रविवार, 22 दिसंबर 2013

खजुराहो के कंदारिया महादेव से भी विशाल है ककनमठ

 मं दिर, मठ या अन्य पूजा स्थल महज धार्मिक महत्व के स्थल नहीं होते हैं। ये अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था के गवाह होते हैं। अपने में एक इतिहास समेटकर खड़े रहते हैं। उनको समझने वाले लोगों से वे संवाद भी करते हैं। ग्वालियर से करीब ७० किलोमीटर दूर मुरैना जिले के सिहोनिया गांव में स्थित ककनमठ मंदिर इतिहास और वर्तमान के बीच ऐसी ही एक कड़ी है। मंदिर का निर्माण ११वीं शताब्दी में कछवाह (कच्छपघात) राजा कीर्तिराज ने कराया था। उनकी रानी का नाम था ककनावती। रानी ककनावती शिवभक्त थीं। उन्होंने राजा के समक्ष एक विशाल शिव मंदिर बनवाने की इच्छा जाहिर की। विशाल परिसर में शिव मंदिर का निर्माण किया गया। चूंकि शिव मंदिर को मठ भी कहा जाता है और रानी ककनावती के कहने पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया था, इसलिए मंदिर का नाम ककनमठ रखा गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् श्री जयंत तोमर बताते हैं कि सिहोनिया कभी सिंह-पानी नगर था। बाद में अपभ्रंश होकर यह सिहोनिया हो गया। यह ग्वालियर अंचल का प्राचीन और समृद्ध नगर था। यह नगर कछवाह वंश के राजाओं की राजधानी था। इसकी उन्नति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ग्वालियर अंचल के संग्रहालयों में संरक्षित अवशेष सबसे अधिक सिहोनिया से प्राप्त किए गए हैं। श्री तोमर बताते हैं कि तोमर वंश के राजा महिपाल ने ग्वालियर किले पर सहस्त्रबाहु मंदिर का निर्माण कराया था। सहस्त्रबाहु मंदिर के परिसर में लगाए गए शिलालेख में अंकित है कि सिंह-पानी नगर (अब सिहोनिया) अद्भुत है।

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

शिवराज को मिला जनआशीर्वाद

 म ध्यप्रदेश की जनता ने शिवराज सरकार में भरोसा दिखाया है। भारी बहुमत से जनता ने भाजपा को राज्य की कुर्सी सौंपी है। भाजपा को 165 सीटों पर विजय मिली है। पिछले चुनाव से 22 सीट अधिक। कांग्रेस 58 सीट पर सिमट गई। उसे इस चुनाव में फायदा होने की जगह पिछले चुनाव के मुकाबले 13 सीट का नुकसान हो गया। यह जीत चौंकाने वाली है, भाजपा के लिए भी और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी। दरअसल, 'महाराज' ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश में चुनाव प्रचार की कमान सौंपकर कांग्रेस ने मुकाबला पेचीदा बना दिया था। बेहद कमजोर दिख रही कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जान फूंक दी थी। कांग्रेस पूरी ताकत के साथ भाजपा से मुकाबला करने खड़ी हो गई। माना जा रहा था कि कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी और भाजपा पूरी ताकत लगाने के बाद बमुश्किल 120 सीट जीत सकेगी। एक अनुमान यह भी था कि कांग्रेस भी सत्ता हासिल कर सकती है। दो बार से प्रदेश की राजगद्दी से नीचे खड़ी कांग्रेस एक बार फिर सरकार में वापसी करना चाहती थी, इसके लिए तमाम गुटों ने एकजुटता दिखाने की भी कोशिश की। 'युवराज' राहुल गांधी ने भी खास फोकस किया मध्यप्रदेश के चुनाव पर, टिकट वितरण पर भी। यानी कांग्रेस की सारी कवायद देखकर अचानक से यह लगा था कि भाजपा के लिए आसान दिख रहा मुकाबला काफी कड़ा होगा। नतीजा शिवराज सिंह चौहान सहित पूरा भाजपा संगठन जबर्दस्त प्रचार अभियान पर निकल लिया। आखिरकार 'फिर भाजपा-फिर शिवराज' का नारा लेकर चुनावी रण में उतरी भाजपा और शिवराज सिंह चौहान को जनआशीर्वाद मिल गया है। 
मौटेतौर पर देखा जाए तो मध्यप्रदेश में भाजपा की जीत शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रिय छवि की जीत है। सरकार की लोककल्याणकारी और लोक लुभावन योजनाओं की जीत है। भाजपा की विचारधारा की जीत है। नरेन्द्र मोदी फैक्टर का भी असर है। भाजपा इसे सुशासन की भी जीत मान रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कई सरकारी योजनाओं से लोगों के दिलों में घर कर लिया है। लाड़ली लक्ष्मी योजना, कन्यादान योजना और बेटी बचाओ अभियान से जहां उन्होंने महिला वर्ग में खुद का महिला हितैषी ब्रांड बनाया वहीं बुजुर्गों को मुफ्त में तीर्थदर्शन करवाकर उनके वोट अपनी झोली में डाल लिए। अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए शिवराज सिंह चौहान जनआशीर्वाद मांगने के लिए प्रदेश के शहर-शहर और गांव-गांव तक पहुंचे। इस दौरान उन्होंने स्वयं की और सरकार की जमकर ब्रांडिंग की। हालांकि सरकार की तरफ से जनता के बीच सब अच्छा-अच्छा था, ऐसा भी नहीं था। प्रदेश सरकार के बहुतेरे मंत्रियों और विधायकों को लेकर जनता में भारी आक्रोश था। यही कारण है कि जनआशीर्वाद यात्रा और चुनाव प्रचार के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने प्रत्याशी के लिए वोट न मांगकर अपने नाम पर मतदान करने की अपील जनता से की। चुनाव से पूर्व टिकट वितरण में भाजपा ने काफी हद तक सावधानी बरतकर इस जीत की राह बनाई थी। करीब ५० टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया गया। ज्यादातर नए चेहरे जीते हैं जबकि पांच-छह मंत्री, जिनके टिकट कट जाने चाहिए थे लेकिन किसी कारणवश कट नहीं सके, वे चुनाव हार गए। शिवराज सिंह चौहान ने इस चुनावी लड़ाई को आम आदमी बनाम महाराज भी बना दिया था। निश्चित यह तरकीब शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में काम कर गई। शिवराज समझ रहे थे कि लोगों को अब राजनीति में अपने बीच का नेता ही चाहिए, राजवंश या खास परिवार की राजनीति के दिन लद गए हैं। नतीजों में यह दिखा भी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने ही गढ़ में कांग्रेस को बहुत अधिक सीट नहीं जितवा सके। यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया का नया चेहरा, ईमानदार छवि और महाराज वाला असर कांग्रेस के किसी काम नहीं आया। हां, यह बात अलग है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को और पहले काम करने का मौका कांग्रेस ने दिया होता तो शायद कुछ संभावना बनती, कांग्रेस के मजबूत होने की। संभवत: कांग्रेस की रणनीति रही होगी कि नवमतदाता यानी यूथ वोटर को सिंधिया के ग्लैमर से आकर्षित कर लिया जाए। लेकिन, नवमतदाताओं में तो नरेन्द्र मोदी का असर था। केन्द्र के चुनाव के लिए मोदी की तैयारी को मजबूत करने के लिए भी युवाओं ने अभी भाजपा को वोट दिया। केन्द्र में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए भाजपा को मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत की दरकार थी। यही कारण था कि मोदी ने चारों राज्यों में अथक चुनाव प्रचार किया। कई सभाएं लीं। एक ही दिन में अलग-अलग राज्यों में जनता को संबोधित किया। नतीजों में इसका असर भी दिखा है। मध्यप्रदेश में भी जहां-जहां नरेन्द्र मोदी ने सभा को संबोधित किया किया, वहां-वहां भाजपा के हित में नतीजे आए। 
मध्यप्रदेश के विकास को भी शिवराज सिंह चौहान ने चुनाव के दौरान बड़ा मुद्दा बनाया। शिवराज सिंह चौहान ने अपने भाषणों में जनता को दिग्विजय सिंह के शासन काल की याद दिलाई। कांग्रेस के ६० साल के विकास से अपने १० साल के विकास की तुलना कराई। उन्होंने जनता से वादा भी किया कि भाजपा को फिर सरकार में आई तो विकास की रफ्तार और तेज होगी। इस बात में कोई शंका नहीं कि पिछले १० साल में मध्यप्रदेश में काफी काम हुए हैं। यह जनता को दिख भी रहा था। यानी यह भी कहा जा सकता है कि सरकार ने विकास ने नाम पर जीत हासिल की है। अब देखना है कि भाजपा और उनके लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनता की भावनाओं को कैसे संभालकर रखते हैं। जनआशीर्वाद का कितना सम्मान करेंगे। जनादेश का कितना पालन करेंगे। इस बार शिवराज सिंह चौहान और भाजपा संगठन को इस बात पर सख्त होना पड़ेगा कि सरकार में भ्रष्टाचार न पनपे। साथ ही नेता जीत के बाद लापता न हो जाएं, जनता के बीच रहें, जनता के बीच दिखें, जनता के सुख-दु:ख में शामिल हों, जनता की समस्याएं सुनें और उनकी परेशानियों को दूर करने की दिशा में पहल करते दिखें। लगातार तीसरी बार जीत है, बड़ी जीत है, तो भाजपा गुरूर न करे। अदब से जनादेश को स्वीकार करें और विकास की पार्टी के रूप में बनी अपनी छवि को साबित करे।
इधर, भोपाल में शिवराज सिंह चौहान ने मीडिया से बात करते हुए भारी बहुमत के लिए जनता को धन्यवाद दिया। कार्यकर्ताओं की मेहनत को स्वीकार किया। प्रदेश से लेकर केन्द्रीय नेताओं का सहयोग के लिए आभार जताया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि जनता ने जिस उम्मीद और भरोसे के साथ भाजपा को फिर से सरकार बनाने का मौका दिया है, हम उस उम्मीद और भरोसे के लिए दिन-रात काम करेंगे। मध्यप्रदेश की जनता की सेवा के लिए रात-दिन एक कर देंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आम चुनाव में केन्द्र में सरकार बनाने के लिए मध्यप्रदेश अन्य राज्यों के अनुपात में अधिक सीटें देगा। बहरहाल, भाजपा के हौंसले बुलंद हैं, इस जीत से। दिल्ली में हुई प्रेसवार्ता में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा है कि शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश में तीसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालेंगे। बड़ी जीत और तीसरी पारी से शिवराज सिंह चौहान की केन्द्र में स्थिति मजबूत होगी और भूमिका भी बढ़ेगी। 

