सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

सपने से निकलेगा अंधविश्वास और अविश्वास

 उ त्तरप्रदेश के उन्नाव जिले का डोडियाखेड़ा गांव दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। भारत की मीडिया ने तो फिलहाल वहीं तम्बू तान लिया है। बाबा शोभन सरकार ने एक सपना देखा और सपने में एक हजार टन सोने का खजाना देखा। खंडहर हो चुके किले के राजा राव रामबक्श बाबा शोभन सरकार के सपने में आए और उन्हें खजाने की जानकारी दी। बाबा ने बिना देरी किए खजाना निकालने के लिए केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत और प्रधानमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखी। सरकार में बैठे नुमाइन्दों की आंखें एक हजार टन सोने के ख्याल से ही चुंधिया गईं। देश की तरक्की के लिए तैयार बैठी सरकार ने बिना सोचे-विचारे 'पहुंचे हुए बाबा' के सपने को सच मानकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को खुदाई के आदेश जारी कर दिए। एक हजार टन सोने का खजाना निकालने के लिए एएसआई ने खुदाई भी शुरू कर दी। एक बाबा के सपने के आधार पर खुदाई शुरू कराने के मसले को लेकर केन्द्र सरकार की देश-दुनिया में थू-थू होने लगी। रायता बहुत फैल गया तो सरकार ने उसे समेटना शुरू कर दिया। कभी सरकार की ओर से तो कभी एएसआई की ओर से कहा जाने लगा कि यह खुदाई बाबा के सपने के आधार पर नहीं बल्कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के सर्वे के आधार पर की जा रही है। सवाल उठता है कि सच यह था तो सरकार इतने दिन से क्यों चुप थी? क्यों देश की छवि धूमिल होने दी जा रही थी? क्यों नहीं तत्काल खजाने की खोज का खण्डन किया गया? आखिर सर्वे और बाबा के सपने में क्या संबंध है? बाबा के सपने के बाद ही क्यों खुदाई की तैयारी की गई? खैर, इन सवालों को यूं ही खड़े छोड़कर जरा दूसरी तरफ बात करते हैं।

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

राष्ट्रवादी विचारधारा का सशक्त प्रहरी ‘प्रवक्ता डॉट कॉम’

