेक करने वाले दीपक शर्मा अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए हाल ही काफी चर्चित भी हुए हैं। उनकी एक रिपोर्ट ने यूपीए सरकार में मंत्री रहे सलमान खुर्शीद को सिर के बल खड़ा कर दिया तो मुजफ्फरनगर के दंगों का सच दिखाने पर, उन्हें हिन्दुवादी पत्रकार होने का आरोप झेलना पड़ा। साहसिक पत्रकारिता के लिए जीने वाले श्री शर्मा तमाम तोहमत और जोखिम के बाद भी सच दिखाने से कभी पीछे नहीं रहे। सच के लिए लडऩे-भिडऩे का जुनून उनके भीतर उबाल मारता रहता है।
       देश के लिए ओलंपिक में पदक जीतने वाले पद्मश्री जमनालाल शर्मा के सपूत दीपक शर्मा जितने अच्छे पत्रकार हैं उतने ही उम्दा स्पोर्ट्स मैन भी हैं। वे राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी रहे हैं। खबरों से खेलने के बीच में जब भी खाली वक्त मिलता है, वे गोल्फ खेलना पसंद करते हैं। इन सबके अलावा सोशल मीडिया पर सक्रियता, फेसबुक पर अलग-अलग विषय पर शॉर्टनोट लिखना, बड़े ही सहज अंदाज में आम आदमी से बात करना, लोगों से सीधे कनेक्ट रहना भी उनकी दिनचर्या में शुमार है।
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"दीपक शर्मा जुनूनी पत्रकार हैंl कब्र खोदकर खबर लाने की अद्भुत क्षमता वाले दीपक भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के खतरनाक दुश्मन हैंl वे बहुत प्यारे दोस्त हैंl"
-सईद अंसारी, सीनियर एंकर, आजतक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

भरोसेमंद नाम

 बा जार की होड़ के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबद्धता, पाठकों की रुचि और बेहतर मापदंडों के बीच कोई समाचार-पत्र कैसे संतुलन कायम रख सकता है, यह साबित करके दिखाया था हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर अभय छजलानी ने। पिछले 40-50 वर्षों में अखबार मालिक से लेकर संपादक तक उन्होंने नईदुनिया को भारतीय भाषायी पत्रकारिता में एक अलग पहचान दिलाई। उनके संपादकीय कार्यकाल में नईदुनिया हिन्दी का शब्दकोश बन गया था। हर आयु वर्ग के पाठक नईदुनिया के नशे में पागल थे। पाठक नईदुनिया को इतनी मोहब्बत करते थे कि इंदौर से मीलों दूर जाने के बाद भी नईदुनिया उनके जीवन का हिस्सा बना रहा, वे डाक से नईदुनिया के आने का एक दिन तक इंतजार करते थे। नईदुनिया के साथ सुबह की चाय की चुस्कियां कुछ ज्यादा ही मीठी जाया करती थीं। 
      सामाजिक सरोकारों को पत्रकारिता का धर्म मानने वाले अभय छजलानी का जन्म 4 अगस्त, 1934 को इंदौर में हुआ। उन्होंने वर्ष 1965 में दुनिया के श्रेष्ठ संस्थानों में शामिल थॉम्सन फाउंडेशन, कार्डिफ (यूके) से पत्रकारिता में प्रशिक्षण प्राप्त किया। हालांकि अभयजी 1955 में ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए थे। 1963 में नईदुनिया के कार्यकारी संपादक हो गए और बाद में लंबे अरसे तक नईदुनिया के प्रधान संपादक रहे। 
      पत्रकारिता से जुड़े उच्च आदर्शों और मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास करने वाले पत्रकारों की पहली पंक्ति में अभय छजलानी का नाम आता है। आजादी के बाद की हिन्दी पत्रकारिता के संरक्षण और संवर्धन में श्री छजलानी की अहम भूमिका रही है। हिन्दी पत्रकारिता में उनके योगदान को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। हिन्दी पत्रकारिता अपने हीरो अभय छजलानी के भारतीय भाषाई समाचार पत्रों के शीर्ष संगठन इलना के तीन बार अध्यक्ष रहने के लिए भी गौरव का अनुभव करती है। अभयजी 2004 में भारतीय प्रेस परिषद के लिए मनोनीत किए गए। इसके अलावा उन्हें 1986 का पहला श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। ऑर्गनाइजेशन ऑफ अंडरस्टैंडिंग एंड फ्रेटरनिटी की ओर से वर्ष 1984 में गणेश शंकर विद्यार्थी सद्भावना अवॉर्ड दिया गया। विशेष योगदान के लिए उन्हें 1997 में जायन्ट्स इंटरनेशनल पुरस्कार और इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी पुरस्कार से भी नवाजा गया। 