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

पेड न्यूज बनाम विश्वसनीयता

 भा रत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है। लोकतांत्रिक सरकार के चुनाव में देश का प्रत्येक व्यक्ति हिस्सेदार होता है। इसमें मीडिया की भी अहम भूमिका होती है। अखबार और न्यूज चैनल्स लगातार सत्य और तथ्यात्मक खबरें प्रकाशित कर अपनी साख आम आदमी के बीच बनाते हैं। यही कारण है कि मीडिया की खबरों से पाठकों का मानस बनता और बदलता है। समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स लगातार सत्तारूढ़ दल और अन्य राजनीतिक दलों के संबंध में नीर-क्षीर रिपोर्ट प्रकाशित करते हैं। मौके पर जनता अपने मताधिकार का उपयोग सही नेताओं और सरकार को चुनने में करे, इसके लिए एक तस्वीर मीडिया की इन खबरों से बनती है। लेकिन, कुछ वर्षों से पेड न्यूज का चलन बढ़ गया है। पेड न्यूज यानी ऐसी खबर जिसे प्रकाशित करने के लिए रुपए या अन्य किसी प्रकार का आर्थिक सौदा किया गया हो। पेड न्यूज यानी नोट के बदले खबर छापना। पेड न्यूज का ही असर है कि जिस सामग्री को विज्ञापन के रूप में प्रकाशित/प्रसारित होना चाहिए था वो समाचार के रूप में लोगों के पास पहुंच रही है। यानी पाठक/दर्शक को सीधे तौर पर भ्रमित किया जा रहा है। अखबार या न्यूज चैनल के प्रति जो पाठक/दर्शक का विश्वास है उसका मजाक बनाया जा रहा है। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान, जब मीडिया को तथ्यात्मक और निष्पक्ष समाचार प्रकाशित करने चाहिए थे, तब पेड न्यूज का बाजार गर्म है। महसूस होता है कि पेड न्यूज के सिन्ड्रोम में अब मीडिया का नीर-क्षीर वाला विवेक कहीं खो गया लगता है। वैसे भी जबसे पत्रकारिता के संस्थानों में कॉर्पोरेट कल्चर बढ़ा है, आर्थिक लाभ विश्वास की पूंजी कमाने से अधिक प्राथमिक हो गया है। 
वर्ष २००९ में लोकसभा के चुनाव के दौरान पेड न्यूज के कई मामले सामने आए थे। पहली बार पेड न्यूज एक बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई थी। अखबारों और न्यूज चैनल्स ने बकायदा राजनीतिक पार्टी और नेताओं की खबरें प्रकाशित/प्रसारित करने के लिए पैकेज लांच किए थे। यानी राजनीति से जुड़ी खबरें वास्तविक नहीं थीं। जिसने ज्यादा पैसे खर्च किए उस पार्टी/नेता के समर्थन में उतना बढिय़ा कवरेज। जिसने पैसा खर्च नहीं किया उसके लिए कोई जगह नहीं थी। इस दौरान कई राजनेताओं ने सबूत के साथ मीडिया पर आरोप लगाए कि उनके समर्थन में खबरें छापने के लिए पैसा वसूला गया है या वसूला जा रहा है। कई मीडिया संस्थान तो चुनाव लडऩे वाले नेताओं पर न्यूज कवरेज के पैकेज लेने के लिए दबाव भी बना रहे थे। जिन नेताओं ने ये पैकेज नहीं लिए उनके खिलाफ नकारात्मक खबरें प्रकाशित कर उन पर दबाव बनाया गया। यही नहीं कई नेता तो तगड़ा धन खर्च कर विरोधी नेता के खिलाफ नकारात्मक खबरें तक प्लांट कराने में सफल रहे। आंध्रप्रदेश की लोकसत्ता पार्टी के उम्मीदवार पी. कोडंडा रामा राव ने तो प्रेस काउंसिल को जो चुनाव खर्च का ब्योरा दिया, उसमें साफ बताया कि उन्होंने कितना पैसा मीडिया कवरेज पाने के लिए खर्च किया। पेड न्यूज सिन्ड्रोम पर इसके बाद जो बहस का दौर चला, उसमें मीडिया संस्थानों की काफी किरकिरी हुई। उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हुए। 
भारतीय प्रेस परिषद, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन, एडिटर गिल्ड ऑफ इंडिया, संसद की स्थायी समिति, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, प्रसार भारती और भारतीय निर्वाचन आयोग सहित मीडिया के क्षेत्र में काम कर रहे अन्य संगठनों, बुद्धिजीवियों ने पेड न्यूज सिन्ड्रोम पर चिंता जाहिर की। इससे उपजने वाले खतरों से आगाह किया। पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए उपाय करने पर विचार किया। इसके लिए देश के प्रतिष्ठित और क्षेत्रीय समाचार माध्यमों से अपेक्षा कि वे स्वत: ही इस दिशा में कुछ करें। आखिर यह उनकी भी विश्वसनीयता का सवाल है। लेकिन, जैसा कि हम समझ सकते हैं कि आसानी के साथ धन बनाने के माध्यम को इतनी आसानी से कोई नहीं छोड़ सकता। खासकर उसका इस्तेमाल कर चुके लोग/संस्थान। पेड न्यूज पर मचे हो-हल्ले के कारण अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखना और साबित करना देश के नामचीन मीडिया घरानों के सामने चुनौती बन गया। देश के छोटे से बड़े सभी मीडिया संस्थानों ने इस बात की घोषणा तो की कि वे पेड न्यूज परंपरा का विरोध करते हैं और अपने समाचार-पत्र और पत्रिका में पेड न्यूज नहीं छापेंगे। न्यूज चैनल पर पेड न्यूज नहीं दिखाएंगे। लेकिन चुनावी समय में इन मीडिया संस्थानों की सब घोषणाएं और विरोध धरा रह जाता है। वे पेड न्यूज को लेकर पहले से काफी सतर्क हो जाते हैं। एक ओर तो तमाम संस्थान अपने समाचार-पत्र में बकायदा पेड न्यूज के खिलाफ अभियान चलाते हैं, पेड न्यूज के खिलाफ विज्ञापन छापते हैं और लोगों को पेड न्यूज की शिकायत करने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन दूसरी ओर पेड न्यूज का तरीका बदलकर समाचार बेचने का व्यापार किया जाता है। पेड न्यूज के लिए नए तरीके खोज लिए गए हैं। अब पैसा लेकर किसी पार्टी/नेता समर्थन में कैंपेनिंग करने और विज्ञापन को समाचार की शक्ल में प्रकाशित/प्रसारित करने से कुछ हद तक मीडिया संस्थान बच रहे हैं। अब मीडिया घरानों के द्वारा राजनीतिक दल/नेता से वादा किया जाता है कि आप धन दीजिए, आपके खिलाफ कोई खबर प्रकाशित/प्रसारित नहीं की जाएगी। आपकी गलतियों, भ्रष्टाचार और कमजोरियों को जनता के सामने नहीं रखा जाएगा। आपके खिलाफ आ रही नकारात्मक खबरों को हम अपने समाचार-पत्र/न्यूज चैनल में जगह नहीं देंगे। मतलब साफ है मीडिया संस्थानों में पेड न्यूज का चलन जारी है। पहले खुला खेल फर्रूखावादी था अब वे कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं। दरअसल, पत्रकारिता की आड़ में धन कमाने की लोलुपता इतनी अधिक बढ़ गई है कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी, सिद्धांत और मूल्य चूल्हे में चले गए हैं। 
अगर पेड न्यूज को सिर्फ राजनीतिक खबरों तक नहीं बांधा जाए तो मीडिया संस्थान सालभर इस गोरखधंधे में लगे रहते हैं। व्यापारिक और कई सामाजिक संगठनों से पैसे लेकर उनके समर्थन में खबरें प्रकाशित/प्रसारित करना भी तो पेड न्यूज के दायरे में आता है। पेड न्यूज का ही असर है कि कोई संस्था भले ही कितना अच्छा काम कर रही हो लेकिन उससे संबंधित समाचारों को समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स में जगह नहीं मिलती। दरअसल, होता यह है कि उसी तरह की अन्य संस्थाएं मीडिया को मैनेज करके चलती हैं। कार्यक्रम कवरेज करने के लिए संस्थानों को विज्ञापन के रूप में धन दिया जाता है। जो संस्था विज्ञापन नहीं देती, उसके समाचार प्रकाशित नहीं किए जाते। जो संस्था विज्ञापन देती है, उसके किसी कार्यक्रम के आयोजन का समाचार चार दिन बाद भी प्रकाशित किया जा सकता है। इस तरह के समाचारों से भी मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। 
पैसा लेकर खबर छापना/दिखाना एक सामान्य अपराध नहीं है बल्कि यह नैतिक अपराध है। यह पाठक और दर्शक की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। आम दिनों की अपेक्षा चुनाव के नजदीक या चुनाव के दौरान पेड न्यूज के जरिए आम जनता से धोखाधड़ी अधिक गंभीर होती है। मीडिया लोकतंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मीडिया के प्रति जनमानस में यह विश्वास है कि मीडिया आम आदमी की आवाज बनकर उसकी समस्याएं तो उठाता ही है साथ ही देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थिति पर भी नजर रखता है। चूंकि आम आदमी अपना मानस समाचार-पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट पढ़कर और न्यूज चैनल्स पर प्रसारित खबरें देखकर बना रहा है। उसे भरोसा होता है कि समाचार माध्यम पुख्ता और सही जानकारी उस तक पहुंचा रहे हैं। लोगों तक सच पहुंचाना ही तो मीडिया की जिम्मेदारी है। मीडिया को सच का प्रहरी ही तो माना जाता है। मीडिया खुद भी स्वयं को लोकतंत्र का चौथा खंबा मानता है। लोकतंत्र में खुद को वॉच डॉग की भूमिका में मानता है। ऐसे में चुनाव के समय में पेड न्यूज कहीं न कहीं लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विपरीत असर डालती हैं। संभवत: यही कारण है कि सालभर चलने वाली पेड न्यूज की अपेक्षा चुनाव के वक्त राजनीतिक खबरों की खरीद-फरोख्त पर अधिक चिंता जताई जाती है। पेड न्यूज सिन्ड्रोम भारतीय पत्रकारिता के समक्ष एक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। एक तरफ पैसा है और दूसरी तरफ विश्वसनीयता। स्वस्थ लोकतंत्र और विश्वसनीय पत्रकाारिता के लिए पेड न्यूज की बीमारी पर जल्द काबू पाना होगा। बीमारी और अधिक बढ़ी तो बहुत नुकसान करेगी। समय रहते इसका इलाज जरूरी है। पेड न्यूज के दायरे और उसकी परिभाषा को जानकर तो लगता है कि किसी कानून की मदद से उस पर रोक लगा पाना मुश्किल है। इसके लिए स्वार्थ और धन लोलुपता छोड़कर मीडिया संस्थानों को ही आगे आना पड़ेगा।  आखिर सबसे बड़ा सवाल मीडिया की विश्वसनीयता का है। यदि पेड न्यूज को दूर नहीं किया तो भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता जाती रहेगी, फिर उसकी किसी बात पर कोई आसानी से भरोसा नहीं करेगा। जब लोगों को ही मीडिया पर भरोसा नहीं रहेगा तो राजनीतिक दल/नेता क्यों अपनी खबरें छपवाने/दिखवाने के लिए पैसा खर्चा करेंगे। तब मीडिया के पास न धन आएगा और न ही विश्वसनीयता बची रहेगी। इसलिए अच्छा होगा पेड न्यूज के चलन को खत्म करने के लिए अभी कुछ ठोस उपाय किए जाएं।
- मीडिया विमर्श में प्रकाशित आलेख 

रविवार, 17 नवंबर 2013

मन बस गया बस्तर में

 छ त्तीसगढ़ की राजनीतिक राजधानी जरूर रायपुर है लेकिन छत्तीसगढ़ का असली रंग तो बस्तर में ही है। संभवत: यही कारण है कि बस्तर को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। अहो बस्तर, तुम भाग्यशाली हो, अभी भी प्रकृति की गोद में हो। इंद्रावति नदी तुमको सिंचित करती है। वरना तो विकास के नाम पर कितने शहर कांक्रीट के जंगल बन गए। सघन वन, ऊंचे-नीचे पहाड़ और आदिवासी लोकरंग से समृद्ध है बस्तर। बस्तर का जिला मुख्यालय जगदलपुर शहर है। जगदलपुर राजधानी रायपुर से करीब 305 किलोमीटर दूर स्थित है। सड़क मार्ग से जगदलपुर पहुंचने में 5 से 6 घंटे का सफर तय करना पड़ता है। सड़क मार्ग के दोनों और हरे-भरे, ऊंचे और घने पेड़ हैं, जो खूबसूरत बस्तर की तस्वीर दिखाते हैं। ये नजारे कहते हैं कि अगर आप घुमक्कड़ हो तो सही जगह आए हो, स्वागत है तुम्हारा। 
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से एक शोध कार्य के संदर्भ में बस्तर जाने का मौका मिला। पांच दिन बस्तर की वादियों और बस्तर के सरल स्वभाव के लोगों के बीच रहना हुआ। बस्तर की ज्यादातर आबादी वनवासी (आदिवासी) है। कुछ आबादी देश के अन्य प्रान्तों से आकर बस गई है या बसाई गई है। ग्वालियर-चंबल संभाग के भिण्ड जिले के प्रेम भदौरिया बताते हैं कि काफी पहले उनका परिवार भिण्ड से कारोबार के लिए जगदलपुर आया था। यहां की आबोहवा इतनी रास आई कि वे यहीं बस गए। वे बताते हैं कि बस्तर के एक राजा ने ग्वालियर-चंबल संभाग के कई ठाकुरों को यहां लाकर बसाया था। वनवासी समाज के बीच यहां एक गांव ठाकुरों का भी है। व्यापार करने के लिए मारवाडिय़ों ने भी यहां दुकानें जमा रखी हैं। उड़ीसा से बस्तर बेहद नजदीक है। यही कारण है कि उड़ीसा के लोग भी यहां आकर बस गए हैं। बस्तर के लोग भी कामकाज और बेहतर इलाज के लिए विशाखापट्नम जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश रावल बताते हैं कि मूलत: वे भी उड़ीसा के हैं। काफी पहले यहां आकर बस गए हैं। बस्तर को समझने और देखने में श्री सुरेश रावल का बहुत सहयोग मिला। एक ढाबा पर, एक ही टेबल पर हम चार लोग खाना खा रहे थे। इनमें से एक पंजाब, दूसरा उड़ीसा, तीसरा उत्तरप्रदेश और चौथा यानी मैं मध्यप्रदेश का मूल निवासी था। मुझे छोड़कर बाकी के तीन सज्जन बस्तर में ही रच-बस गए थे। यानी कह सकते हैं बस्तर छत्तीसगढ़ी संस्कृति का गढ़ तो है ही देशभर की साझा संस्कृति की झलक भी यहां देखने मिलती है।

सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

सपने से निकलेगा अंधविश्वास और अविश्वास

 उ त्तरप्रदेश के उन्नाव जिले का डोडियाखेड़ा गांव दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। भारत की मीडिया ने तो फिलहाल वहीं तम्बू तान लिया है। बाबा शोभन सरकार ने एक सपना देखा और सपने में एक हजार टन सोने का खजाना देखा। खंडहर हो चुके किले के राजा राव रामबक्श बाबा शोभन सरकार के सपने में आए और उन्हें खजाने की जानकारी दी। बाबा ने बिना देरी किए खजाना निकालने के लिए केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत और प्रधानमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखी। सरकार में बैठे नुमाइन्दों की आंखें एक हजार टन सोने के ख्याल से ही चुंधिया गईं। देश की तरक्की के लिए तैयार बैठी सरकार ने बिना सोचे-विचारे 'पहुंचे हुए बाबा' के सपने को सच मानकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को खुदाई के आदेश जारी कर दिए। एक हजार टन सोने का खजाना निकालने के लिए एएसआई ने खुदाई भी शुरू कर दी। एक बाबा के सपने के आधार पर खुदाई शुरू कराने के मसले को लेकर केन्द्र सरकार की देश-दुनिया में थू-थू होने लगी। रायता बहुत फैल गया तो सरकार ने उसे समेटना शुरू कर दिया। कभी सरकार की ओर से तो कभी एएसआई की ओर से कहा जाने लगा कि यह खुदाई बाबा के सपने के आधार पर नहीं बल्कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के सर्वे के आधार पर की जा रही है। सवाल उठता है कि सच यह था तो सरकार इतने दिन से क्यों चुप थी? क्यों देश की छवि धूमिल होने दी जा रही थी? क्यों नहीं तत्काल खजाने की खोज का खण्डन किया गया? आखिर सर्वे और बाबा के सपने में क्या संबंध है? बाबा के सपने के बाद ही क्यों खुदाई की तैयारी की गई? खैर, इन सवालों को यूं ही खड़े छोड़कर जरा दूसरी तरफ बात करते हैं।

सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

राष्ट्रवादी विचारधारा का सशक्त प्रहरी ‘प्रवक्ता डॉट कॉम’

 प्र वक्ता डॉट कॉम महज एक बेवसाइट नहीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारों का एक सशक्त प्रहरी है। भारत राष्ट्र के हितचिंतक संजीव सिन्हा की एक सकारात्मक पहल के कारण प्रवक्ता डॉट कॉम के रूप में राष्ट्रीय विचारधारा को जीने वाले लोगों को लेखन के लिए एक सशक्त माध्यम मिला। अभिव्यक्ति की रक्षा करने में भी प्रवक्ता पूरी तरह सफल रहा है। अपनी विचारधारा को लेकर प्रवक्ता और उसके संस्थापक एवं संचालक संजीव सिन्हा जी की स्थिति एकदम स्पष्ट है। कोई दुराव-छिपाव नहीं। दोनों के लिए भारत और सनातन धर्म पहले है। भारत, भारत की परंपरा, उसके धर्म और राष्ट्रीयता के खिलाफ जाने वाले किसी भी विचार और व्यक्ति का दोनों ही प्रखर विरोध करते हैं। अन्यथा तो प्रवक्ता सभी विचारधारा के लोगों को अपनी बात कहने के लिए मंच प्रदान करता है। प्रवक्ता के जुड़े कई लेखक घोर वामपंथी हैं। इस सबके बावजूद यह पोर्टल भारतीयता और प्रखर राष्ट्रवाद का ‘प्रवक्ता’ है। प्रवक्ता डॉट कॉम पर 6000 से ज्यादा लेख हैं। प्रतिदिन 51 हजार से ज्यादा पेज देखे जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रवक्ता से आज 500 से अधिक लेखक जुड़े हैं। यह अपने तरह का रिकॉर्ड है। संभवतः किसी भी वेबपोर्टल से इतनी बड़ी संख्या में लेखक नहीं जुड़े होंगे। ज्यादातर लेखक अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं। स्थापित और ख्यातनाम लेखक प्रवक्ता के पास हैं। इससे समझ सकते हैं कि प्रवक्ता पर प्रकाशित सामग्री काफी समृद्ध है। यही नहीं प्रवक्ता की उपलब्धि यह भी है कि कई गुमनाम लेकिन अच्छे लेखकों को प्रवक्ता के कारण बड़ी प्रसिद्धि मिली। नियमित तौर पर समसामयिक घटनाओं, विषयों और चर्चाओं पर धारधार लेख एवं टिप्पणियों के कारण प्रवक्ता शीघ्र ही बेहद लोकप्रिय हो गया। 
शुरुआती पांच सालों में ही प्रवक्ता डॉट कॉम ने न्यू मीडिया/सोशल मीडिया/वैकल्पिक मीडिया में एक मील का पत्थर स्थापित कर दिया है। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रबंधन और संपादक की विचारधारा के कारण जिन विचारों-समाचारों को जगह नहीं मिल सकती उनको वेबपोर्टल पर आसानी के साथ चर्चित कराया जा सकता है। बहस कराई जा सकती है। सकारात्मक परिणाम निकाला जा सकता है। प्रवक्ता पर प्रकाशित होने के बाद कई आलेखों पर अन्य-अन्य मंचों पर भी काफी चर्चा हुई। प्रवक्ता डॉट कॉम पर लगातार छपने के बाद लेखक के रूप में स्थापित होने वाले कई सज्जनों से मेरी सीधी बात होती है। उनका कहना होता है कि पहले कई समाचार-पत्र और पत्रिकाएं उन्हें प्रकाशित ही नहीं करते थे लेकिन अब कभी-कभी ही उनके आलेख, फीचर और साहित्यिक सामग्री को इन पत्र-पत्रिकाओं द्वारा लौटाया जाता है। यानी न्यू मीडिया/सोशल मीडिया/वैकल्पिक मीडिया के सशक्त मंच प्रवक्ता डॉट कॉम ने नए लेखकों, विचारधारा के लेखकों और तथाकथित सेक्यूलरवाद के नाम पर तथ्यों को छिपाए बिना साफ-साफ लिखने वाले लेखकों को अपनी बात सबसे कहने का माध्यम उपलब्ध कराया। साथ ही साथ परंपरागत मीडिया को चेतावनी दी कि तुम नहीं छापोगे-दिखाओगे तो हम छापेंगे, दिखाएंगे और बहस भी कराएंगे। इस सबके बीच प्रवक्ता ने परंपरागत मीडिया को कई लेखक और साहित्यकार भी दिए। 
प्रवक्ता डॉट कॉम के संस्थापक एवं संचालक संजीव सिन्हा जी से मेरी पहली मुलाकात भोपाल में आयोजित मीडिया चौपाल-2012 में हुई थी। हालांकि मैं तीन साल से लगातार प्रवक्ता पर लिख रहा था। इस नाते संजीव जी से परिचय तो पहले से था। मुझे ठीक-ठीक याद है, 2007 में मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, तब मेरी पहली बार संजीव सिन्हा जी से बात हुई थी। तब संजीव जी हितचिंतक ब्लॉग के माध्यम से आभासी दुनिया में सक्रिय थे। प्रवक्ता डॉट कॉम तब नहीं था। दरअसल, मुझे ब्लॉग बनाने के टिप्स चाहिए थे। संजीव जी के साथ इत्मिनान से मेरी बात हुई, कई अच्छे सुझाव उन्होंने मुझे दिए थे। हितचिंतक ब्लॉग सर्वाधिक चर्चित ब्लॉगों में से एक था। एक घोर वामपंथी ब्लॉगर के ब्लॉग पर एक चौकाने वाली घोषणा मैंने देखी/पढ़ी- ‘हितचिंतक और लालमिर्ची ब्लॉग का बहिष्कार किया जाए। ये समाज विरोधी हैं।’ हितचिंतक के जरिए संजीव सिन्हा और लालमिर्ची के जरिए अनिल सौमित्र वामपंथ और वामपंथियों की जबर्दस्त तरीके से पोल खोल रहे थे। इस घोषणा से पहले न तो मैं हितचिंतक-संजीव जी और न ही लालमिर्ची-अनिल जी से परिचित था। यह घोषणा मुझे इन दोनों ब्लॉग का बहिष्कार करने के लिए तो प्रेरित नहीं कर सकी बल्कि इन ब्लॉग तक पहुंचाने का माध्यम जरूर बन गई। एक और मजेदार बात यह हुई कि इससे पहले उक्त ब्लॉग और उसके संचालक से मेरा प्रत्यक्ष परिचय था, मैं उनका सम्मान भी करता था लेकिन इस घोषणा ने उस वामपंथी आदमी की ओछी मानसिकता को प्रदर्शित किया। 
हितचिंतक पर संजीव जी अकेले मोर्चा संभाले हुए थे। राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार के लिए एक सशक्त प्रवक्ता की जरूरत महसूस की जा रही थी। इस जरूरत को निश्चित ही हितचिंतक संजीव सिन्हा ने सही समय पर समझा। परिणाम स्वरूप प्रवक्ता डॉट कॉम का जन्म हुआ। अब राष्ट्रवाद पर लिखने वालों की एक फौज खड़ी हो गई। अब कई हितचिंतक एक ही जगह पर जुट आए। बिना किसी लाभ की स्थिति के पांच साल तक बेवपोर्टल का सफल संचालन वाकई बड़ी बात है। इसके लिए तो संजीव सिन्हा जी का सम्मान होना चाहिए था। लेकिन वे विनय के साथ इस सफलता का सारा श्रेय प्रवक्ता के लेखकों को देते हैं। उनकी बात सही है लेकिन पांच साल तक अपनी गांठ का पैसा लगाकर विचार क्रांति की लौ को जलाए रखना कोई छोटी बात तो नहीं। सभी लेखकों को इतने लम्बे समय तक प्रवक्ता के साथ जोड़े रखना और उन्हें लेखन कार्य में व्यस्त रखना भी काबिलेतारीफ है। प्रवक्ता डॉट कॉम और संजीव सिन्हा एकमय हो गए हैं। बात प्रवक्ता की हो या संजीव सिन्हा की, एक ही है। प्रवक्ता डॉट कॉम महज वेबपोर्टल नहीं वरन सही मायने में राष्ट्रवाद का ‘प्रवक्ता’ है। भारतीय परंपरा का हितचिंतक है। राष्ट्रवादी आंदोलन है। एक विचारधारा भी है। इस सबके बीच प्रवक्ता अभिव्यक्ति का अपना मंच है। 
प्रवक्ता डॉट कॉम की उत्तरोत्तर प्रगति की कामना...... 

शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

रावण मारो, शक्तिशाली बनो

 द शहरा आने को है। सब ओर तैयारियां चल रही हैं। मोहल्लों में रहने वाले बच्चे खुद ही रावण तैयार कर रहे हैं जबकि बड़ी मंडलियां चंदा जमा कर रही हैं, बाजार से रेडीमेड बड़ा रावण खरीदा जाएगा। छोटे-बड़े सभी रावणों को गली-मैदान में स्वाह कर दिया जाएगा। उल्लास मनाएंगे कि बुराई का अंत कर दिया। सब माया है। रावण तो जिन्दा है। हम सबके भीतर। तैयारी उसे मारने की होनी चाहिए। भीतर का रावण एक तीर से नहीं मरता, उसके लिए रोज सजग रहना पड़ता है कमान खींचकर, जैसे ही सिर उठाए, तीर छोड़ देना होता है। कई दिन तो रोज उसे मारना पड़ता है। इसके बाद फिर समय-समय पर उसका वध करना होता है। यह सतत प्रक्रिया है। लेकिन, हम मार किसे रहे हैं, बाहर के रावण को, वह भी पुतले को। असल रावण तो जीते रहते हैं, हम में और तुम में। ये हम और तुम का रावण मर गया फिर सब ठीक हो जाएगा। 
अब सवाल यह है कि आखिर भीतर कौन-सा रावण है। लोभ, वासना, बेईमानी, कायरता, आलस, क्रोध, स्वार्थ, कपट, झूठ और फरेब। ये सब भीतर के रावण हैं। इनसे युद्ध मनुष्य की प्राथमिकता होनी चाहिए। लोभ मनुष्य को भ्रष्टाचारी बनाता है। लोभ ही हमे बेईमान भी बनाता है। अब हम देखें कि लोभ के कारण आज देश की क्या स्थिति है और आम समाज को क्या नुकसान है। लोभ पर शुरुआत से ही काबू नहीं किया गया तो यह बढ़ता ही जाता है। यह कभी-भी कम नहीं होता। लोभी मनुष्य ने पहले हजारों के घोटाले किए फिर लाखों के और अब लाखों के घोटाले उनके लिए घोटाले ही नहीं हैं। क्योंकि लोभ बढ़ गया। यानी भ्रष्टाचार की सीमा बढ़ गई।  देश-समाज का नुकसान ज्यादा बढ़ गया। यही हाल वासना रूपी रावण का है। वासना के फेर में फंसकर अच्छे से अच्छा व्यक्तित्व धूमिल हो जाता है, क्षणभर में। सिर्फ व्यक्तित्व धूमिल नहीं होता बल्कि उसके साथ जुड़े मानबिन्दुओं पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा होता है। यदि धार्मिक चोला ओढ़कर बैठा व्यक्ति काम का शिकार हो जाता है तो लोगों का विश्वास डिगता है। इसका फायदा धर्म-परंपरा विरोधी लोग उठाते हैं। धर्म-परंपरा के नाम पर अपना जीवनयापन कर रहे चारित्रिक रूप से कमजोर व्यक्ति की आड़ में धर्म विरोधी लोग हमलावर भूमिका में आ जाते हैं। वे संबंधित धर्म पर आक्षेप लगाते हैं। परंपराओं पर अंगुली उठाते हैं। हालांकि जिस धर्म और समाज पर अगुंली उठाई जा रही होती है, वह धर्म और समाज ही चारित्रिक रूप से पतित व्यक्ति को स्वीकार नहीं करता है। रावण को प्रकांड ब्राह्मण बताया जाता है लेकिन इसके बावजूद हिन्दू समाज में उसका आदर नहीं है। कारण, उसका अमर्यादित आचरण। इसलिए आपने जीवनभर में नाम रूपी जो पूंजी कमाई है, उसे बचाए रखना चाहते हैं, अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करना चाहते हैं तो वासना रूपी रावण का अंत बार-बार करते रहिए। 
दशहरा चूंकि शक्ति का पर्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने हथियारों की पूजा करते हैं। पूर्वजों ने समाज को एक संदेश देने की कोशिश की है कि ताकत हासिल कीजिए। साथ में यह भी संकेत कर दिया कि इसका दुरुपयोग मत कीजिए। गरीब, असहाय पर अपनी ताकत का इस्तेमाल नहीं करें बल्कि उनकी रक्षा के लिए आगे खड़े रहें। साथ ही अन्य लोगों को भी यह आभास बना रहना चाहिए कि यह शक्तिशाली है ताकि वह आप पर हावी न हो सके। कमजोर को हर कोई दबाना चाहता है। भारतीय राजनीति इसका अच्छा उदाहरण है। यहां बाहुबली नेतागिरी कर रहे हैं। कमजोर की कोई पूछ नहीं। जो शक्तिशाली है, संगठित वोट बैंक हैं उनकी भारतीय राजनीति में भारी पूछपरख है, मौज भी उनकी ही है। शासन की योजनाएं भी उनके लिए हैं जबकि असंगठित बहुसंख्यक समाज की फिक्र तक किसी को नहीं। उसकी भावनाएं भी गईं चूल्हे में। 
मजबूत और शक्तिशाली दिखने की जरूरत जितनी व्यक्तिगत स्तर पर है, उससे कहीं अधिक एक देश के लिए आवश्यक है। इजराइल के संबंध में समझा जा सकता है। इजराइल छोटा-सा देश है लेकिन साहस उसका किसी ऊंचे पर्वत से भी विशाल है। चारों तरफ से शत्रु देशों से घिरा है लेकिन मजाल है कि कोई उसकी तरफ आंख उठाकर देख जाए। इजराइल ने अपनी शक्तिशाली छवि यूं ही नहीं बनाई है। उसने करके दिखाया है। अपने शत्रुओं को ईंट का जवाब पत्थर से दिया है। जबकि भारत और पाकिस्तान के संबंध में ऐसा नहीं दिखता। पाकिस्तान बार-बार गुर्राता है। भारत की ओर आंखें तरेरता है। चार युद्ध हारने के बाद भी उसकी इतनी हिम्मत भारत की सुरक्षात्मक नीति के कारण है। भारत सरकार बार-बार उसके अमर्यादित व्यवहार को माफ करती है। जबकि होना यह चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से कोई संदिग्ध गतिविधि की आशंका दिखे तो घटना घटने से पहले ही भारत की ओर से कार्रवाई कर दी जानी चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पाकिस्तान की अक्ल ठिकाने आ जाए। वह भारत विरोधी कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगा। 
दशहरा महज उल्लास का पर्व नहीं है। बल्कि बहुत कुछ संकेत की भाषा में बताने की कोशिश करता है। अपने भीतर के तमाम रावणों को मारो-जलाओ बाकि बाहर सब ठीक हो जाएगा। खुद सशक्त बनो तो समाज ताकतवर बनेगा और देश को भी मजबूती मिलेगी। आखिर लोकतंत्र है भारत में, नेता इसी समाज से चुनकर जाने हैं। जैसा हम समाज बनाएंगे, वैसे ही नेता चुने जाएंगे। लोभ, लालच, स्वार्थ सहित अन्य सारे रावणों पर विजय पा लेंगे तभी तो हम आने वाले वक्त में सही चुनाव कर सकेंगे। तो खींच लो कमान अब ज्यादा वक्त नहीं बचा।  

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

यशवंत ने 68 दिन में जेल को बना लिया जानेमन

 भ ड़ास ब्लॉग और भड़ास4मीडिया वेबसाइट के संस्थापक एवं संचालक यशवंत सिंह ने एक मामले में 68 दिन जेल में जिए। डासना जेल में। यहां मैंने 'जिए' शब्द जानबूझकर इस्तेमाल किया है। यशवंतजी ने जेल में दिन काटे नहीं थे वरन इन दिनों को उन्होंने बड़े मौज से जिया और सदुपयोग भी किया। यह बात आप उनके जेल के संस्मरणों का दस्तावेज 'जानेमन जेल' पढ़कर बखूबी समझ सकेंगे। दरअसल, मीडिया संस्थानों के भीतरखाने की खबरें उजागर कर उन्होंने कई 'रूपर्ट मर्डोक' से सीधा बैर ले रखा है। उनको जेल की राह दिखाने में ऐसे ही 'सज्जनों' का हाथ था। यह दीगर बात है कि उनके इस अंदाजेबयां से लाखों लोग (पत्रकार-गैर पत्रकार) उनके साथ आ गए हैं। दोस्त भी बन गए हैं। 
'जानेमन जेल' के मुखपृष्ठ पर जेल जाते हुए यशवंत सिंह का फोटो छपा है, जो उनके सहयोगी और भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर अनिल सिंह ने खींचा था। बाद में, उन्हें भी पकड़कर जेल में डाल दिया गया था। यशवंत के जेल जाने से दु:खी अनिल सिंह यह फोटो खींचने की स्थिति में नहीं थे। यशवंतजी ने बड़ी जिरह की और अनिल को कहा कि भाई मेरी बात मान ले फोटो खींच ले, यह मौका बार-बार नहीं आता। किताब में कुल जमा 112 पृष्ठ हैं। लेकिन पाठक जब किताब पढऩा शुरू करेगा तो संभवत: 112 वें पृष्ठ पर जाकर ही रुकेगा। यशवंत सिंह बहुत ही सरल शब्दों में सरस ढंग से अपनी बात आगे बढ़ाने हैं। जेल के भीतर के दृश्यों को तो निश्चित ही उन्होंने सजीव कर दिया है। पढऩे वाले को लगेगा कि सब उसकी आंखों के सामने किसी फिल्म की तरह चल रहा है। 'जानेमन जेल' में यशवंत सिंह ने भारतीय जेलों की अव्यवस्थाओं को भी बखूबी दिखाया है। भारत में डासना जेल की तरह ही लगभग सभी जेलों में क्षमता से कहीं अधिक कैदी-बंदी बंद हैं। इस कारण तमाम परेशानियां खड़ी होती हैं। 
किताब में यशवंत सिंह ने जेल में कैदियों-बंदियों की दिनचर्या और आपसी रिश्तों को भी खूब समझाया है। जेल के एकांत में कुछ लोग अपने किए पर पछताते हैं और बाहर निकलकर एक नई शुरुआत की योजना बनाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बैठे-बैठे बदला लेने की प्लानिंग भी करते रहते हैं, हालांकि जेल से छूटने तक इनमें से भी कई लोगों का मन बदल जाता है। वाकई जेल है तो सुधारगृह की तरह। अब यह व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वह सुधरता है या जैसा गया था वैसा ही निकलता है। जेल में स्वास्थ्य दुरुस्त रखने के लिए खेल की सुविधा के साथ ही योग कक्षाएं भी हैं। पढऩे के लिए पुस्तकालय भी। योग कक्षा और पुस्तकालय का यशवंत जी ने बड़ा अच्छा इस्तेमाल किया। एक अच्छी किताब 'जानेमन जेल' को पढऩे के साथ ही पाठकों को एक अध्याय में कई और अच्छी किताबों की जानकारी भी मिलेगी। जिन्हें यशवंतजी ने पढ़ा और अपने पाठकों को भी पढऩे की सलाह देते हैं। साथ ही कुछ ऐसी किताबों के भी नाम आपको पता चलेंगे जो जेल में 'सुपरहिट' हैं। आप भी जान पाएंगे कि जेल में कैदी 'सुपरहिट' किताबों को पढऩे के लिए कितने लालायित रहते हैं। जो कैदी-बंदी पढ़ नहीं सकते, वे सुनने के लिए तरसते हैं। अभी तक मैं सोचता था कि खुशवंत सिंह सरीखे बड़े लेखक 'औरतें' किसके लिए लिखते हैं, अब समझ में आया कि भारत की जेलों में भी बड़ी संख्या में उनका पाठक वर्ग है। हालांकि 'जानेमन जेल' में खुशवंत सिंह की किसी किताब का जिक्र नहीं हुआ है। लेकिन, मेरा पक्का दावा है कि जेल की लाइब्रेरी में उनकी एक भी किताब होगी तो वह जरूरी किसी बैरक में, किसी कैदी-बंदी के तकिए के नीचे छिपी होगी। 
यशवंत सिंह के जेल से बाहर निकलने के बाद के भी कुछ संस्मरण भी 'जानेमन जेल' में हैं। पत्रकारिता और भड़ास से जुड़े सभी पत्रकार और अन्य लोगों को किताब जरूरी पढऩी चाहिए, यह मेरी सलाह और निवेदन है। किताब खरीदकर पढि़ए, हालांकि मैंने मुफ्त में पढ़ी है। भोपाल में मीडिया एक्टिविस्ट अनिल सौमित्र जी की लाइब्रेरी में यह किताब देखी तो अपुन झट से निकालकर ले आए। किताबों के मामले में अपुन हिसाब-किताब ठीक रखते हैं, वापस भी करने जाएंगे भई। ऐसे पत्रकार जो सोशल मीडिया से जुड़े हैं, उन्हें यह किताब हौसला देगी। कभी जेल जाने की नौबत आए तो क्या करना है, कैसे जेल में रहना है, इस सबके लिए गाइड भी करेगी। 'जानेमन जेल' के जरिए यशवंत भाई ने जेल को पिकनिक स्पॉट की तरह पेश किया है। किताब मंगाने के लिए पाठक यशवंत सिंह से सीधे संपर्क कर सकते हैं। 
मोबाइल : 9999330099
ईमेल : yashwant@bhadas4media.com
वेबसाइट : bhadas4media.com
-------------------------------
किताब : जानेमन जेल
मूल्य : 95 रुपए
प्रकाशक : हिन्द-युग्म
1, जिया सराय, हौज खास, नईदिल्ली-110016