 प्र वक्ता डॉट कॉम महज एक बेवसाइट नहीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारों का एक सशक्त प्रहरी है। भारत राष्ट्र के हितचिंतक संजीव सिन्हा की एक सकारात्मक पहल के कारण प्रवक्ता डॉट कॉम के रूप में राष्ट्रीय विचारधारा को जीने वाले लोगों को लेखन के लिए एक सशक्त माध्यम मिला। अभिव्यक्ति की रक्षा करने में भी प्रवक्ता पूरी तरह सफल रहा है। अपनी विचारधारा को लेकर प्रवक्ता और उसके संस्थापक एवं संचालक संजीव सिन्हा जी की स्थिति एकदम स्पष्ट है। कोई दुराव-छिपाव नहीं। दोनों के लिए भारत और सनातन धर्म पहले है। भारत, भारत की परंपरा, उसके धर्म और राष्ट्रीयता के खिलाफ जाने वाले किसी भी विचार और व्यक्ति का दोनों ही प्रखर विरोध करते हैं। अन्यथा तो प्रवक्ता सभी विचारधारा के लोगों को अपनी बात कहने के लिए मंच प्रदान करता है। प्रवक्ता के जुड़े कई लेखक घोर वामपंथी हैं। इस सबके बावजूद यह पोर्टल भारतीयता और प्रखर राष्ट्रवाद का ‘प्रवक्ता’ है। प्रवक्ता डॉट कॉम पर 6000 से ज्यादा लेख हैं। प्रतिदिन 51 हजार से ज्यादा पेज देखे जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रवक्ता से आज 500 से अधिक लेखक जुड़े हैं। यह अपने तरह का रिकॉर्ड है। संभवतः किसी भी वेबपोर्टल से इतनी बड़ी संख्या में लेखक नहीं जुड़े होंगे। ज्यादातर लेखक अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं। स्थापित और ख्यातनाम लेखक प्रवक्ता के पास हैं। इससे समझ सकते हैं कि प्रवक्ता पर प्रकाशित सामग्री काफी समृद्ध है। यही नहीं प्रवक्ता की उपलब्धि यह भी है कि कई गुमनाम लेकिन अच्छे लेखकों को प्रवक्ता के कारण बड़ी प्रसिद्धि मिली। नियमित तौर पर समसामयिक घटनाओं, विषयों और चर्चाओं पर धारधार लेख एवं टिप्पणियों के कारण प्रवक्ता शीघ्र ही बेहद लोकप्रिय हो गया। 
शुरुआती पांच सालों में ही प्रवक्ता डॉट कॉम ने न्यू मीडिया/सोशल मीडिया/वैकल्पिक मीडिया में एक मील का पत्थर स्थापित कर दिया है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रबंधन और संपादक की विचारधारा के कारण जिन विचारों-समाचारों को जगह नहीं मिल सकती उनको वेबपोर्टल पर आसानी के साथ चर्चित कराया जा सकता है। बहस कराई जा सकती है। सकारात्मक परिणाम निकाला जा सकता है। प्रवक्ता पर प्रकाशित होने के बाद कई आलेखों पर अन्य-अन्य मंचों पर भी काफी चर्चा हुई। प्रवक्ता डॉट कॉम पर लगातार छपने के बाद लेखक के रूप में स्थापित होने वाले कई सज्जनों से मेरी सीधी बात होती है। उनका कहना होता है कि पहले कई समाचार-पत्र और पत्रिकाएं उन्हें प्रकाशित ही नहीं करते थे लेकिन अब कभी-कभी ही उनके आलेख, फीचर और साहित्यिक सामग्री को इन पत्र-पत्रिकाओं द्वारा लौटाया जाता है। यानी न्यू मीडिया/सोशल मीडिया/वैकल्पिक मीडिया के सशक्त मंच प्रवक्ता डॉट कॉम ने नए लेखकों, विचारधारा के लेखकों और तथाकथित सेक्यूलरवाद के नाम पर तथ्यों को छिपाए बिना साफ-साफ लिखने वाले लेखकों को अपनी बात सबसे कहने का माध्यम उपलब्ध कराया। साथ ही साथ परंपरागत मीडिया को चेतावनी दी कि तुम नहीं छापोगे-दिखाओगे तो हम छापेंगे, दिखाएंगे और बहस भी कराएंगे। इस सबके बीच प्रवक्ता ने परंपरागत मीडिया को कई लेखक और साहित्यकार भी दिए। 