      पत्रकारिता बेहद जोखिमभरा कार्यक्षेत्र है। किसी भी पत्रकार को कभी यह भरोसा नहीं रहता कि कल नौकरी उसके हाथ रहेगी या नहीं। घोड़ा दौड़ रहा है तो मालिक बोली लगाएगा वरना तो नमस्ते लंदन तय है। लेकिन, सरल, सहज और सुलभ स्वभाव के धनी अभय छजलानी के अखबार में कर्मचारी स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करते रहे। पत्रकारों का यह भरोसा ही हिन्दी पत्रकारिता के हीरो अभय छजलानी की सबसे बड़ी पूंजी है। 
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"अभय जी का जीवन निरंतर संघर्ष की दास्तान है। संघर्ष- अपना स्थान पाने के लिए, मालिक-संपादक की छवि से, अपने लोगों से, अपने आप से और हालात से। सतत संघर्ष।" 
- जयदीप कर्णिक, संपादक, वेबदुनिया
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 3 नवंबर 2014

राष्ट्रवादी तेवर

 जि सकी कथनी-करनी-लेखनी में राष्ट्र सबसे पहले रहा और है। न्यूजरूम में जिसने कागद कारे करने से पहले राष्ट्र का चिंतन किया और करता है। दमदार लेखनी, स्पष्ट सोच, अनथक श्रम करने का माद्दा, घुमक्कड़ी और मिलनसार स्वभाव, ये कुछ गुण हैं जो हितेश शंकर को भीड़ से अलग पहचान दिलाते हैं। 
      महज 36 वर्ष की उम्र में देश के सबसे पुराने हिंदी साप्ताहिक, दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन के वैचारिक मुखपत्र कहे जाने वाले पाञ्चजन्य का, सम्पादक हो जाना कोई मामूली बात नहीं है। पाञ्चजन्य का संपादकत्व संभालने के लिए ध्येयनिष्ठ पके-पकाए आदमी की तलाश होती है। पाञ्चजन्य के पहले संपादक थे श्री अटल बिहारी वाजपेयी और तब से आज तक इस पद के लिए खोज अमूमन पचास बसंत देख चुके अनुभवी पत्रकार पर ही पूरी होती रही है। सम्भवत: यह पहली बार है जब व्यावसायिक पत्रकारिता के मुकाबले राष्ट्रवाद का स्वर प्रखर करने, भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उद्घोष करने के लिए 'पाञ्चजन्य' युवा 'कृष्ण' के हाथ में है। हिन्दुस्तान अखबार के लिए उत्तरप्रदेश में विभिन्न संस्करण जमाने में महती भूमिका निबाहने, एनसीआर के पांच संस्करणों की सफलतापूर्वक संभाल करने के बाद जब हितेश शंकर मेट्रो एडिशन की सम्पादकीय धुरी बने हुए थे तब किसी ने नहीं सोचा था कि देश-दुनिया की समझ रखने वाला बेहद सम्भावनाशील डिप्टी न्यूज एडिटर मुख्यधारा के बड़े ब्रांड की चमक छोड़कर पाञ्चजन्य का रुख करेगा।
      हितेश शंकर का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र को आगे रखे बिना पत्रकारिता संभव ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि अन्य संस्थान राष्ट्रवादी पत्रकारिता से दूर हैं, हां उनके बरक्स पाञ्चजन्य राष्ट्रीयता का मजबूत और शाश्वत प्रहरी है। यानी कह सकते हैं कि दैनिक जागरण, इंडिया टुडे और हिन्दुस्तान सहित पत्रकारिता की तमाम राहों के बाद अब हितेश शंकर को मनमाफिक मार्ग चलने के लिए मिला है। हालांकि यह भी सच है कि इतनी कम उम्र में इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने चलना तब शुरू कर दिया था जब कई दिग्गज घर से निकले भी नहीं थे। कॉलेज में पढ़ाई के साथ ही उन्होंने पत्रकारिता शुरू कर दी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर करने के बाद हितेश एमफिल के लिए जेएनयू कैम्पस पहुंचे लेकिन वहां का माहौल रास नहीं आया। बाद में विज्ञापन और विपणन प्रबंधन की शिक्षा ली। लेकिन विज्ञापन बाजार की चकाचौंध से पीठ फेर पूर्णकालिक पत्रकारिता में कूद पड़े। काबिलियत के दम पर हितेश पत्रकारिता में सोपान-दर-सोपान चढ़ते रहे। बालपन से यात्राओं और अध्ययन में लगे रहे हितेश शंकर पत्रकारिता शुरू करने से पहले पूरे भारत को बेहद करीब से देख चुके थे। वैसे उनका मानना है कि समझ विकसित करने के लिहाज से एक कोस चलना, सौ पेज पढऩे से ज्यादा कारगर होता है। पन्नों और पगडंडियों से अर्जित यही अनुभवजन्य पाथेय पत्रकारिता में उनकी पूंजी है और ताकत भी। वे देश की बोलियों, समाज, संस्कार और संस्कृति को बेहद नजदीक से समझते हैं। 
      हितेश सिर्फ कलमकार ही नहीं बल्कि एक अच्छे चित्रकार रहे हैं और इसीलिए डिजाइन की बारीकियां भी समझते हैं। प्रबंधन के विद्यार्थी होने के नाते बाजार की नब्ज भी पहचानते हैं। उनके आने के साथ पाञ्चजन्य की पाठ्य सामग्री पहले की अपेक्षा ज्यादा धारदार ही नहीं हुई बल्कि इसका कलेवर भी बदला गया है। उनकी ही युवा सोच का नतीजा है कि पाञ्चजन्य अब आधुनिक प्रबंधकीय अपेक्षाओं के अनुरूप टेबलॉइड की काया त्याग कर पत्रिका के रूप में व्यावसायिक पत्रिकाओं से मुकाबला करने के लिए मोर्चाबंदी कर रहा है। वे अभी और नई ऊंचाइयां छूएंगे, नए आसमान रचेंगे, हिन्दी मीडिया उनसे ये उम्मीद कर रहा है। 
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"हिन्दी पत्रकारिता में हितेश शंकर का अपना वजूद है। वह सबसे अलग है। खबरों पर पैनी नजर रहती है। वे छोटे-बड़े मुद्दों की गहरी समझ रखते हैं। हितेश जितने मजबूत संपादन में है, उतनी ही गहरी समझ उन्हें मार्केटिंग की भी है। सही मायने में वे ऑलराउण्डर हैं।" 
- मोहम्मद वकास, पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शनिवार, 1 नवंबर 2014

मिशनरी पत्रकार

 व्या वसायिक पत्रकारिता के दौर में भी पत्रकारिता किसी के लिए मिशन बनी रही तो वह नाम है जयकिशन शर्मा का। सामाजिक चेतना और सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए पत्रकारिता को औजार बनाने वालों में जयकिशन शर्मा का नाम ऊपर आता है। उनका स्पष्ट मानना है कि पत्रकार का मूल कार्य है समाज जागरण करना। पत्रकारिता ही एक ऐसा जरिया है जिससे समाज को उसके अधिकारों, कर्तव्यों और संभावित खतरों के प्रति सचेत किया जा सकता है। 
      समाजोन्मुखी पत्रकारिता के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले जयकिशन शर्मा बताते हैं कि व्यावसायिकता अखबार चलाने के लिए जरूरी है। पत्रकारिता के व्यावसायिक होने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब पत्रकार व्यवसायी हो जाता है तब पत्रकारिता को खतरा होता है। यह पत्रकार को तय करना है कि जो कलम उसने उठाई है, उसका दुरुपयोग नहीं बल्कि जनकल्याण के लिए उसका सदुपयोग हो। 