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

थैंक्स अ लॉट जेन

 ज र्मन युवती जेन वॉन रेबनाउ ने भारत के संदर्भ में अपने अनुभव साझा किए हैं। जेन के अनुभव भारत और भारतीय समाज को सुखद और गर्व की अनुभूति कराते हैं। सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जेन ने अमेरिकन युवती मिशेल क्रॉस को करारा जवाब दिया है। स्टडी ट्रिप पर भारत आई मिशेल ने यहां से जाने के बाद भारत को औरतों के लिए नरक बताया था। खासकर विदेशी युवतियों के लिए भारत को एक तरह से वाहियात बताया था। मिशेल ने ब्लॉग पर अपने अनुभव लिखे थे कि किस तरह भारतीय पुरुष लंपटों की तरह उसके रंग और सीने को घूरते थे। कभी-कभी तो पीछे ही पड़ जाते थे। इतना ही नहीं कुछ मौकों पर तो उसका रेप होते-होते बचा। मिशेल के अनुभवों से सभ्य भारतीय समाज ने लज्जा का अनुभव किया। शर्म से भारत का सिर झुक गया था। हालांकि हम भी जानते हैं कि मिशेल ने जो लिखा वह सच है लेकिन यह पूरे भारत का सच नहीं। इस तरह के लोग तो सभी देशों में पाए जाते हैं। ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, चीन, अफ्रीका, अफगानिस्तान और अरब देश सहित अन्य देशों में भारतीय महिला-पुरुषों के साथ भी कई मौकों पर अभद्र व्यवहार होता है। खासकर सिख समाज को कई बार बेहद लज्जाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन, यह तो कभी किसी ने नहीं कहा कि ये देश महिलाओं के लिए नरक हैं। लेकिन, भारत के प्रबुद्ध वर्ग की ओर से मिशेल को कोई जवाब नहीं दिया गया। अच्छा ही रहा। एक तो स्वयं अपनी वकालात करते तो शायद तथ्यों को उतनी स्वीकार्यता नहीं मिलती जितनी कि जर्मन युवती जेन की कथ्य से मिली है। दूसरा यह कि चलो अच्छा हुआ मिशेल ने अपने अनुभव साझा किए, इससे हमें आत्म चिंतन करने का मौका मिला। 
मिशेल की तरह ही जेन वॉन रेबनाउ भी भारत स्टडी टूर पर आई। महीनों भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहीं। दर्शन की छात्रा जेन भारत ही नहीं दुनिया के अन्य देशों की सैर भी कर चुकी हैं। जेन लिखती हैं कि वे मिशेल क्रॉस के अनुभवों को कई बार पढ़ चुकी हैं। मेरे लिए भारत के अनुभव सकारात्मक और रोमांचक हैं। भारतीयों के आतिथ्य से मैं काफी प्रभावित हूं। इसके बाद जेन ने अपने ब्लॉग पर मिशेल के अनुभवों का जवाब बिन्दुवार दिया है। वे कहती हैं कि हम आम भारतीयों से अलग दिखते हैं तो स्वाभाविक है कि वे हमें घूरेंगे ही। हम भी तो उन्हें घूरते हैं। वे हमारे फोटो खींचते हैं, मोबाइल में वीडियो बनाते हैं तो इसे हम अपनी निजता का हनन मानते हैं जबकि हम तो उनसे भी अधिक फोटो बिना इजाजत खींचते हैं। फिर इसमें फर्क क्यों? जेन लिखती हैं कि इटली में पुरुष महिलाओं को घूरते हैं तो इसे तारीफ समझा जाता है जबकि भारत में यौन शोषण, यह दोहरा मापदण्ड क्यों? जेन ने इस तरह से मिशेल के तमाम आपत्तियों को सिरे से खारिज किया है। वे भारतीयों की मेहमाननवाजी की कायल हो गईं और तारीफ करते नहीं थकतीं। उनका कहना है कि उनके बाकी दोस्तों के अनुभव भी भारत के संदर्भ में ऐसे ही सकारात्मक हैं। भारतीय संस्कृति से अभिभूत जेन बार-बार भारत आने की इच्छा जाहिर करती हैं। भारत के सकारात्मक पक्ष को दुनिया के सामने रखने के लिए हम भारतवासी उनका धन्यवाद करते हैं। भारत में जेन, उनके दोस्त और मिशेल सहित अन्य विदेशी पर्यटकों, छात्रों का स्वागत है। जरा-सी सावधानी आप बरतें तो भारत सभी के लिए स्वर्ग ही होगा। हम राम-कृष्ण के हामी है, प्रेम में भरोसा करते हैं। 
हाल के दिनों में कुछेक बेहद दर्दनाक और शर्मनाक घटनाएं भारत में हुईं। दिल्ली गैंगरेप और मुबंई रेपकाण्ड सहित अन्य घटनाओं ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर नारी को देवी के समान आदर देने वाले देश में उसे रौंदा जा रहा है। आखिर देश में चल क्या रहा है? मीडिया से लेकर प्रबुद्ध वर्ग की चिंताओं में भारत की जो छवि सामने आई वह वाकई सोचने वाली थी कि क्या सिर्फ इसी देश में महिलाओं की बदतर स्थिति है? बाकि दुनिया महिलाओं के लिए मुफीद है। अगर हम ऐसा मानते हैं तो यह एक झूठ के सिवा कुछ न होगा। सउदी अरब में महिलाएं अकेली घर के बाहर भी नहीं निकल सकतीं, उनके साथ किसी पुरुष को होना जरूरी है। यहां तक की घर में घुसने-निकलने के लिए महिला-पुरुषों के दरवाजे भी अलग-अलग हैं। तालिबान ने तो महिला शिक्षा की बात कर रही महज १५ साल की बच्ची मलाला यूसुफजई को गोली मार दी थी, उसकी किस्मत थी कि वह बच गई। पाकिस्तान में ९० फीसदी से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार रहती हैं। माली में भी महिलाओं को घर से बाहर जाने के लिए पुरुष की इजाजत लेनी पड़ती है। सोमालिया भी महिलाओं के लिए एक बुरा देश माना जाता है। माली और सोमालिया में ९० फीसदी महिलाओं के गुप्तांग के अंग-भंग करने की बात सामने आई है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो को दुनिया की 'रेप की राजधानी' कहा जाता है। यहां महिलाओं का उपयोग युद्ध में भी किया जाता है। इसके अलावा भी कई देश हैं जहां महिलाओं को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ब्राजील, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैण्ड में भी महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं आम हैं। 
दूसरे देशों के हाले-बयां करके यहां इस बात की तरफदारी करने की कोशिश कतई नहीं की जा रही है कि जब सब जगह ऐसा है तो भारत में ऐसी घटनाओं पर चिल्ला-तौबा क्यों? और न ही महिलाओं की अस्मिता पर नजर गड़ाने वाले भेडिय़ों का बचाव किया जा रहा है। बल्कि यह कहने का प्रयास है कि भारत को इसी रूप में पेश न किया जाए, भारत के सकारात्मक पक्षों पर भी बात की जाए। साथ ही महिलाओं के प्रति दुराचार की एक घटना भी न घट सके इसके लिए ठोस काम करने की जरूरत है। भारत दुनिया की श्रेष्ठ सभ्यता और संस्कृतियों के मालिकों में से एक है। भारत के मान को बनाए रखना और उसके गौरव को बढ़ाने की जिम्मेदारी  हम सभी भारतीयों के कंधों पर है। पूरी कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि देश की ही नहीं विदेश से आने वाली एक भी महिला को अपमानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। बाहर से आने वाली प्रत्येक महिला जर्मन छात्रा जेन वॉन रेबनाउ की तरह भारत में मिले मान-सम्मान से अभिभूत होकर जाए और बार-बार यहां की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाने के लिए आती रहे। जब भी भारत का जिक्र चले, वे धन्यवाद भारत कहें और हमें थैंक्स अ लॉट जेन की जगह वेलकम जेन कहने की आदत पड़ जाए।
---------------------------------------------------------------------------------
मिशेल क्रॉस के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/the-india-you-will-ashamed-to-know-us-students-haunting-account-1-740198.html
जेन वॉन रेबनाउ के अनुभव -
http://aajtak.intoday.in/story/india--a-blonde-tourist-an-alternate-account-1-740836.html

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

तीसरी बार जनआशीर्वाद या परिवर्तन

लोकप्रिय मुख्यमंत्री के सहारे महासमर में भाजपा

 म ध्यप्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज हो गई हैं। रोमांच दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। दोनों मुख्य राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, रथ पर सवार होकर जनता के बीच पहुंच रहे हैं। भाजपा मुख्यमंत्री के नेतृत्व में जनआशीर्वाद यात्रा निकाल रही है तो कांग्रेस भाजपा के खिलाफ परिवर्तन यात्रा। आरोप-प्रत्यारोप के शब्दवाण दोनों ओर से जारी हैं। दिग्गजों ने मचान कस लिए हैं। अभी आ रहीं बौछारें बता रही हैं बादल बहुत घने हैं। चुनाव घमासान होने हैं। मुकुट किसके माथे सजेगा, ये तो युद्ध के बाद ही पता चलेगा। फिर भी राजनीतिक विश्लेषण अपनी जगह हैं। अभी तक के सर्वेक्षण बता रहे हैं कि भाजपा इस बार भी शिव के सहारे चुनावी वैतरणी पार कर जाएगी। पांच बार लोकसभा सांसद रह चुके और पिछले आठ साल से प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह बेहद लोकप्रिय नेता हो गए हैं। प्रदेश के प्रत्येक जातिवर्ग, संप्रदाय, पुरुष-महिलाएं, आयुवर्ग उन्हें बराबर से अपना नेता मानते हैं।
प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान बेहद विनम्र हैं। उनके भाषण का लहजा मतदाताओं को अपने मोहपाश में बांध लेता है। घोषणाएं करने में तो उनकी कोई सानी नहीं है। सिर्फ घोषणाएं ही उनके खाते में नहीं हैं बल्कि तमाम लोक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से भी उन्होंने मध्यप्रदेश की जनता का दिल जीता है। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के माध्यम से शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने वंचित, गरीब और पिछड़े लोगों के बीच जगह बनाई तो लाडली लक्ष्मी योजना ने तो उन्हें जगत मामा ही बना दिया। महिलाओं के हित की बात कर उन्होंने आधी आबादी को अपने हिस्से में कर लिया है। शिवराज सिंह चौहान जानते हैं कि अब समाज की वह स्थिति नहीं रही कि महिलाएं अपने पति के बताए निशान पर ठप्पा लगाएं। वे अपने विवेक का इस्तेमाल कर अपनी पसंद के नेता के नाम के आगे का बटन दबाकर वोट का उपयोग कर रही हैं। इसलिए महिलाओं के हित में सरकार के प्रयास शिवराज सिंह चौहान को एक बड़ा वोट बैंक उपलब्ध कराते हैं। घर के बुजुर्गों को भी खुश करने का इंतजाम मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना के जरिए शिवराज सिंह चौहान ने कर लिया है। शिक्षित बेरोजगार युवाओं को सरकार की गारंटी पर बैंक से लोन दिलाने की योजना से युवा भी शिवराज सरकार के करीब ही हैं। मुख्यमंत्री निवास पर अलग-अलग समुदाय और व्यवसाय से जुड़े लोगों को बुलाकर, यह संदेश देने की कोशिश की है कि किसी महाराजा का महल नहीं आपके ही बीच के एक आदमी का ठिकाना है, जिसके दरवाजे सारे समाज के लिए खुले हैं। शिवराज सिंह चौहान ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पैदल-पैदल अपने प्रदेश को नाप लिया है। वे मतदाताओं के साथ जीवंत संपर्क कर अपनी जादूगरी दिखाते हैं। किसी बुजुर्ग या युवा के कंधे पर हाथ रखकर यह पूछ लेना कि दादा, सब कैसा चल रहा है? दोस्त, भविष्य की क्या योजना है? बड़ी बात है। इसी तरह तो जीतते हैं शिवराज सिंह चौहान लोगों का दिल। हालांकि शिवराज के मंत्रियों और विधायकों को लेकर खासा आक्रोश जनता में लेकिन मुख्यमंत्री की छवि और जनसंपर्क विरोध को काफी हद तक ठण्डा कर सकेगी, ऐसा माना जा रहा है। दस साल में भाजपा सरकार की ओर से शुरू की गई लोक कल्याणकारी योजनाओं को लेकर सरकार के मुखिया जनआशीर्वाद यात्रा लेकर जनता का आशीर्वाद लेने निकले हैं।  
अभी हाल ही में आए सीएनएन-आईबीएन और एसडीएस के इलेक्शन ट्रैकर सर्वे में सामने आया कि मध्यप्रदेश के ८२ फीसदी लोग प्रदेश सरकार के कामकाज से संतुष्ट हैं। साथ ही ६४ प्रतिशत लोग चाहते हैं कि फिर से भाजपा की सरकार बने और शिवराज सिंह चौहान ही मुख्यमंत्री बनें। वर्ष २००९ में ४२ फीसदी वोट हासिल करने वाली भाजपा को २०१३ में ५० फीसदी वोट मिल सकते हैं जबकि कांग्रेस का वोट प्रतिशत ४० से गिरकर ३२ रह सकता है। २३० विधायकों वाली मध्यप्रदेश की विधानसभा में फिलहाल भाजपा के १५२ सदस्य हैं जबकि कांग्रेस के ६६ विधायक ही विपक्ष में बैठ रहे हैं। इनमें से एक विधायक चौधरी राकेश चतुर्वेदी एक हाईवोल्टेज पॉलीटिकल ड्रामे का मंचन करने के बाद भाजपा में शामिल हो गए। शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ लाए जा रहे अविश्वास प्रस्ताव की हवा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता चौधरी राकेश चतुर्वेदी ने ही निकाला दी। इससे पहले भी कांग्रेसी नेता शिवराज सिंह की लोकप्रियता से प्रभावित दिखते रहे हैं। शिवराज की लोकप्रिय नेता की छवि का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के पास मुद्दे ही नहीं हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की बहन और कांग्रेस नेता वीणा सिंह ने कुछ समय पहले ही बयान दिया था कि शिवराज पूरे राज्य में लोकप्रिय भी हैं और गांवों तक सरकार की विकास योजनाएं पहुंचा रहे हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराना बेहद मुश्किल होने वाला है।
भारतीय जनता पार्टी ने भी अपनी चुनावी रणनीति बनाने के लिए सरकार के कामकाज, मंत्री-विधायकों की स्थिति, लोकप्रिय नेता सहित सीटवार सर्वे कराया था। सर्वे में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ों ने भाजपा नेताओं की नींद उड़ा दी है। सर्वे के मुताबिक उत्तरप्रदेश से सटे विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के लिए बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। प्रदेश की १५५ सीटों पर भाजपा की स्थिति कुछ खास अच्छी नहीं है। यहां के विधायक-मंत्री के कामकाज से जनता संतुष्ट नहीं है। क्षेत्र के विकास को लेकर विधायकों की बेपरवाह बने रहने की आदत, भ्रष्टाचार के आरोप, भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगने से जनता में आक्रोश है। यहां साफतौर पर एंटी इन्कम्बेंसी फैक्टर का असर दिख रहा है। महज प्रदेश के ५९ विधायकों को कोई खतरा नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक ये ५९ विधायक सौ फीसदी जीतकर आएंगे। हालांकि यह भी है कि सर्वे में ७० फीसदी लोगों ने सरकार के कामकाज से संतुष्टि जाहिर की है। ऐसे में स्पष्ट होता है कि स्थानीय विधायकों को लेकर तो आक्रोश है लेकिन लोग इसी सरकार को फिर से जीतते देखना चाहते हैं। सर्वे में भी शिवराज सिंह भाजपा के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता माना गया है। भाजपा सर्वे को गंभीरता से लेती है तो तीसरी बार सरकार बनाने के लिए संगठन को कई विधायकों और मंत्रियों के टिकट काटने पड़ेंगे। सर्वे में भाजपा को सबसे अधिक खतरा ज्योतिरादित्य सिंधिया से बताया गया है। युवाओं में सिंधिया का क्रेज देखने को मिला है। ज्योतिरादित्य की बढ़ती लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनके युवा होने और ईमानदार इमेज को बताया जा रहा है। प्रदेश की राजनीति में भी सिंधिया का अच्छा-खासा दखल है। यही कारण है कि जनआशीर्वाद यात्रा में शिवराज सिंह के निशाने पर दिग्विजय सिंह और राहुल सिंह के साथ-साथ प्रमुखता से ज्योतिरादित्य सिंधिया भी हैं। वे जनता के बीच भाषण देते समय मंच से बोलते हैं कि मैं किसान का बेटा हूं, आपके बीच का ही हूं, सामंत और राजा-महाराजा नहीं। अभी आप सहज मुझसे मिलने आ सकते हो, मुख्यमंत्री निवास के दरवाजे आपके किसान बेटे ने खोल रखे हैं। क्या सामंत और राजा-महाराज के शासनकाल में यह संभव था या संभव होगा। आप ही तय करें कि किसे मुख्यमंत्री बनाएंगे, अपने बीच के आदमी को या राजा-महाराजाओं को। आपके दु:ख-दर्द को समझने वाले को या फिर महलों से राजनीति करने वालों को। गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा तो समझ रही है कि कांग्रेस ज्योतिरादित्य को सीएम प्रोजेक्ट करके चुनावी मैदान में उतरती है तो तीसरी बार सरकार बनाना आसान नहीं होगा। लेकिन, गुटों में बंटी कांग्रेस यह समझ नहीं पा रही है। भले कांग्रेस हार जाए लेकिन गुटबाज एक-दूसरे की टांग खींचने से बाज नहीं आने वाले।  ज्योतिरादित्य को सीएम प्रोजेक्ट करने के लिए सोनिया गांधी के दरबार में सिंधिया समर्थकों का पहुंचना और फिर इस घटना से उठा बवंडर यही बताता है कि प्रदेश की कुर्सी संभालने के लिए कांग्रेस में अलग-अलग गुट सक्रिय हैं। कह सकते हैं कि सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम लट्ठ। मध्यप्रदेश कांग्रेस दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुरेश पचौरी के खेमे में बंटी है। अब तक दिग्विजय सिंह के गुट में शामिल रहे कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और वर्तमान नेता प्रतिपक्षा अजय सिंह भी अपनी टीम बना रहे हैं। सभी गुटों का प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में प्रभाव है। दिग्विजय सिंह के गुट का प्रभाव राधौगढ़, सतना, रीवा और झाबुआ सहित आसपास के क्षेत्र में है। इसी तरह दूसरे सबसे प्रभावी और बड़ा गुट सिंधिया का है। सिंधिया का प्रभाव क्षेत्र ग्वालियर-चंबल बेल्ट, इंदौर और मालवा के कुछ क्षेत्रों में है। कमलनाथ और सुरेश पचौरी के गुट बेहद छोटे हैं और इनका प्रभाव क्षेत्र भी सीमित हैं। दोनों को मास लीडर भी नहीं माना जाता है। ऐसे में यदि कांग्रेस के गुट जल्द ही एकसाथ आकर भाजपा को हराने के लिए मोर्चाबंदी नहीं करते हैं तो विधानसभा-२०१३ में जीत कांग्रेस के लिए दूर की कौड़ी साबित होने वाली है।
प्रदेश में फिलहाल तो कांग्रेस एकजुट नहीं दिख नहीं रही है। न ही निकट भविष्य में इसकी संभावनाएं नजर आ रही हैं। राहुल गांधी इस मसले पर कांग्रेस के चारों क्षत्रपों को ताकीद दे चुके हैं। प्रदेश में कार्यकर्ताओं से बातचीत के दौरान छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी से कहा कि प्रदेश में कांग्रेस एक नहीं है। प्रत्याशी चुनने से पहले कार्यकर्ताओं की राय नहीं ली जाती। बंद कमरों में चंद लोग अपने गुट के आदमी को टिकट थमाकर चुनावी मैदान में उतार देते हैं जबकि उसका न तो कोई जनाधर होता है और न ही कार्यकर्ता ही उसे पसंद करते हैं। भाजपा को परास्त करना है तो कांग्रेस की एकजुटता के लिए प्रयास किए जाएं। जबर्दस्त गुटबाजी कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है और कांग्रेस की यह कमजोरी ही भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बन गई है। इधर, भाजपा अपने लोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और लोककल्याणकारी योजनाओं के सहारे जनता को आकर्षित कर रही है और जमकर कांग्रेस पर हमला बोल रही है। 