प्रवक्ता डॉट कॉम के संस्थापक एवं संचालक संजीव सिन्हा जी से मेरी पहली मुलाकात भोपाल में आयोजित मीडिया चौपाल-2012 में हुई थी। हालांकि मैं तीन साल से लगातार प्रवक्ता पर लिख रहा था। इस नाते संजीव जी से परिचय तो पहले से था। मुझे ठीक-ठीक याद है, 2007 में मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, तब मेरी पहली बार संजीव सिन्हा जी से बात हुई थी। तब संजीव जी हितचिंतक ब्लॉग के माध्यम से आभासी दुनिया में सक्रिय थे। प्रवक्ता डॉट कॉम तब नहीं था। दरअसल, मुझे ब्लॉग बनाने के टिप्स चाहिए थे। संजीव जी के साथ इत्मिनान से मेरी बात हुई, कई अच्छे सुझाव उन्होंने मुझे दिए थे। हितचिंतक ब्लॉग सर्वाधिक चर्चित ब्लॉगों में से एक था। एक घोर वामपंथी ब्लॉगर के ब्लॉग पर एक चौकाने वाली घोषणा मैंने देखी/पढ़ी- ‘हितचिंतक और लालमिर्ची ब्लॉग का बहिष्कार किया जाए। ये समाज विरोधी हैं।’ हितचिंतक के जरिए संजीव सिन्हा और लालमिर्ची के जरिए अनिल सौमित्र वामपंथ और वामपंथियों की जबर्दस्त तरीके से पोल खोल रहे थे। इस घोषणा से पहले न तो मैं हितचिंतक-संजीव जी और न ही लालमिर्ची-अनिल जी से परिचित था। यह घोषणा मुझे इन दोनों ब्लॉग का बहिष्कार करने के लिए तो प्रेरित नहीं कर सकी बल्कि इन ब्लॉग तक पहुंचाने का माध्यम जरूर बन गई। एक और मजेदार बात यह हुई कि इससे पहले उक्त ब्लॉग और उसके संचालक से मेरा प्रत्यक्ष परिचय था, मैं उनका सम्मान भी करता था लेकिन इस घोषणा ने उस वामपंथी आदमी की ओछी मानसिकता को प्रदर्शित किया। 
हितचिंतक पर संजीव जी अकेले मोर्चा संभाले हुए थे। राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार के लिए एक सशक्त प्रवक्ता की जरूरत महसूस की जा रही थी। इस जरूरत को निश्चित ही हितचिंतक संजीव सिन्हा ने सही समय पर समझा। परिणाम स्वरूप प्रवक्ता डॉट कॉम का जन्म हुआ। अब राष्ट्रवाद पर लिखने वालों की एक फौज खड़ी हो गई। अब कई हितचिंतक एक ही जगह पर जुट आए। बिना किसी लाभ की स्थिति के पांच साल तक बेवपोर्टल का सफल संचालन वाकई बड़ी बात है। इसके लिए तो संजीव सिन्हा जी का सम्मान होना चाहिए था। लेकिन वे विनय के साथ इस सफलता का सारा श्रेय प्रवक्ता के लेखकों को देते हैं। उनकी बात सही है लेकिन पांच साल तक अपनी गांठ का पैसा लगाकर विचार क्रांति की लौ को जलाए रखना कोई छोटी बात तो नहीं। सभी लेखकों को इतने लम्बे समय तक प्रवक्ता के साथ जोड़े रखना और उन्हें लेखन कार्य में व्यस्त रखना भी काबिलेतारीफ है। प्रवक्ता डॉट कॉम और संजीव सिन्हा एकमय हो गए हैं। बात प्रवक्ता की हो या संजीव सिन्हा की, एक ही है। प्रवक्ता डॉट कॉम महज वेबपोर्टल नहीं वरन सही मायने में राष्ट्रवाद का ‘प्रवक्ता’ है। भारतीय परंपरा का हितचिंतक है। राष्ट्रवादी आंदोलन है। एक विचारधारा भी है। इस सबके बीच प्रवक्ता अभिव्यक्ति का अपना मंच है। 
प्रवक्ता डॉट कॉम की उत्तरोत्तर प्रगति की कामना...... 