       62 वर्षीय जयकिशन शर्मा ने अपने 45 वर्षीय पत्रकारिता के कार्यकाल में अनेक पत्रकारों को प्रशिक्षित और संस्कारित किया। ऊर्जा से भरे नौजवानों को पत्रकारिता सिखाने के लिए उन्होंने 'स्वदेश' को 'पाठशाला' बना दिया और स्वयं इस पाठशाला के आचार्य की भूमिका में रहे। सच कहें तो स्वदेश और जयकिशन शर्मा दोनों ही पत्रकारिता की पाठशाला हो गए। उनके सानिध्य में पत्रकारिता सीखे लोग आज हिन्दी मीडिया में अहम पदों पर कार्यरत हैं। सरल हृदय के जयकिशन शर्मा जी सबकी चिंता करते हैं। ग्वालियर में जिस परिसर में स्वदेश का दफ्तर और मशीन लगी है, उसी परिसर में श्री शर्मा का आवास था। युवा पत्रकार अखबार छूटने तक उनके साथ रहकर पत्रकारिता की बारीकियां सीखा करते थे। काम की अधिकता के कारण कई बार कुछ पत्रकार खाना खाने घर नहीं जा पाते थे। जैसे ही यह बात श्री शर्मा को पता चलती तो वे अपने घर पर ही उसके भोजन का प्रबंध करते थे। 
        दैनिक भास्कर के मुकाबले स्वदेश को शीर्ष पर पहुंचाने वाले जयकिशन शर्मा ने सन् 1969 में ग्वालियर से प्रकाशित 'हमारी आवाज' से पत्रकार जीवन की शुरुआत की। 'हमारी आवाज' ही आगे चलकर 'स्वदेश' हो गया। इसके बाद वे रांची चले गए। यहां कुछ वक्त 'रांची एक्सप्रेस' में बिताया। लेकिन, स्वदेश का मोह फिर से खींच लाया। इसके बाद उन्होंने स्वदेश और हिन्दी पत्रकारिता की सेवा को ही अपना ध्येय बना लिया। जयकिशन शर्मा ने करीब 42 वर्ष तक स्वदेश में रहकर हिन्दी पत्रकारिता में अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्होंने हिन्दी के शुद्धिकरण के प्रयास किये। अखबारों में मानक हिन्दी का उपयोग हो, इसके लिए विशेष आग्रह किया। 
      अखबारों को अपना दायरा बढ़ाना चाहिए। नए-नए संस्करण प्रारंभ करने चाहिए। यह विचार जयकिशन शर्मा के मन में आया। इसे मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने स्वदेश के अलग-अलग संस्करण शुरू कराए। प्रयोगधर्मी और नवाचार में विश्वास करने वाले जयकिशन शर्मा ने बाबरी विध्वंस की खबरें पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाने के लिए उस दिन सांध्य स्वदेश ही निकाल दिया। स्वदेश के प्रधान संपादक के पद से सेवानिवृत्त होकर वे 11 फरवरी 2014 से मध्यप्रदेश शासन के सूचना आयुक्त की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। 
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"जयकिशन जी उस परंपरा के पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता, राष्ट्र और समाजोत्थान के लिए सर्वस्व त्याग दिया। हिन्दी पत्रकारिता की उन्होंने बहुत सेवा की है। युवा पीढ़ी के लिए वे आदर्श पत्रकार और प्रेरणास्रोत हैं।"
- भुवनेश तोमर, वरिष्ठ पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" के विशेषांक "हिंदी मीडिया के हीरो" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

टुकड़े-टुकड़े जोड़, जिसने भारत बनाया

 आ धुनिक भारत के शिल्पी सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचार, कर्म और उनकी स्मृतियां मन को रोमांच और गौरव से भर देती हैं। वे ऐसे राष्ट्रभक्त महापुरुष थे जिनके लिए 'राष्ट्र सबसे पहले' था। सरदार सही मायने में राष्ट्रीय एकता के प्रतीक थे और हैं। उनकी जयंती को 'राष्ट्रीय एकता दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लेने के लिए भाजपानीत राजग सरकार की सराहना की जानी चाहिए। भारत की संप्रभुता, एकता और अखण्डता के लिए जीने-मरने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की सूझबूझ का ही नतीजा है कि आज हम एक शक्तिशाली राष्ट्र के नागरिक हैं। दुनिया में भारत एक महाशक्ति है। वरना तो हम अपने महान राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े पकड़कर रो रहे होते। 
तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर कई दफा तरस आता है जो यह स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत को एक देश और राजनीतिक इकाई का रूप देने का श्रेय अंग्रेजों को है। कांग्रेस के ही नेता एवं पूर्व मंत्री पी. चिदम्बरम किसी कार्यक्रम में इंदौर आए हुए थे, तब उन्होंने कहा था कि भला हो अंगे्रजों का जो वे भारत आए और हमें बेहतर बना दिया। वरना हम तो अंधेरे में ही जी रहे थे। लगभग यही बातें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तब कहीं थीं जब वे इंग्लैण्ड गए थे, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से मानद डॉक्टरेट की उपाधि लेने के लिए। तमाम वामपंथी विद्वान भी यही सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं कि भारत को सभ्य और एक तो अंग्रेजों ने बनाया। अंग्रेज न आते तो भारत होता ही नहीं। जबकि वास्तविकता यह है कि अंग्रेजों को भारतीयों से कोई मोहब्बत नहीं थी, न ही वे मानवता में विश्वास करते थे, जो वे भारतीयों के हित की चिन्ता करते। वे लुटेरे थे। लूटने के लिए आए थे। जब वीर प्रसूता मां भारती के लड़ाकों ने अंग्रेजों को ललकारा तब आखिरकर उन्हें यहां से जाना पड़ा। लेकिन, जाते-जाते भारत का सर्वनाश करने के लिए वे अपनी कुटिल चाल चल गए थे। उन्होंने भारत को एक राजनीतिक इकाई नहीं बनाया था बल्कि उन्होंने तो भारत को कई टुकड़ों में बांट दिया था। देशभक्त सरदार वल्लभ भाई पटेल न होते तो आज भारत 562 से भी अधिक टुकड़ों में बंटा होता। वे सरदार पटेल ही थे जिन्होंने भारत को एक किया। अपनी सूझबूझ और नेतृत्व क्षमता के बल पर ही सरदार अलग-अलग झण्डा थामे 562 रियासतों को तिरंगे के नीचे ला सके। यह आसान काम नहीं था। सरदार पटेल के हाथ में यह काम न होता तो शायद यह संभव भी न हो पाता। सरदार के दृढ़ के आगे, उनकी लौह पुरुष की छवि के आगे भोपाल, जूनागढ़ और हैदराबाद के निजामों की भी एक न चली। सरदार पटेल के कारण ही ये सब आज भारत का अभिन्न अंग हैं और यहां कोई विवाद नहीं। वहीं, जम्मू-कश्मीर मसले में जवाहरलाल नेहरू के हस्तक्षेप के कारण आज तक विवाद की स्थितियां बनी हुई हैं। अगर जम्मू-कश्मीर के मामले में नेहरू ने टांग न फंसाई होती, सरदार पटेल को अपने तरीके से समस्या को हल करने दिया गया होता तो आज जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन होता। वह अपने नाम के अनुरूप वाकई 'धरती पर स्वर्ग' होता। 
भारत-पाकिस्तान अलगाव के कारण उपजीं विषम परिस्थितियों के बीच कठोर अनुशासन प्रिय और मितभाषी सरदार वल्लभ भाई पटेल के लिए राष्ट्रीय एकता स्थापित करना चुनौतीपूर्ण कार्य था। लेकिन, तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने देश जोड़कर अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवा दिया। दरअसल, निर्णय लेते वक्त उनके दिमाग में किसी प्रकार की कोई दुविधा नहीं रहती थी। उनकी सोच एकदम स्पष्ट थी- राष्ट्र सबसे पहले। किसी भी कीमत पर देश की एकता जरूरी है। राष्ट्र को एकजुट करने के लिए उन्हें कितनी ही तोहमत झेलनी पड़ी। सरदार सांप्रदायिक हैं, असमझौतावादी हैं, पूंजीपतियों के समर्थक हैं, मुस्लिम विरोधी हैं, वामपक्ष के विरोधी हैं। इस तरह के तमाम आरोप उन पर लगाए गए। लेकिन, आरोपों की परवाह न करते हुए सरदार पूरी तल्लीनता के साथ अपने काम में लगे रहे। निश्चित ही वे अपनी छवि और आरोपों की फिक्र करते तो देश