शनिवार, 17 अगस्त 2013

नैतिक मूल्य के बिना भौतिक विकास घातक

 ज ब एक पक्ष को भूलकर समाज आगे बढ़ता है तो वह विकलांग हो जाता है या फिर विकलांग होने की स्थिति में पहुंच जाता है। सब जानते हैं कि वर्तमान युग भौतिक विकास का है। सब देश और जाति-वर्ग भौतिक विकास के पीछे पूरा जोर लगाकर भाग रहे हैं। इस रेस में मनुष्य के नैतिक विकास पर कोई ध्यान नहीं दे रहा, स्वयं मनुष्य भी नहीं। यही कारण है कि हम देखते हैं कि भौतिक विकास से फायदे कम नुकसान ज्यादा हो रहे हैं। ईमानदारी से कहा जाए तो नैतिक मूल्यों के बिना भौतिक विकास संभव नहीं है। हां, नैतिक मूल्यों के बिना भौतिक विकास तो नहीं विनाश जरूर संभव है। आज अपराध, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी और तमाम प्रकार की शारीरिक एवं सामाजिक बीमारियां नैतिक मूल्यों के पतन का ही कारण हैं। 
भौतिक विकास बाह्य है जबकि नैतिक विकास मनुष्य की आंतरिक क्रिया है। बाह्य विकास को साधने और उसके उपभोग के लिए नैतिक रूप से मजबूत एवं स्पष्ट होना जरूरी है। भौतिक विकास की बदौलत मनुष्य के हाथ में शक्तिशाली मशीनगन तो आ गई है, अब यदि मनुष्य के पास नैतिक मूल्य नहीं होंगे तो वह मशीनगन का सदुपयोग ही करेगा, यह कहा नहीं जा सकता। नैतिक मूल्यों के अभाव में वह मशीनगन से लोगों की हत्या भी कर सकता है। नैतिक मूल्य सशक्त और स्पष्ट हैं तो हथियार के कई सदुपयोग हो सकते हैं। मोबाइल फोन को ही ले लीजिए, एक सर्वे के मुताबिक मोबाइल फोन के आविष्कार के बाद से लोगों में झूठ बोलने की प्रवृत्ति अधिक बढ़ी है। इस तथ्य के आधार पर हम यह तो नहीं कह सकते कि मोबाइल फोन का आविष्कार झूठ बोलने के लिए किया गया था। जाहिर-सी बात है मोबाइल फोन का आविष्कार इसके लिए तो कतई नहीं किया गया था बल्कि लोगों के बीच संवाद आसान करने के लिए मोबाइल फोन का आविष्कार किया गया था। चूंकि मनुष्य भौतिक विकास की अंधीदौड़ में नैतिक रूप से पतित हो चुका है ऐसे में भौतिक वस्तुओं का वह उपयोग नहीं दुरुपयोग अधिक कर रहा है। 
देश हो, समाज या फिर मनुष्य, सबके सर्वांगीण विकास  के लिए केवल भौतिक विकास नाकाफी है, इसके साथ-साथ नैतिक विकास भी जरूरी है। महात्मा गांधी का पूरा जोर इसी बात पर था कि भौतिक विकास के साथ-साथ मनुष्यों को नैतिक रूप से सुदृढ़ करें। भारत के प्राचीन इतिहास के पृष्ठ पलटें तो हम देखते हैं कि यह देश सदैव से नैतिक मूल्यों का हामी रहा है। महान संत-ऋषि लम्बी तपस्या के बाद कोई सिद्धि प्राप्त करते थे। सरल शब्दों में कहें तो वे लम्बे समय के शोध और मेहनत के बाद कोई बड़ा आविष्कार करते थे। लेकिन, भारत के महान वैज्ञानिक ऋषि कुछ स्वर्ण मुद्राओं या शक्ति प्राप्ति की आकांक्षा में अपने आविष्कार को बेचते नहीं थे और न ही हर किसी के सामने उसको उद्घाटित करते थे। आविष्कार करने में वे जितना शोध और मेहनत करते, उतनी ही मेहनत योग्य व्यक्ति को तलाशने में करते, जो उस आविष्कार का उपयोग समाज हित में कर सके। दरअसल, उन्हें स्पष्ट था कि नैतिक रूप से पतित किसी व्यक्ति को अपना आविष्कार दे दिया तो न समाज बचेगा और न देश। भारत में तो सूक्ति भी प्रचलित है कि 
जिसका धन गया, समझो कुछ नहीं गया।
जिसका स्वास्थ्य गया, समझो कुछ गया।
जिसका चरित्र गया, समझो उसका सबकुछ गया।
स्पष्ट है कि चरित्र जाने (नैतिक मूल्यों के पतन) के बाद मनुष्य के पास कुछ शेष नहीं रह जाता। ऐसे मनुष्य के लिए भौतिक विकास भी सही मायने में निरर्थक रह जाता है। वर्तमान में भी भारत ही नहीं वरन दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक, उद्योगपति जिनका नाम हम सम्मान के साथ लेते हैं, उनके नैतिक मूल्य बहुत स्पष्ट हैं। आज भी जो अपने नैतिक मूल्यों से डिगता है, भौतिक विकास से अर्जित संपूर्ण शक्ति गंवा बैठता है। कुछ लोग प्रश्न कर सकते हैं कि क्या भौतिक विकास के प्रभाव में नैतिक मूल्य तिरोहित हो रहे हैं? इसका एक शब्द का जवाब है- नहीं। दरअसल, मनुष्य अपने दोष छिपाने के लिए तमाम बहाने गढ़ लेता है, यह उसकी फितरत है। यह सवाल और दलील भी एक बहाना ही है कि भौतिक विकास के कारण ही उनके संस्कार, परंपराएं और नैतिक मूल्य प्रभावित हो रहे हैं। अगर हम सहृदय से स्वीकार करने की मनस्थिति में तो हमें मानना होगा कि प्राचीन भारत भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही नजरिए से समृद्ध राष्ट्र था। तब भौतिक विकास के बावजूद नैतिक मूल्यों का बोलबाला था। जब-जब कोई भी भौतिक विकास में डूबा, उसका विनाश हो गया। स्वर्णमयी लंका का स्वामी रावण प्रकांड विद्वान था और ऋषिकुल में पैदा हुआ था। लेकिन, जैसे ही रावण सांसारिक प्रसाधनों के भोग में डूब गया और नैतिक मूल्यों की अनदेखी कर दी, वह समाजकंटक बन गया। अंहकारी होकर रावण ने भौतिक संसाधनों का उपयोग समाज पर अत्याचार करने में किया। आखिर में नैतिक मूल्यों के स्वामी मर्यादापुरुषोत्तम राम को उसका अंत ही करना पड़ा। यही स्थिति कंस के साथ हुई। आचार्य चाणक्य ने भी एक साधारण से बालक को महान सम्राट चंद्रगुप्त बनाकर नैतिक मूल्य खो चुके मगध के राजा घनानंद का दंभ धूल में मिलाया। वर्तमान राजनीति व्यवस्था में भी यही देखने को मिलता है, चारित्रिक रूप से भ्रष्ट हो चुके नेताओं का राजनीतिक कॅरियर जनता खत्म कर देती है। बहरहाल, बात इतनी-सी है कि भौतिक विकास देश और मानव समाज के लिए जितना जरूरी है उससे कहीं अधिक नैतिक मूल्यों का विकास और सुदृढ़ीकरण जरूरी है। एक पंक्ति की बात है - नैतिक मूल्यों के बिना भौतिक विकास लोक कल्याणकारी नहीं हो सकता।  

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

कुछ तो इज्जत कर लो देश की...