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

रावण मारो, शक्तिशाली बनो

 द शहरा आने को है। सब ओर तैयारियां चल रही हैं। मोहल्लों में रहने वाले बच्चे खुद ही रावण तैयार कर रहे हैं जबकि बड़ी मंडलियां चंदा जमा कर रही हैं, बाजार से रेडीमेड बड़ा रावण खरीदा जाएगा। छोटे-बड़े सभी रावणों को गली-मैदान में स्वाह कर दिया जाएगा। उल्लास मनाएंगे कि बुराई का अंत कर दिया। सब माया है। रावण तो जिन्दा है। हम सबके भीतर। तैयारी उसे मारने की होनी चाहिए। भीतर का रावण एक तीर से नहीं मरता, उसके लिए रोज सजग रहना पड़ता है कमान खींचकर, जैसे ही सिर उठाए, तीर छोड़ देना होता है। कई दिन तो रोज उसे मारना पड़ता है। इसके बाद फिर समय-समय पर उसका वध करना होता है। यह सतत प्रक्रिया है। लेकिन, हम मार किसे रहे हैं, बाहर के रावण को, वह भी पुतले को। असल रावण तो जीते रहते हैं, हम में और तुम में। ये हम और तुम का रावण मर गया फिर सब ठीक हो जाएगा। 
अब सवाल यह है कि आखिर भीतर कौन-सा रावण है। लोभ, वासना, बेईमानी, कायरता, आलस, क्रोध, स्वार्थ, कपट, झूठ और फरेब। ये सब भीतर के रावण हैं। इनसे युद्ध मनुष्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। लोभ मनुष्य को भ्रष्टाचारी बनाता है। लोभ ही हमे बेईमान भी बनाता है। अब हम देखें कि लोभ के कारण आज देश की क्या स्थिति है और आम समाज को क्या नुकसान है। लोभ पर शुरुआत से ही काबू नहीं किया गया तो यह बढ़ता ही जाता है। यह कभी-भी कम नहीं होता। लोभी मनुष्य ने पहले हजारों के घोटाले किए फिर लाखों के और अब लाखों के घोटाले उनके लिए घोटाले ही नहीं हैं। क्योंकि लोभ बढ़ गया। यानी भ्रष्टाचार की सीमा बढ़ गई।  देश-समाज का नुकसान ज्यादा बढ़ गया। यही हाल वासना रूपी रावण का है। वासना के फेर में फंसकर अच्छे से अच्छा व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है, क्षणभर में। सिर्फ व्यक्तित्व धूमिल नहीं होता बल्कि उसके साथ जुड़े मानबिन्दुओं पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। यदि धार्मिक चोला ओढ़कर बैठा व्यक्ति काम का शिकार हो जाता है तो लोगों का विश्वास डिगता है। इसका फायदा धर्म-परंपरा विरोधी लोग उठाते हैं। धर्म-परंपरा के नाम पर अपना जीवनयापन कर रहे चारित्रिक रूप से कमजोर व्यक्ति की आड़ में धर्म विरोधी लोग हमलावर भूमिका में आ जाते हैं। वे संबंधित धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। परंपराओं पर अंगुली उठाते हैं। हालांकि जिस धर्म और समाज पर अगुंली उठाई जा रही होती है, वह धर्म और समाज ही चारित्रिक रूप से पतित व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है। रावण को प्रकांड ब्राह्मण बताया जाता है लेकिन इसके बावजूद हिन्दू समाज में उसका आदर नहीं है। कारण, उसका अमर्यादित आचरण। इसलिए आपने जीवनभर में नाम रूपी जो पूंजी कमाई है, उसे बचाए रखना चाहते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करना चाहते हैं तो वासना रूपी रावण का अंत बार-बार करते रहिए। 