कहीं पीछे छूट जाता। राष्ट्रीय एकता को हम पा नहीं सकते थे। भारत एक देश नहीं बन पाता। सरदार पटेल का ऋण हमेशा भारतीयों के माथे पर रहेगा। उस ऋण से उऋण होना संभव नहीं है। हां, एक तरीका है सरदार पटेल के विचारों और कर्मों को सार्थकता प्रदान करने का। राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए हम 'राष्ट्रीय एकता दिवस' के मौके पर शपथ लें कि हमारे मन-वचन-कर्म से कभी भी, किसी तरह भी राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और संप्रभुता को क्षति न पहुंचे। राज्यों के आपसी विवाद खत्म करने के लिए हमें आगे आएं। भाषाई विवाद से पार पाएं। इन्सानों में धर्म-जाति के आधार पर कोई भेद न करें। सब स्तर पर एकजुट हों। देश की आंतरिक सुरक्षा को बनाए रखने में अपना योगदान थे। राष्ट्र विरोधी विचारों और कार्यों से दूर रहें। राष्ट्र विरोधी तत्वों का पुरजोर विरोध करें। भारत के गौरव को बढ़ाने के लिए अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वाहन करें। 
भारत सरकार ने सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लेकर एकता की भावना के महत्व का भी प्रतिपादन किया है। स्वयं सरदार पटेल एकता को सबसे बड़ी ताकत मानते थे। उनका स्पष्ट कहना था- 'एकता के बिना जनशक्ति शक्ति नहीं है।' उनका यह भी मानना था कि कोई भी विश्वास तब तक मजबूत नहीं होता जब तक उसके पीछे एकता की ताकत न हो। वे कहते थे- 'शक्ति के अभाव में विश्वास किसी काम का नहीं है। विश्वास और शक्ति, दोनों ही किसी भी महान कार्य को करने के लिए अनिवार्य हैं।' उन्होंने भाषणों से ही नहीं बल्कि अपने व्यवहार से भी इन बातों को आगे बढ़ाया था। कई मसलों को लेकर जवाहरलाल नेहरू से उनकी मतभिन्नता थी लेकिन अपनी ओर से उन्होंने यह कभी भी जाहिर नहीं होने दिया। वे अच्छी तरह समझते थे कि महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आपसी एकता और सामंजस्य जरूरी है। व्यक्तिगत हित, मन-मुटाव और मतभिन्नता को उन्होंने कभी अपने पास फटकने नहीं दिया। वे तो देश के लिए सर्वस्व समर्पित करने को निकले थे। उनके लिए बड़े से बड़ा पद प्राप्त करना उद्देश्य नहीं था। देश का मानस उन्हें प्रधानमंत्री बनाना चाहता था लेकिन महात्मा गांधी ने अपने प्रिय जवाहरलाल नेहरू का नाम आगे बढ़ाया। सरदार पटेल ने पद-प्रतिष्ठा की दौड़ से खुद को बाहर रखकर गांधी के सम्मान को बढ़ाया और किसी मौन तपस्वी की तरह वे राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने में लगे रहे। आज के राजनीतिक दलों को सरदार पटेल से यह सीख लेनी चाहिए कि वे राष्ट्रीय एकता के लिए दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आगे आएं। एकजुट हों। देश के सम्मान पर आंच आए तो मिलकर आवाज बुलंद करें। भारत की सुरक्षा के लिए नासूर बन चुकी अवैध घुसपैठ की समस्या पर राजनीति बंद करें। घटनाओं और समस्याओं को अलग-अलग चश्मे से देखना बंद करें। खुली आंखों से स्थितियों को एक समान रूप से देखें। समस्या का समाधान करते समय राजनीतिक स्वार्थ छोड़कर राष्ट्र को पहले रखकर देखें। स्वतंत्र भारत के समस्त नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि सरदार पटेल के काम को आगे बढ़ाने का संकल्प लें। उनकी जयंती को सार्थक बनाएं, इसे कर्मकाण्ड तक सीमित न करें। भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के सरदार पटेल के स्वप्र को हम साकार करें।

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