भा रतीय संसद में बैठे कई लोग वाकई राजनीति के लायक नहीं हैं। उनकी हरकतें, बयानबाजी कुछ जाहिल किस्म की हैं। आचरण तो अशोभनीय है ही। गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से संभावित प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के विरोध में कुछ सांसद और नेता बिना-विचारे किसी भी हद तक गिर रहे हैं, यह देखकर आश्चर्य है और कहीं न कहीं भारतीय जनमानस में आक्रोश भी। मोदी को अमरीका का वीजा नहीं देने की अपील करने वाली दो चिट्ठियां हाल ही में सामने आई हैं। इनके कारण भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबर्दस्त थू-थू हुई है। क्षुब्ध भारतीय नेताओं के कारण देश का स्वाभिमान गर्त में मिला जा रहा है। चिट्ठी में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से अपील की गई है कि नरेन्द्र मोदी गुजरात दंगों के दोष से मुक्त नहीं हुए हैं। इसलिए उनको अमरीका वीजा नहीं दे, वर्तमान में मोदी के प्रति जो नीति है उसे बनाए रखा जाए। इस चिट्ठी पर १२ राजनीतिक पार्टियों के ६५ सांसदों के हस्ताक्षर हैं। इनमें कम्युनिस्ट पार्टियां, क्षेत्रीय दल और कांग्रेस तक के सांसदों के नाम शामिल हैं। इस पत्र के सूत्रधार हैं निर्दलीय सांसद मोहम्मद अदीब। अदीब की दिमाग की ही उपज थी यह डर्टी पॉलिटिक्स। हालांकि विवाद सामने आते ही ज्यादातर सांसदों ने ऐसी किसी चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया है। लेकिन अदीब इस बात पर टिके हैं कि सभी हस्ताक्षर असली हैं, लोग अब क्यूं पलट रहे हैं, यह समझ से परे है। यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि हस्ताक्षर नहीं करने का दावा करने वाले किसी भी सांसद ने अब तक अदीब पर फर्जीवाड़े का केस दर्ज नहीं कराया है। बहरहाल हस्ताक्षर असली हों या फर्जी भारतीय राजनीति में अपरोक्ष रूप से अमरीकी हस्तक्षेप की मांग करके सांसद/सांसदों ने भारत की नाक तो कटा ही दी है। 
भारत की जनता घरेलू मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने के दर्द को अच्छे से समझती है। जवाहरलाल नेहरू की गलती की सजा जम्मू-कश्मीर विवाद के रूप में हम आज तक भुगत रहे हैं। यदि नेहरू ने जम्मू-कश्मीर मामले को अंतरराष्ट्रीय पटल पर नहीं रखा होता तो संभवत: आज जम्मू-कश्मीर में कोई समस्या नहीं होती। खैर, नरेन्द्र मोदी का मसला जम्मू-कश्मीर से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है और न ही उसके समकक्ष  है। यह एकदम अलग मसला है, इसलिए दोनों की तुलना यहां नहीं करते हैं। लेकिन घरेलू मसलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना, भारतीय राजनीति में अमरीकी हस्तक्षेप की मांग करना पॉलिटिकली गलत है। नरेन्द्र मोदी को वीजा जारी करना या नहीं करना अमरीका का अंदरूनी मसला है। इसमें हमारे राजनेता को नहीं पडऩा चाहिए। हां, भारत सरकार को जरूर इस पर आपत्ति लेनी चाहिए कि अमरीका उसके एक लोकप्रिय नेता को वीजा क्यों नहीं जारी कर रहा? लेकिन जैसा कि स्पष्ट है कि यूपीए की सरकार में इतने साहसी लीडर शामिल नहीं हैं जो अपने सबसे करीबी विरोधी के पक्ष में कोई भी बात करें, चाहे बात देश के सम्मान की हो। अमरीका को मुंहतोड़ जवाब देने की हिम्मत तो हमारे नेताओं में तब भी नहीं होती जब अमरीकी एयरपोर्ट पर इन भारतीय राजपुरुषों के कपड़े उतरवा लिए जाते हैं।  
नरेन्द्र मोदी के वीजा के लिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से अमरीका जाकर अपील करना भी उचित नहीं है। हालांकि राजनाथ सिंह का कहना है कि वहां के कुछ लोगों ने ही उनके सामने नरेन्द्र मोदी के अमरीकी वीजा का मसला रखा था, जिस पर उन्होंने यह कहा था कि वे इस संबंध में अमरीकी सरकार से बात करेंगे। उन्होंने ओबामा के समक्ष किसी भी रूप में नरेन्द्र मोदी के वीजा मामले को नहीं उठाया है। खैर, विवाद होने के बाद किसी भी मामले से पल्ला झाड़ लेना भारतीय राजनेताओं के व्यवहार में शामिल हो गया है। 
माकपा के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी, भाकपा के एमपी अच्युतन और डीएमके के रामलिंगम ने चिट्ठी को फर्जी बताया है। सीताराम येचुरी ने तो इसे कट-पेस्ट का मामला बताया है। उनका कहना है कि उन्होंने कभी इस तरह के पत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इस तरह के पत्र पर हस्ताक्षर करना उनके चरित्र और सिद्धांत के विपरीत है। उनका स्पष्ट मत है कि घरेलू मामलों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना ही सरासर गलत है। उधर, चिट्ठी भेजने वाले सांसद मोहम्मद अदीब का दावा है कि पत्र पर सीताराम येचुरी के हस्ताक्षर असली हैं। अब वे मुकर रहे हैं तो मुझे ऐसे लोगों पर शर्म आती है। अदीब साहब, शर्म तो देश की आवाम को तुम पर और तुम जैसे नेताओं पर आ रही है। तुम्हारी ओछी राजनीति से देश शर्मिन्दा है, आश्चर्यचकित नहीं, क्योंकि देश अब तो आए दिन ऐसी डर्टी पॉलिटिक्स से दो-चार हो रहा है। आश्चर्यचकित तो अंतरराष्ट्रीय जगत है, जो भारत को उभरते हुए शक्ति के एक ध्रुव के रूप में देखता है। स्वाभिमानी होने की जगह भारतीय नेताओं का यह पिलपिला रूप देखकर अमरीका का प्रतिष्ठित समाचार-पत्र भी आश्चर्य से लिखता है कि किसी देश के अंदरूनी मामलों में अमरीकी राष्ट्रपति से दखल देने की मांग करना अजीब है। भारतीय सांसदों की ओर से ऐसी मांग आना तो अकल्पनीय है। बहरहाल, हमारे देश के नेताओं को इतना शऊर ही नहीं है कि वे अपनी ओछी हरकतों से देश का कितना नुकसान कराते हैं। पत्र पर किसके हस्ताक्षर असली हैं और किसके फर्जी, यह तो मोहम्मद अदीब जानते होंगे या फिर जिनके हस्ताक्षर हैं वे नेतागण। लेकिन, मामला देश के स्वाभिमान से जुड़ा है इसलिए भारतीय संसद को इस मामले पर संज्ञान लेना चाहिए। पत्र पर हस्ताक्षर फर्जी हैं तो मोहम्मद अदीब के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। यदि हस्ताक्षर असली हैं तो ६५ सांसदों से जवाब तलब किया जाए कि इस मसले को भारतीय स्तर पर उठाने की जगह अमरीकी राष्ट्रपति के दरवाजे पर क्यों ले जाया गया? वैसे ऐसे नेताओं को नसीहत तो मिलनी ही चाहिए ताकि ये अपनी न सही देश की तो कुछ तो इज्जत कर सकें। 

शनिवार, 20 जुलाई 2013

सुनहरे पन्नों का खजाना

सं वेदनाएं, सरलता और सहज भाव कहानी को हृदय में गहरे तक उतारने के लिए बेहद जरूरी हैं। कहानी सरस हो, उत्सुकता जगाती हो तो फिर वह आनंदित करेगी ही। फिर भले ही वे बाल कहानियां ही क्यों न हों। स्थापित कहानीकार गिरिजा कुलश्रेष्ठ का कहानी संग्रह 'मुझे धूप चाहिए' कुछ ऐसा ही है, बिल्कुल सरस और सुरुचिकर। मुझे धूप चाहिए में आठ कहानियां शामिल हैं। इसे प्रकाशित किया है एकलव्य प्रकाशन भोपाल ने। एकलव्य बच्चों की शिक्षा और उनके विकास को लेकर काम कर रही संस्थाओं में एक बड़ा नाम है। पुस्तक ११वीं की छात्रा सौम्या शुक्ला के बेहद खूबसूरत रेखाचित्रों से सजी हुई है। कहानी की विषय वस्तु और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सौम्या ने उम्दा चित्रांकन किया है। 'मुझे धूप चाहिए' ४२ पेज की पुस्तक है, जिसे एक बैठक में पढ़ा जा सकता है। खास बात यह है कि दो वक्त की दाल-रोटी को तरसाने वाली महंगाई के दौर में इस बेहतरीन किताब के दाम बेहद कम हैं। महज २५ रुपए।
  दुनिया की खूबसूरती रिश्तों में है और रिश्ते जरूरी नहीं, इंसान-इंसान और जीव-जीव के बीच ही बने। रिश्ते तो किसी के बीच भी पनप सकते हैं। मनुष्य-जीव-जानवर-पेड़-पौधे-सूरज-धरती आदि-आदि किसी के बीच भी। जहां प्रेम और संवेदना रूपी खाद-पानी हो, वहां तो ये बांस की तरह तेजी से बढ़ते हैं। संसार के सूत्रधार की अद्भुत और अद्वितीय कृति है मां। उसके हृदय में जितना प्रेम और करुणा भरी है, उतनी तो दुनिया के सात महासागरों में पानी भी नहीं होगा। त्याग की प्रतिमूर्ति, बच्चों के लिए तमाम कष्ट सह जाना, बच्चों की परवरिश और परवाह में जिन्दगी गुजार देना मां अपना धर्म समझती है और भले से निभाती भी है। मनुष्य जाति हो या फिर जीव-जन्तु, पशु-पक्षी सबदूर मां की भूमिका समान है, उसका स्वभाव एकजैसा है, कोई भेद नहीं। गिरिजा कुलश्रेष्ठ की तीन कहानियां पूसी की वापसी, कुट्टू कहां गया और मां बड़ी खूबसूरती के साथ मां के धर्म और उसकी महानता को बयां करती हैं। इसी तरह इंतजार कहानी मां (गाय) के प्रति संतान (बछड़े) के प्रेम को बताती है। छुटपन में किसी भी बच्चे के लिए उसकी दुनिया मां ही होती है। सब उसके आसपास हों लेकिन मां दिखाई न दे तो उसका मन व्यथित रहता है। उसके लिए मां के आगे और सब गौण हैं। एक अन्य कहानी 'मीकू फंसा पिंजरे में' बाल मन की संवेदनाओं का शब्दचित्रण करती है। एक शैतान चूहे के पिंजरे में बंद होने के बाद कैसे एक छोटी-सी बच्ची का हृदय करुणा से भर जाता है। उसके हमउम्र भाई उस शैतान चूहे को कैदकर सताते हैं तो वह सुकोमल छोटी-सी बच्ची रो देती है। निरीह जीव को आजाद करने की गुहार लगाती है। 'मुझे धूप चाहिए' कहानी एक नन्हें पौधे के बड़े होने की कहानीभर नहीं है बल्कि यह एक बालक के किशोर और युवा होने की कहानी है। किसी भी क्षेत्र के स्थापित लोगों के बीच नए व्यक्ति को पैर जमाने में किस तरह की कठनाइयां आती हैं, 'मुझे धूप चाहिए' उसी बात को कहती है। सच ही तो है जैसे बड़े पेड़ों के झुरमुट में छोटे पौधे पनप नहीं पाते, कई पौधे तो अंगड़ाई लेते ही मर जाते हैं। बड़े पेड़ उन तक धूप ही नहीं पहुंचने देते। कहानी का मर्म यही है कि आपको स्थापित होना है तो जरा-से धूप के टुकड़े को पकड़ लीजिए और आगे बढ़ जाइए, बहुत से लोग विरोधकर तुम्हारा दमन करने को आतुर होंगे, बहुत से लोग निर्लज्जता से आपका उपहास उड़ाएंगे लेकिन आपको पूरे साहस और लगन से लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते जाना है। 
कथाकार गिरिजा कुलश्रेष्ठ का कहानी संग्रह 'मुझे धूप चाहिए' ऐसी पुस्तक है जो बच्चों को उनके जन्मदिन पर उपहार स्वरूप दी जानी चाहिए। पुस्तक क्या है यह बचपन की यादों के सुनहरे पन्नों का खजाना है। किशोरों, युवाओं और बड़ी उम्र के लोगों को भी ये कहानियां गुदगुदा कर, कुछ पलों में रुआंसा करके तो कई जगह रोमांचित कर बचपन की ओर खींच ले जाती हैं।

पुस्तक : मुझे धूप चाहिए
लेखिका : गिरिजा कुलश्रेष्ठ
मूल्य : २५ रुपए
प्रकाशक : ई-१०, शंकर नगर बीडीए कॉलोनी, 
शिवाजी नगर, भोपाल (मध्यप्रदेश) - ४६२०१६
फोन : ०७५५ - २५५०९७६, २६७१०१७

बुधवार, 10 जुलाई 2013

भाजपा के सेक्स लीडर

मध्यप्रदेश की राजनीति में कई बड़े सेक्स स्कैंडल हुए हैं, जिनके कारण ताकतवर नेताओं की राजनीति खत्म हो गई या उन्हें हाशिए पर जाना पड़ा और पार्टी की साख भी खराब हुई। संस्कारी नेताओं की फौज होने का दंभ भरने वाली भारतीय जनता पार्टी सहित अन्य सभी राजनीतिक पार्टियों में सेक्स लीडर हैं। प्रदेश में पहला सेक्स स्कैंडल संभवत: १९६९ में चर्चा में आया था, तब कांग्रेसनीत प्रदेश सरकार में श्रम मंत्री गंगाराम तिवारी एक नर्स के साथ पाए गए थे। तब से अब तक कई नेताओं के उजले पाजामे के नाड़े खुल चुके हैं। फिलहाल तो मध्यप्रदेश की राजनीति में राघवजी सीडी काण्ड से बवंडर आया हुआ है। नौकर के साथ व्यभिचार में लिप्त राघवजी की सीडी फुल स्पीड से प्रदेश में चल रही है। मोबाइल-दर-मोबाइल राघवजी की नंगई ब्लूटूथ और व्हाट्अप से शेयर कर देखी जा रही है। नौकर ने पुलिस से शिकायत में राघवजी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उसने कहा है कि राघवजी के एक अन्य कर्मचारी की पत्नी से भी १५ साल से शारीरिक संबंध हैं। राघवजी उस पर दबाव डालते थे कि उनकी खातिर वह गर्लफ्रेंड बनाए और शादी भी कर ले। आरोप और भी हैं। 
भाजपा के वयोवृद्ध नेता और प्रदेश सरकार में वित्तमंत्री राघवजी की घिनौनी हरकत पर भारतीय जनता पार्टी के चाल, चरित्र और चेहरे के सिद्धांत पर अंगुली उठाई जा रही है। ७९ वर्षीय राजनेता ने अपनी जमा पूंजी एक झटके में राजनीतिक ढलान पर चुका दी है। अपना मुंह तो काला किया ही पार्टी को भी परेशानी में डाल दिया। हालांकि राघवजी को पहले मंत्री पद से बर्खास्त करके और फिर दूसरे दिन पार्टी से निष्कासित कर भाजपा ने अपना चेहरा बचाने की कोशिश की है। इस त्वरित एक्शन से उसको अपना बचाव करने में मदद मिल रही है और आगे भी मिल सकती है। भाजपा कह सकती है पार्टी का चाल, चरित्र और चेहरा वही है जो पहले था। गलत कार्यों में लिप्त नेताओं के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं है। यही कारण है कि ५८ साल पार्टी की सेवा करने वाले राघवजी को घिनौने कृत्य पर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेकिन, सवाल उठता है कि क्या पार्टी को यह कदम पहले नहीं उठा लेना चाहिए था? क्या पार्टी को अब तक राघवजी की रंगीन रातों और काले दिनों की खबर नहीं थी? दूसरे नेताओं के खाते में भी तो इस तरह के गंभीर आरोप हैं, उन्हें क्यों नहीं पार्टी से बाहर किया गया? क्या सिर्फ इसलिए कि उनकी सीडी बाहर नहीं आई है? क्या सीडी बाहर आना ही कार्रवाई के लिए जरूरी है? नेता में उच्च चारित्रिक गुणों की अपेक्षा रखने वाली भारतीय जनता पार्टी में आखिर सेक्स लीडर घुस कैसे जाते हैं? और जानकर भी क्यों पार्टी के आला नेता कार्रवाई से बचते हैं?
राघवजी के काले चेहरे को भाजपा के ही कार्यकर्ता शिवशंकर पटैरिया ने सीडी में कैद किया है। पटैरिया के मुताबिक उन्होंने राघवजी की २३ सीडी बनाई हैं। प्रदेश के अन्य नेताओं की सीडी होने का भी दावा पटैरिया ने किया है। उनका दावा है कि वे लम्बे समय से पार्टी में गंदे नेताओं की शिकायत करते रहे हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होते देख उन्होंने सीडी बनाने का फैसला किया। पटैरिया के इस दावे में सच्चाई है। प्रदेश भाजपा के संगठन मंत्री अरविन्द मेनन, मंत्री बाबूलाल गौर, कुंवर विजय शाह, नरोत्तम मिश्रा, अजय विश्नोई, विधायक ध्रुवनारायण सिंह जैसे कई नाम शामिल हैं, जिनके खिलाफ भाजपा में ऊपर तक चारित्रिक दोष की शिकायतें पहुंची हैं। मीडिया में आए दिन ऐसे मामलों को लेकर भाजपा के कई सेक्स लीडर सुर्खियों में रहे हैं। अरविन्द मेनन के खिलाफ जबलपुर की सुशीला मिश्रा ने शोषण के आरोप लगाए हैं। इस मामले में मानवाधिकार आयोग में भी शपथ-पत्र दायर किया गया है। लेकिन, भाजपा आरोप साबित नहीं होने के बहाने अपने संगठन मंत्री को बचाने में लगी है। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का नाम भी भाजपा की ही कार्यकर्ता शगुफ्ता कबीर के साथ जोड़ा गया। शगुफ्ता कबीर के पति ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोप लगाया था कि गौर उनकी गृहस्थी उजाड़ रहे हैं। इसके बाद पार्टी के अंदरखाने में काफी बवाल मचा और बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। इतना सब होने के बाद भी उन्हें पार्टी से निष्कासित नहीं किया गया। विधानसभा में भी कांग्रेसी नेता महिलाओं के साथ गौर के आपत्तिजनक फोटो लहरा चुके हैं। आरटीआई कार्यकर्ता शहला मसूद मर्डर के बाद तो भाजपा के विधायक ध्रुवनारायण सिंह से लेकर सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय का नाम सेक्स संबंधों में सामने आया। तरुण विजय के शहला मसूद से करीबी संबंध उजागर हुए तो शहला-ध्रुवनारायण-जाहिदा ट्रायएंगल लव के किस्से तो प्रदेशभर में नमक-मिर्च लगाकर सुने-सुनाए जाने लगे। लेकिन, राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया गया। जबकि गंभीर सबूत होने के बावजूद ध्रुवनारायण सिंह को पार्टी से निष्कासित न करके, दिखावे के लिए उनका प्रदेश उपाध्यक्ष का पद छीन लिया गया। कामक्रीड़ा में डूबे मंदसौर के जिलाध्यक्ष कारूलाल सोनी को जरूर बाजार में सीडी आने के कारण पार्टी से चलता कर दिया गया। ऐसे में कारूलाल सोनी और राघवजी का मामला यह स्पष्ट करता है कि जब तक सीडी बाजार में नहीं आ जाती, तब तक पार्टी खूब अय्याशी की छूट देती है। यही कारण है कि करीब एक साल पहले ही इन्हीं राघवजी की महिला के साथ सीडी बनने की चर्चा जोरों पर थी लेकिन बाजार में नहीं आने के कारण भाजपा ने कोई कार्रवाई नहीं की बल्कि मामले को दबा दिया। यदि तब ही राघवजी पर कार्रवाई हो जाती तो आज भाजपा को राघवजी के कारण लज्जित नहीं होना पड़ता। 
असल में पार्टी संगठन को सब जानकारी रहती है कि कौन सेक्स लीडर है। लेकिन, कार्रवाई करने वाले नेताओं के पाजामे के नाड़े भी उतने ही ढीले हैं। उनका नाड़ा भी किसी ने थाम रखा है, ऐसे में खुद के नंगे होने का भी डर रहता है। यही कारण है कि आला नेता भी सब हकीकत जानकर भी चुप रहते हैं। लेकिन भाजपा को खुद को कांग्रेस या कांग्रेस से भी गया बीता होने से बचाना है तो कठोर नियम बनाने होंगे। औरों से अलग दिखने की धारणा को साबित करने के लिए गंदगी तो रोकनी ही होगी। नेता-कार्यकर्ता के खिलाफ शुरुआती शिकायतों की पार्टी स्तर पर ही जांच करा लेनी चाहिए। शिकायतें सही पाए जाने पर तालाब गंदा हो, कमल मुरझाए उससे पहले ही सड़ी मछली को बाहर फेंक देना चाहिए। इसका असर यह होगा कि बीमार मानसिकता और नैतिक रूप से पतित नेता भाजपा में आने की सोच ही नहीं सकेंगे क्योंकि उन्हें ध्यान रहेगा कि भाजपा औरों से अलग है। यहां गंदे काम पर राजनीतिक करियर किसी भी मोड़ पर चौपट होने में देर नहीं लगेगी। राघवजी प्रकरण से भाजपा को सबक लेना चाहिए कि नेता का जनाधार, लोकप्रियता, सीट जिताऊ क्षमता और धन की नदी बहाने की काबिलियत के आधार पर कार्रवाई में पक्षपात न हो, देर न हो, इसकी भी पार्टी स्तर पर चर्चा की जाने की जरूरत है। नेता कोई भी हो कठोर नियम पूरी कठोरता से लागू किया जाए। 
गंदगी कहां से आ रही है : समस्या सिर्फ राजनीति की ही नहीं है। आम समाज भी सेक्स और पैसे के पीछे अंधे घोड़े की तरह भाग रहा है। उसी समाज के बीच से नेता चुनकर राजनीति में आ रहे हैं। हालांकि राजनीति में प्रवेश के समय सभी नेता सात्विक, चारित्रिक और सेवाभावी छवि का मुखौटा लगाए रहते हैं लेकिन सत्ता पाते ही औकात पर आ जाते हैं। चूंकि राजनेता मीडिया की निगाहों में रहते हैं इसलिए उनके सेक्स शौक के चर्चे आम आदमी की तुलना में बेहद चर्चित हो जाते हैं। यूं भी राजनेताओं से आम नागरिक की तरह व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जाती है। असल में समाज के नेता की भूमिका में बने रहने के लिए तपस्वी जीवन जरूरी है। लोकतांत्रिक राजनीति के विकास और विस्तार के लिए भी चरित्रवान लोगों का होना बुनियादी शर्त है। चूंकि भाजपा से जनमानस की अधिक अपेक्षाएं हैं, समाज भाजपा को भारतीय मूल्यों के प्रतिनिधि के रूप में देखता है, भाजपा की छवि राष्ट्रवादी पार्टी की है, ऐसे में भाजपा के बड़े लीडरान को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। 