दशहरा चूंकि शक्ति का पर्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते हैं। पूर्वजों ने समाज को एक संदेश देने की कोशिश की है कि ताकत हासिल कीजिए। साथ में यह भी संकेत कर दिया कि इसका दुरुपयोग मत कीजिए। गरीब, असहाय पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करें बल्कि उनकी रक्षा के लिए आगे खड़े रहें। साथ ही अन्य लोगों को भी यह आभास बना रहना चाहिए कि यह शक्तिशाली है ताकि वह आप पर हावी न हो सके। कमजोर को हर कोई दबाना चाहता है। भारतीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है। यहां बाहुबली नेतागिरी कर रहे हैं। कमजोर की कोई पूछ नहीं। जो शक्तिशाली है, संगठित वोट बैंक हैं उनकी भारतीय राजनीति में भारी पूछपरख है, मौज भी उनकी ही है। शासन की योजनाएं भी उनके लिए हैं जबकि असंगठित बहुसंख्यक समाज की फिक्र तक किसी को नहीं। उसकी भावनाएं भी गईं चूल्हे में। 
मजबूत और शक्तिशाली दिखने की जरूरत जितनी व्यक्तिगत स्तर पर है, उससे कहीं अधिक एक देश के लिए आवश्यक है। इजराइल के संबंध में समझा जा सकता है। इजराइल छोटा-सा देश है लेकिन साहस उसका किसी ऊंचे पर्वत से भी विशाल है। चारों तरफ से शत्रु देशों से घिरा है लेकिन मजाल है कि कोई उसकी तरफ आंख उठाकर देख जाए। इजराइल ने अपनी शक्तिशाली छवि यूं ही नहीं बनाई है। उसने करके दिखाया है। अपने शत्रुओं को ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध में ऐसा नहीं दिखता। पाकिस्तान बार-बार गुर्राता है। भारत की ओर आंखें तरेरता है। चार युद्ध हारने के बाद भी उसकी इतनी हिम्मत भारत की सुरक्षात्मक नीति के कारण है। भारत सरकार बार-बार उसके अमर्यादित व्यवहार को माफ करती है। जबकि होना यह चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से कोई संदिग्ध गतिविधि की आशंका दिखे तो घटना घटने से पहले ही भारत की ओर से कार्रवाई कर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आ जाए। वह भारत विरोधी कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा। 
दशहरा महज उल्लास का पर्व नहीं है। बल्कि बहुत कुछ संकेत की भाषा में बताने की कोशिश करता है। अपने भीतर के तमाम रावणों को मारो-जलाओ बाकि बाहर सब ठीक हो जाएगा। खुद सशक्त बनो तो समाज ताकतवर बनेगा और देश को भी मजबूती मिलेगी। आखिर लोकतंत्र है भारत में, नेता इसी समाज से चुनकर जाने हैं। जैसा हम समाज बनाएंगे, वैसे ही नेता चुने जाएंगे। लोभ, लालच, स्वार्थ सहित अन्य सारे रावणों पर विजय पा लेंगे तभी तो हम आने वाले वक्त में सही चुनाव कर सकेंगे। तो खींच लो कमान अब ज्यादा वक्त नहीं बचा।  