बुधवार, 19 जून 2013

महारथी की शह पर ही घोड़े ने छोड़ा रथ

 हा ल के दिनों में भारतीय राजनीति में भारी उथल-पुथल, नए अध्याय, नए समीकरण और कई विघटन देखे गए। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग/एनडीए) का टूटना 2014 के आम चुनाव के नजरिए से काफी अहम माना जा रहा है। राजग का नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी करती है। भाजपा की 17 साल पुरानी सहयोगी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड)/जदयू गठबंधन से अलग हो गई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जदयू के अलग होने से राजग कमजोर हो गया है। कांग्रेस को इसका फायदा मिल सकता है। तीसरे मोर्चे को ऑक्सीजन मिलने की उम्मीद है। चर्चा में यह भी है कि भाजपा और जदयू को अलग-अलग राहें चुनने से क्या मिलेगा? 2014 में गद्दी। नफा या नुकसान। मजबूती या कमजोरी। 
            जदयू ने जैसे ही एनडीए से अलग होने की घोषणा की तो इंदप्रस्थ (दिल्ली) से पाटलीपुत्र (पटना) तक दोनों ही पार्टियों के कार्यालयों में ढोल (फटे) बजाए गए। आतिशबाजी हुई। लड्डू भी बांटे गए। यानी दोनों खुश हैं। बेहद खुश हैं। मानो लोकसभा के चुनाव ही जीत लिया हो। इस जश्न को मनाने में दोनों पार्टियों ने इतना वक्त क्यों लिया? जाहिर तौर पर तो राजग परिवार में इस 'ब्रेकअप पार्टी' के कारण हैं गुजरात के शक्तिशाली मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनको भाजपा के गोवा अधिवेशन में और ताकत मिलना। हमें यह भी नहीं भूलना होगा कि मोदी को लोकसभा के चुनाव तक प्रचार की कमान मिलते ही गोवा से दिल्ली तक कैसा भूचाल आया था, कहीं यह भूचाल दिल्ली वाया बिहार तो नहीं पहुंचा? संभव है कि भाजपा के महारथी के इशारे पर काफी दिन से किनारे पर बैठे नीतीश कुमार नदी में कूद गए। राजनीति है, इसमें किसी भी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर, तब जबकि पार्टी विद डिफरेंस का तमगा लेकर घूमने वाली भाजपा में लोगों की महत्वाकांक्षाएं पार्टी और सिद्धांत से ऊपर हो गई हों। तमाम प्रयास और हथकंडों के बाद भी आडवाणी जब नरेन्द्र मोदी को पीछे नहीं धकेल सके तो संभव है उन्होंने मोदी पर दबाव बनाने के लिए यह खेल रचा हो। जदयू के राजग छोडऩे के बाद सबसे पहले नाराजगी जाहिर करने वाले नेता लालकृष्ण आडवाणी ही हैं। बाकीके भाजपा नेताओं ने तो इसे सकारात्मक नजरिए से लेना शुरू कर दिया है। आखिर अब नरेन्द्र मोदी के नाम पर राजग में रोज की चिल्ला-तौबा तो खत्म होगी।
         राजग-जदयू तलाक को समझने के लिए मोदी प्रकरण से जुड़े सभी पहलुओं को टटोलना जरूरी है। क्योंकि जदयू के महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को नरेन्द्र मोदी की 'कट्टर' छवि से कोई समस्या नहीं है। वे तो दंगों के तुरंत बाद ही नरेन्द्र मोदी के समर्थन में थे और कई मौकों पर उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना भी जता चुके हैं। उन्हें अपनी सेक्यूलर छवि चमकानी होती तो तब ही राजग से अलग हो लिए होते, जब नरेन्द्र मोदी को सब दंगों का दोषी बता रहे थे। लेकिन, तब उन्हें बिहार में लालू से लोहा लेना था और प्रदेश की सत्ता हासिल करनी थी। ताकत बटोरनी थी। उनके मन में प्रधानमंत्री बनने की लालसा ने भी जन्म नहीं लिया था। अब स्थितियां उलट गईं हैं। नीतीश कुमार की राजनीति जम गई है। उन्होंने ताकत भी इतनी बटोर ली है कि जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी उनके खिलाफ नहीं जा सकते। जार्ज फर्नाडीज की भी उन्हें अब कोई फिक्र  नहीं हैं, जिन्होंने अटल-आडवाणी के साथ इस गठबंधन की नींव रखी थी। जदयू पर अब पूरी तरह नीतीश कुमार का कब्जा हो गया है। ऊपर से प्रधानमंत्री बनने का सपना भी पाल लिया है। राजग में रहते तो यह संभव नहीं था। तीसरे मोर्चे के रूप में उन्हें कुछ संभावना नजर आई है। लेकिन, तीसरे मोर्चे में शामिल होने के लिए जिन पार्टियों के नाम सामने आ रहे हैं, उनकी विचारधारा आपस में कतई मेल नहीं खाती। पिछले ढाई दशक के उदाहरण सामने है जो जाहिर तौर पर स्पष्ट करते हैं कि जब विचार समान न हों तो किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए एक साथ मिलकर नहीं चला जा सकता। भारतीय राजनीति में यूपीए और राजग गठबंधन इसके सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं। राजग तो पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी के सक्रिय राजनीति से दूर होने के बाद लगातार टूट ही रहा है। 
          राजनीति में कई घटनाक्रम बड़ी सीख देने वाले होते हैं। लेकिन, अहंकार और स्वार्थ की पट्टी आंखों पर चढ़ाए राजपुरुष कभी सीख नहीं लेते वरन एक और नजीर बन जाते हैं। भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी का बड़ा दबदबा कायम था। वे पार्टी की सींचने वाले वरिष्ठ नेता हैं। लेकिन, प्रधानमंत्री बनने की उनकी आकांक्षा ने मेनका बनकर वर्षों की तपस्या भंग कर दी। इसके बाद पार्टी के तमाम पदों से इस्तीफा देकर रही-सही इज्जत और गंवा दी। इस घटनाक्रम का नुकसान लम्बे समय तक पार्टी को उठाना पड़ेगा। कुछ इसी तरह जदयू की किरकिरी कराने पर नीतीश कुमार आमादा हैं। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव अच्छे से जानते हैं कि राजग या कहें भाजपा से अलग होना निश्चित तौर पर घाटे का सौदा है। लेकिन, अब उनके हाथ में बहुत कुछ नहीं है। यही कारण है कि वे चाहकर भी इस विघटन को रोक नहीं सके। भले ही जदयू ने अलग रास्ता अख्तियार कर लिया हो लेकिन बिहार की राजनीति उसके अकेले के बस की बात नहीं हैं। नीतीश कुमार डबल होकर भी लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान से अधिक मुस्लिम परस्त नहीं हो सकते। अभी हाल ही में आए नतीजे भी साफ जाहिर करते हैं कि लालू प्रसाद यादव फिर से ताकत हासिल कर रहे हैं। भाजपा और जदयू के अलग होने से कम से कम बिहार की राजनीतिक तस्वीर तो धुंधली हो गई है। भविष्य में सत्ता किसके हाथ लगेगी कहा नहीं जा सकता। बिहार में पहली बार भाजपा 40 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। भाजपा निश्चित ही यह प्रचारित करने से नहीं चूकेगी कि उनके पास दूसरी पंक्ति के ज्यादातर बड़े नेता ओबीसी से ताल्लुक रखते हैं, यहां तक कि प्रधानमंत्री पद के संभावित प्रबल दावेदार नरेंद्र मोदी भी गुजरात की पिछड़ी जाति से आते हैं। भाजपा के पाले में पिछड़े वर्ग का वोट बैंक नरेन्द्र मोदी के नाम पर और बढ़ सकता है। अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ अगर भाजपा को ओबीसी वोट मिलता है तो बिहार में उसका और मजबूत होना तय माना जा रहा है। अगर यह तस्वीर बनी तो जदयू यानी नीतीश कुमार के हाथ में सिर्फ कूची रह जाएगी, रंग कहीं ओर सज रहे होंगे। वहीं 2014 के आमचुनाव में नरेन्द्र मोदी अपनी दम पर 230 से अधिक सीट एनडीए को दिलाने में कामयाब हो जाते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति से भी जयदू यानी नीतीश कुमार का पत्ता साफ होना तय है। ऐसी स्थिति में जदयू वापस राजग में आकर भी अप्रासंगिक रहेगी। राजनीतिक संकेत बताते हैं कि इस बार नरेन्द्र मोदी एनडीए को 200 से अधिक सीट दिलाने में कामयाब रहेंगे। नीतीश का विकल्प भी मोदी ने ढूंढ़ लिया है। जाहिर तौर पर मोदी को जयललिता का समर्थन है। ऐसे में भाजपा को जदयू का राजग से जाना बहुत हद तक अखरेगा नहीं। कसक रहेगी तो शरद यादव के मन में। वैसे भी बड़े पेड़ से टहनी टूटती है तो अमूमन टहनी ही सूखती है पेड़ तो हरा-भरा रहता है। 
      आगे की तस्वीर - भाजपा के राष्ट्रीय फलक पर मोदी के सक्रिय होने के बाद जल्द ही एक और बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। अब तक एकला चलो की राह अपनाने वाले धुरंधर हिंदूवादी नेता और अर्थशास्त्री सुब्रह्मण्यम स्वामी मिशन- 2014 में भाजपा के लिए अहम रणनीतिकार के रूप में सामने आ सकते हैं। दक्षिण में भाजपा के लिए सहयोगी जोडऩे के लिए वे 1998 में भी गठबंधन को मजबूत करने में अपनी योग्यता दिखा चुके हैं। 