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

यशवंत ने 68 दिन में जेल को बना लिया जानेमन

 भ ड़ास ब्लॉग और भड़ास4मीडिया वेबसाइट के संस्थापक एवं संचालक यशवंत सिंह ने एक मामले में 68 दिन जेल में जिए। डासना जेल में। यहां मैंने 'जिए' शब्द जानबूझकर इस्तेमाल किया है। यशवंतजी ने जेल में दिन काटे नहीं थे वरन इन दिनों को उन्होंने बड़े मौज से जिया और सदुपयोग भी किया। यह बात आप उनके जेल के संस्मरणों का दस्तावेज 'जानेमन जेल' पढ़कर बखूबी समझ सकेंगे। दरअसल, मीडिया संस्थानों के भीतरखाने की खबरें उजागर कर उन्होंने कई 'रूपर्ट मर्डोक' से सीधा बैर ले रखा है। उनको जेल की राह दिखाने में ऐसे ही 'सज्जनों' का हाथ था। यह दीगर बात है कि उनके इस अंदाजेबयां से लाखों लोग (पत्रकार-गैर पत्रकार) उनके साथ आ गए हैं। दोस्त भी बन गए हैं। 
'जानेमन जेल' के मुखपृष्ठ पर जेल जाते हुए यशवंत सिंह का फोटो छपा है, जो उनके सहयोगी और भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह ने खींचा था। बाद में, उन्हें भी पकड़कर जेल में डाल दिया गया था। यशवंत के जेल जाने से दु:खी अनिल सिंह यह फोटो खींचने की स्थिति में नहीं थे। यशवंतजी ने बड़ी जिरह की और अनिल को कहा कि भाई मेरी बात मान ले फोटो खींच ले, यह मौका बार-बार नहीं आता। किताब में कुल जमा 112 पृष्ठ हैं। लेकिन पाठक जब किताब पढऩा शुरू करेगा तो संभवत: 112 वें पृष्ठ पर जाकर ही रुकेगा। यशवंत सिंह बहुत ही सरल शब्दों में सरस ढंग से अपनी बात आगे बढ़ाने हैं। जेल के भीतर के दृश्यों को तो निश्चित ही उन्होंने सजीव कर दिया है। पढऩे वाले को लगेगा कि सब उसकी आंखों के सामने किसी फिल्म की तरह चल रहा है। 'जानेमन जेल' में यशवंत सिंह ने भारतीय जेलों की अव्यवस्थाओं को भी बखूबी दिखाया है। भारत में डासना जेल की तरह ही लगभग सभी जेलों में क्षमता से कहीं अधिक कैदी-बंदी बंद हैं। इस कारण तमाम परेशानियां खड़ी होती हैं। 
किताब में यशवंत सिंह ने जेल में कैदियों-बंदियों की दिनचर्या और आपसी रिश्तों को भी खूब समझाया है। जेल के एकांत में कुछ लोग अपने किए पर पछताते हैं और बाहर निकलकर एक नई शुरुआत की योजना बनाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बैठे-बैठे बदला लेने की प्लानिंग भी करते रहते हैं, हालांकि जेल से छूटने तक इनमें से भी कई लोगों का मन बदल जाता है। वाकई जेल है तो सुधारगृह की तरह। अब यह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह सुधरता है या जैसा गया था वैसा ही निकलता है। जेल में स्वास्थ्य दुरुस्त रखने के लिए खेल की सुविधा के साथ ही योग कक्षाएं भी हैं। पढऩे के लिए पुस्तकालय भी। योग कक्षा और पुस्तकालय का यशवंत जी ने बड़ा अच्छा इस्तेमाल किया। एक अच्छी किताब 'जानेमन जेल' को पढऩे के साथ ही पाठकों को एक अध्याय में कई और अच्छी किताबों की जानकारी भी मिलेगी। जिन्हें यशवंतजी ने पढ़ा और अपने पाठकों को भी पढऩे की सलाह देते हैं। साथ ही कुछ ऐसी किताबों के भी नाम आपको पता चलेंगे जो जेल में 'सुपरहिट' हैं। आप भी जान पाएंगे कि जेल में कैदी 'सुपरहिट' किताबों को पढऩे के लिए कितने लालायित रहते हैं। जो कैदी-बंदी पढ़ नहीं सकते, वे सुनने के लिए तरसते हैं। अभी तक मैं सोचता था कि खुशवंत सिंह सरीखे बड़े लेखक 'औरतें' किसके लिए लिखते हैं, अब समझ में आया कि भारत की जेलों में भी बड़ी संख्या में उनका पाठक वर्ग है। हालांकि 'जानेमन जेल' में खुशवंत सिंह की किसी किताब का जिक्र नहीं हुआ है। लेकिन, मेरा पक्का दावा है कि जेल की लाइब्रेरी में उनकी एक भी किताब होगी तो वह जरूरी किसी बैरक में, किसी कैदी-बंदी के तकिए के नीचे छिपी होगी। 
यशवंत सिंह के जेल से बाहर निकलने के बाद के भी कुछ संस्मरण भी 'जानेमन जेल' में हैं। पत्रकारिता और भड़ास से जुड़े सभी पत्रकार और अन्य लोगों को किताब जरूरी पढऩी चाहिए, यह मेरी सलाह और निवेदन है। किताब खरीदकर पढि़ए, हालांकि मैंने मुफ्त में पढ़ी है। भोपाल में मीडिया एक्टिविस्ट अनिल सौमित्र जी की लाइब्रेरी में यह किताब देखी तो अपुन झट से निकालकर ले आए। किताबों के मामले में अपुन हिसाब-किताब ठीक रखते हैं, वापस भी करने जाएंगे भई। ऐसे पत्रकार जो सोशल मीडिया से जुड़े हैं, उन्हें यह किताब हौसला देगी। कभी जेल जाने की नौबत आए तो क्या करना है, कैसे जेल में रहना है, इस सबके लिए गाइड भी करेगी। 'जानेमन जेल' के जरिए यशवंत भाई ने जेल को पिकनिक स्पॉट की तरह पेश किया है। किताब मंगाने के लिए पाठक यशवंत सिंह से सीधे संपर्क कर सकते हैं। 
मोबाइल : 9999330099
ईमेल : yashwant@bhadas4media.com
वेबसाइट : bhadas4media.com
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किताब : जानेमन जेल
मूल्य : 95 रुपए
प्रकाशक : हिन्द-युग्म
1, जिया सराय, हौज खास, नईदिल्ली-110016

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