शुक्रवार, 10 मई 2013

कांग्रेस ने चलायी भारत में भ्रष्टाचार की रेल

 कां ग्रेसनीत यूपीए सरकार का कार्यकाल देखकर यह तो नहीं लगता कि इस सरकार के पास देश चलाने की जिम्मेदारी थी। जिस तरह बीते पांच साल में घोटालों की बाढ़ आई है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि यूपीए की सरकार हजारों हाथ से देश को लूट रही है। मंत्री से सरकारी पद तक सब
नीलाम हो रहे हैं, बस खरीददार की जेब में दाम हो। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले ने बताया कि सरकार में मनचाहा मंत्रालय किस तरह बिकता है और अब रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंगला ने संवैधानिक पद की भी दलाली खाकर बता दिया कि कांग्रेस के राज में सब बिकाऊ है। मामा-भांजे की जोड़ी ने महेश कुमार को वेस्टर्न रेलवे जीएम से रेलवे बोर्ड का सदस्य बनाने के लिए १० करोड़ की रिश्वत ली। सीबीआई ने भांजे को रंगेहाथ पकड़ा। बेशर्मी की हद है कि प्रधानमंत्री सहित पूरी कांग्रेस रेलमंत्री पवन बंसल के बचाव में आ खड़ी हुई। इसके लिए बेजोड़ तर्क दिया गया कि मंत्री जी का इसमें क्या दोष है, यह तो उनके रिश्तेदार की करतूत है। एक साधारण-सा आदमी भी इतना सहज ज्ञान रखता है कि पवन बंसल की शह के बिना भांजा विजय सिंगला इतना बड़ा कारनामा नहीं कर सकता था। अलबत्ता सीबीआई की रिपोर्ट भी पवन बंसल को इस रिश्वत काण्ड में लिप्त मानती है। कांग्रेस की बेशर्मी पर यहीं लगाम नहीं लगता, विपक्ष यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर से इस्तीफा मांगने पर कांग्रेस के प्रवक्ता कहते हैं कि भाजपा को तो इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई है। यूं तो विपक्ष अपने धर्म का निर्वहन कर रहा था। फिर भी मान लिया कि भाजपा को इस्तीफा मांगने की बीमारी हो गई। लेकिन, क्या कांग्रेस के नेता और प्रवक्ता बता सकते हैं कि आए दिन प्रधानमंत्री और मंत्रियों के इस्तीफे मांगने का मौका भाजपा को कौन दे रहा है? क्या यह सच नहीं कि हर माह औसत एक बड़ा भ्रष्टाचार इन पांच सालों में सामने आया है। हालात ये हैं कि प्रधानमंत्री को भी ऐसी सरकार से शर्मिंदा होकर खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए। भांजे के रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद भी पवन बंसल मंत्री पद से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। एक जमाना था जब रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री हुआ करते थे, उन्होंने एक रेल दुर्घटना पर ही इस्तीफा दे दिया था। क्योंकि उन्हें अपनी नैतिक जिम्मेदारी का भान था। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के किसी भी मंत्री यहां तक कि सौम्यता और ईमानदारी का लबादा ओढ़े प्रधानमंत्री से भी इस स्तर की नैतिकता, शुचिता की राजनीति की अपेक्षा नहीं की जा सकती। जिस सरकार का ध्येय ही भ्रष्टाचार हो गया हो, उससे आप उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। कांग्रेस का हाथ भी अब गरीब के साथ नहीं बल्कि गरीब के गिरेबां पर है और भ्रष्टाचारियों के साथ है। जरा अतीत पर नजर डाली जाए तो स्पष्ट होता है कि आज भ्रष्टाचार की जो विशाल इमारत खड़ी दिख रही है, उसकी नींव कांग्रेस ने अपने पहले ही शासन काल में रख दी थी।
भारत में भ्रष्टाचार की पौध आजादी की तुरंत बाद ही कांग्रेस ने रोप दी थी। अनेक वीर स्वतंत्रता सेनानियों के प्राणों की आहुति देकर सन् १९४७ में भारत ने अंग्रेजों के चंगुल से शासन व्यवस्था छीनी। लेकिन, तत्कालीन कर्णधारों ने सुराज देने की जगह कुराज के बीज बो दिए। आजादी के बाद कांग्रेस के शासनकाल में ही भ्रष्टाचार का बीज अंकुरित हुआ बल्कि शनै-शनै बढ़ता भी गया। अलग-अलग समय सत्ता में रही कांग्रेस ने उस भ्रष्टाचार के पौधे को खूब खाद-पानी दिया, उसका खयाल रखा। आज वही पौधा विशाल वट वृक्ष बन गया है। उसके इस प्रिय पौधे पर जब भी कोई अंगुली उठाता है कांग्रेस उसकी खूब खिंचाई करती है। बाबा रामदेव ने वर्षों से विदेश में जमा होते आ रहे कालेधन की मांग की तो कांग्रेसनीत यूपीए सरकार उन पर डण्डा लेकर पिल पड़ी। दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करके रात में सो रही महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों पर आंसूगैस के गोले छोड़े गए। अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार का गला घोंटा गया। बाद में इस बर्बर घटना में घायल एक महिला ने अस्पताल में दम तोड़ दिया था। जो कुछ समय पहले तक बाबा रामदेव के आश्रम में जाकर उनका आशीर्वाद लेते थे वे बाबा को ठग कहते नहीं थक रहे। वहीं कांग्रेस ने बाबा रामदेव के तमाम ट्रस्टों पर जांच बैठा दी। 
अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मजबूत लोकपाल की आवाज बुलंद की तो कांग्रेस ने उन्हें घेरना शुरू कर दिया। कांग्रेस के नेता अन्ना हजारे के साथ बदतमीज पर उतर आए। उनका चरित्रहनन करने के लिए अमर्यादित भाषा का जमकर इस्तेमाल किया गया। जिस आदमी के पास अपना खुद का घर नहीं उसे बेईमान ठहराने में पीछे नहीं रहे कांग्रेसी। अन्ना के दामन पर कीचड़ उछालते समय कांग्रेस भूल गई कि उसी ने अन्ना की ईमानदार और समाजसेवी छवि के लिए उन्हें पदम् विभूषण पद से सम्मानित किया था। किरण बेदी जैसी ईमानदार महिला को भी कांग्रेस ने निशाना बनाना शुरू कर दिया। दरअसल, कांग्रेस भ्रष्टाचार को रोकना ही नहीं चाहती। वह ऐसा चाहेगी भी क्यों? उसने तो आजादी के बाद ६४ वर्षों में भ्रष्टाचार को पनपने का अवसर दिया है, संरक्षण दिया है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स (सीपीआई) की १८३ देशों की सूची में भारत भ्रष्टाचार के मामले में ९५वें नंबर पर है। अगर कोई पानीदार सरकार होती तो भ्रष्टाचार के मामले में देश की यह रैंकिंग देखकर चुल्लूभर पानी में डूब मरती। स्विटजरलैण्ड बैंकिंग एसोसिएशन की रिपोर्ट भी कहती है कि स्विस बैंकों में जमा धन के मामले में भारत सबसे आगे है। यानी विदेशों भारत का कालाधन सबसे अधिक है। कालाधन भ्रष्टाचार से ही बनाया है। आजादी के बाद से लेकर अब तक भारत में करीब ९१ सौ खरब के घोटाले प्रकाश में आ चुके हैं और अभी भी नए-नए घोटालों का जन्म तेजी से होता जा रहा है।  
आजाद भारत का पहला ज्ञात घोटाला सन् १९४७ में हुआ था। सन् १९४८-४९ में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में जीप घोटाले को उनके चहेते वीके कृष्णा मेनन ने अंजाम दिया। वीके कृष्णा मेनन उस समय लंदन में भारत के हाई कमिश्नर थे। १९४८ में ही पाकिस्तान ने हमला कर दिया था। भारतीय सेना को जीपों की जरूरत आन पड़ी। जीप खरीदने की जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू ने मेनन को सौंपी। मेनन ने विवादास्पद कंपनी से जरूरी औपचारिकताएं पूरी किए बिना २००० जीप खरीदने का सौदा कर लिया। इसके लिए उन्होंने कंपनी को एक लाख ७२ हजार पाउंड की राशि (८० लाख रुपए, उस समय) का भुुगतान भी कर दिया। ब्रिटेन से १५५ जीप की एक ही खेप पहुंची सकी थी। कृष्णा मेनन की करतूत से पर्दा उठ गया। १५५ जीप में से एक भी चलने की स्थिति में नहीं थी। उस समय नाममात्र के विपक्ष की मांग पर दिखाने के लिए एक जांच कमेटी बनाई गई। लेकिन, दोषी मेनन पर कार्रवाई तो दूर बल्कि उनका प्रमोशन कर दिया गया। १९५६ में वीके कृष्णा मेनन कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। यहीं से भ्रष्टाचार को बल मिला। अगर कांग्रेस वाकई देश को सुशासन देना चाहती थी तो उसी समय जीप घोटाले के दोषी वीके कृष्णा मेनन पर कड़ी कार्रवाई कर देती तो शायद आज भारत में भ्रष्टाचार की यह स्थिति नहीं होती। कांग्रेस और उसके वरिष्ठ नेता इसी एक घोटाले पर नहीं रुके। कांग्रेस के नेताओं में होड़-सी लग गई घोटाले करने की। जीप घोटाले को दो साल भी नहीं बीत पाए थे कि साइकिल घोटाला १९५१ में सामने आ गया। यह भ्रष्टाचार की यह काली सूची दिन-दूनी रात-चौगुनी बढ़ती गई। अब तो घोटालों में रकम का आंकड़ा करोड़ो-अरबों में पहुंच गया है। लाख रुपए के घोटाले को घोटाला ही नहीं माना जाता। सलमान खुर्शीद पर जब विकलांगों के उपयोग की सामग्री वितरण में कुछ लाख के घोटाले का आरोप लगा था तो कांग्रेस के प्रवक्ता यह कहते हुए पाए गए कि इस कदर मंत्री की औकात कम मत करो, भला मंत्री भी लाख का घोटाला करेगा क्या? यह राशि करोड़ में होती तो ही विश्वास किया जा सकता था। कांग्रेस को अपनी बची-खुची छवि बचानी है तो तत्काल भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे मंत्रियों को बर्खास्त कर देना चाहिए। वरना, यूं ही भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की बातों का क्या है, बातें तो सब करते हैं।

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ऊंचे शिखरों पर रोमांच का सफर


 क ठिनाइयां आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आईं मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए, ऐसे रास्तों पर जहां जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

मोदी, मोदी और मोदी


 भा रत की राजनीति इस समय मोदीमय है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के जिक्र के बिना शायद ही कोई दिन बीतता हो। इसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजरें जमाए नरेन्द्र मोदी की कुशल रणनीति कह सकते हैं। मोदीफोबिया से ग्रस्त कांग्रेस के नेता यहां तक कि राहुल गांधी भी
आए दिन मोदी का जिक्र कर ही देते हैं। भाजपा में वटवृक्ष बनते जा रहे नरेन्द्र मोदी से पार्टी के क्षत्रपों में भी भय है। उन्हें डर है कि 'मोदी बरगद' की छांव में वे मुरझा न जाएं। इसीलिए मैं प्रधानमंत्री-मैं प्रधानमंत्री का राग अलाप कर पार्टी के नेता मोदी बहस शुरू कर देते हैं। हाल के घटनाक्रम देखकर स्पष्ट होता है कि राजनीति के नए चाणक्य नरेन्द्र मोदी का ही कमाल है कि वे एक दिन भी खबरों से परे नहीं जाते। दिल्ली में फिक्की के महिला सम्मेलन को संबोधित करना हो या फिर कोलकाता में उद्योगपतियों के कार्यक्रम में भाषण देना हो, इस तरह के तमाम आयोजन और बहस को मोदी की रणनीति के ही एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
नरेन्द्र मोदी मंच लूटने में माहिर हैं। उनकी लोकप्रियता फिलहाल सिर चढ़कर बोल रही है। इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी का भाषण सुनने के लिए भीड़ इतनी अधिक थी कि फिक्की के महिला सम्मेलन का स्थान बदलकर एक पांच सितारा होटल करना पड़ा। फेसबुक और ट्विटर पर मोदी के भाषण के कुछ हिस्से बड़ी तेजी के साथ शेयर हुए और उतनी ही तेजी से उन पर कंमेट आए। मोदी ने फिक्की के महिला सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण की बात बड़े जोरदार ढंग से रखकर महिलाओं का भरोसा भी जीत लिया। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, बढ़ते लिंगानुपात की निंदा की। लड़कियों को समान अवसर उपलब्ध कराने की वकालत की। महिला उद्यमियों की तारीफ की और उन्हें सरकार की ओर से अधिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही। फिक्की में महिलाओं से मुखातिब होने के मौके को नरेन्द्र मोदी ने खूब कैश कराया। इस बहाने उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि यदि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनकी सरकार महिला हितैषी होगी। महिला सशक्तिकरण की नीतियां नए सिरे से तय की जाएंगी। इसके लिए नीति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किया जाएगा। ५० प्रतिशत महिला आरक्षण बिल का जिक्र कर नरेन्द्र मोदी ने सरकार में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने का भी संकेत दिया।
फिक्की में दिए भाषण पर बहस खत्म हो पाती उससे पहले ही नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस और मीडिया को एक और मसला पकड़ा दिया। कोलकाता में तीन बड़े व्यापारिक संगठनों भारत चेम्बर ऑफ कॉमर्स, इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स और मर्चेंट चेम्बर ऑफ कॉमर्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मोदी ने सीधे यूपीए पर हमला बोला और ममता बनर्जी को रिझाने के लिए वामपंथियों को भी लपेटे में ले लिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के किए गड्ढे मैं गुजरात में भर रहा हूं तो बंगाल में ३२ साल में वामपंथियों ने जो गड्ढे किए हैं उन्हें भरने का काम ममता बनर्जी कर रही हैं। राजग के विस्तार की योजना निश्चित ही मोदी के दिमाग में है। जयललिता से उनकी अच्छी बनती है। ममता जरूर नैनो प्रकरण के बाद से मोदी से नाराज हैं। लेकिन, ममता दीदी की पटरी कांग्रेस के साथ भी नहीं बैठ रही है। वे राजग में पहले भी शामिल रह चुकी हैं। इसीलिए मोदी ममता का पक्ष लेकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश में हैं। आखिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी विकल्प तो उन्हें ही ढूंढऩा है जो राजग में नीतिश की जगह ले सके। क्योंकि ज्यादा संभावना है कि मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए घोषणा होते ही नीतीश कुमार राजग से अलग हो जाएंगे। 
नरेन्द्र मोदी ने कोलकाता के अपने इस भाषण में सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया। मोदी ने कहा कि कांग्रेस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोई अपना नेता ही नहीं मानता। यह तकरीबन सच भी है, जिससे पूरा हिंदोस्तान वाकिफ है। यह बयान देने के पीछे मोदी के गहरे निहितार्थ हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया है कि देश को कैसा नेता चाहिए रबर स्टम्प या फिर जिसका जनाधार हो यानी नरेन्द्र मोदी। मनमोहन सिंह के बहाने नरेन्द्र मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से एक फ्रेम आमजन को दी है कि आप ही फिट करके देखिए कि प्रधानमंत्री कुर्सी पर कौन जमेगा? 
अब नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी कहीं आगे दिखते हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़े गए चुनावों में कांग्रेस को कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी है जबकि नरेन्द्र मोदी अपनी दम पर तीसरी बार गुजरात में सरकार बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खम ठोंक रहे हैं। राहुल गांधी राष्ट्रीय बहस और संवेदनशील मुद्दों के दौरान राष्ट्रीय पटल से गायब रहते हैं जबकि मोदी हमेशा चर्चा में रहते हैं। हाल ही में राहुल गांधी का सीआईआई में दिया गया भाषण काफी सराहा गया लेकिन उतनी ही उसकी आलोचना भी हुई। ठीक यही स्थिति कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिए भाषण की रही। जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं को नई दिशा देने की जगह भावुक भाषण दिया। यहां तक की उन्होंने राजनीति को जहर का प्याला ही बता दिया। खैर, राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने कहीं नहीं टिकते उसके कारण हैं। राहुल गांधी अपने भाषण में देश की समस्याएं तो बखूबी उठाते हैं लेकिन उनके पास समाधान नहीं है। उनके भाषण से सवाल तो बहुत उपजते हैं लेकिन जवाब राहुल गांधी के पास नहीं है। सीआईआई में दिए भाषण में राहुल कहते हैं कि भारत के सामने कई समस्याएं हैं। इन समस्याओं का समाधान जरूरी है। लेकिन, समाधान कैसे होगा? यह राहुल नहीं बता पाते हैं। राहुल कहते हैं कि युवाओं को सस्ती और बेहतर शिक्षा देने की जरूरत है। हकीकत यह है कि उनकी ही सरकार के दौरान शिक्षा महंगी होती जा रही है। हाल ही में केन्द्रीय विद्यालयों की फीस में भी बढ़ोतरी की गई है। निजी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की मनमर्जी तो जग जाहिर है। शिक्षा सस्ती और सर्व सुलभ कैसे होगी? इसकी नीति राहुल गांधी नहीं बता सके। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार चंद लोग चला रहे हैं। सरकार चलाने के लिए आमजनता की भागीदारी की जरूरत है। सरकार में सबको कैसे, कहां और किस स्तर तक भागीदार बनाया जाएगा, इसका भी जवाब राहुल गांधी अपने भाषण में नहीं देते हैं। जबकि नरेन्द्र मोदी समाधान पर बात करते हैं। उनके पास हर सवाल का जवाब है। हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में शिरकत की थी। तब उनसे वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने पूछा था कि आप गुजरात दंगे के सवालों से बचते क्यों हैं? मोदी ने जवाब में कहा था कि मैं किसी भी सवाल से न तो डरता हूं और न ही बचता हूं। यदि मैं डरता तो यहां दिग्गज पत्रकारों के बीच नहीं आता। इस दौरान मोदी ने पूछे गए तमाम सवालों के जवाब तर्क के साथ रखकर अपना विजन देश के सामने रखा। विदेश नीति कैसी हो, देश के विकास की योजना क्या हो, एफडीआई को लागू किया जाए तो कैसे, भ्रष्टाचार दूर करने की योजना और सुरक्षा के मसले पर बेबाकी से अपना पक्ष रखा। इंडिया टुडे के एडिटर इन चीफ अरुण पुरी ने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़ा एक सवाल किया। जिसके जवाब में उन्होंने बड़ा सधा हुआ जवाब दिया, जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि सुरक्षा तो हर किसी को चाहिए, क्या मुस्लिम और क्या हिन्दू। इसलिए मेरी नीति है कि हर आदमी को उसके अधिकार और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि एक रणनीति के तहत आगे बढ़ रहे नरेन्द्र मोदी कॉनक्लेव, ऑनलाइन भाषण, छात्रों, फिक्की और उद्योगपतियों के आयोजनों में शिरकत कर अपना विजन देश के सामने रखते जा रहे हैं। बहस-मुहाबिस के बीच नमो बता रहे हैं कि वे देश के प्रधानमंत्री बने तो देश की तस्वीर क्या होगी? 

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails