शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

सेवागाथा डॉट ओआरजी : सेवा के अनुपम और अनुकरणीय प्रयासों का पता

 राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है। वह समाज के उत्थान के लिए कार्यरत है। लगभग 92 वर्षों की यात्रा में संघ ने समाज में व्यापक स्थान बनाया है। आरएसएस के संबंध में अकसर उसके ही कार्यकर्ता कहते हैं कि संघ में आए बिना संघ को समझा नहीं जा सकता। वास्तविकता भी यही है। संघ विरोधियों और संकीर्ण राजनेताओं के कारण संघ की चर्चा राजनीतिक गलियारे में अधिक होती है, जबकि राजनीति से संघ का लेना-देना बहुत अधिक नहीं है। संघ तो समाज के बाकि क्षेत्रों में अधिक सक्रिय है। सेवा का क्षेत्र भी ऐसा ही है। भला कितने सामान्य नागरिक जानते होंगे कि पूरे देश में आरएसएस के स्वयंसेवक एक लाख 70 हजार से अधिक नियमित सेवा कार्य चलाते हैं। यह सब काम संघ बिना किसी प्रचार के करता है। 'प्रसिद्धि परांगमुखता' संघ का सिद्धाँत है। संघ के लिए सेवा उपकार या पुण्यकार्य की भावना से किया जाने वाला कार्य नहीं है, बल्कि यह तो स्वयंसेवकों के लिए 'करणीय कार्य' है। किंतु, समय की आवश्यकता है कि समाज में यह भरोसा पैदा किया जाए कि देश में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो रचनात्मक, सकारात्मक और सृजनात्मक कार्यों में संलग्न हैं। देश का वातावरण ऐसा है कि अच्छाई का प्रचार करने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि अच्छे कार्यों में और लोग जुटें।

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

संघ के प्रति दुष्प्रचार कांग्रेस का एकमात्र ध्येय

कल्पना परुलेकर को मिली सजा से नहीं लिया सबक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद गुड्डू ने आरएसएस को बदनाम करने फेसबुक पर साझा किया फर्जी चित्र
यह फर्जी फोटो है,
असली फोटो लेख के आखिर में देखें
 राजनीति  में अपने विरोधियों को घेरने के लिए झूठ और तथ्यहीन जानकारियों का उपयोग अमर्यादित ढंग से करने की प्रवृत्ति में बढ़ गई है। यह प्रवृत्ति स्वच्छ राजनीति के लिहाज से कतई अच्छी नहीं है। विरोध करना और अपने विरोधी को घेरना अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसके लिए झूठ का सहारा लेकर उनकी छवि बिगाड़ना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की आवश्यकता है। इस दिशा में राजनेताओं, पार्टियों और संगठनों ने संज्ञान लेना प्रारंभ किया है। मध्यप्रदेश में वर्ष 2011 में कांग्रेस की तत्कालीन विधायक कल्पना परुलेकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी तस्वीर का उपयोग किया था। पिछले दिनों ही कांग्रेस की पूर्व विधायक कल्पना परुलेकर को फर्जी फोटो के मामले में न्यायालय ने सजा सुनाई है। किंतु लगाता है कि कांग्रेस के नेता अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि कल्पना परुलेकर को मिली सजा से सबक न लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बदनाम करने के लिए फर्जी फोटो का सहारा लिया है। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सलामी देते हुए स्वयंसेवकों का फोटो साझा किया है। यह दो फोटो को मर्फ करके बनाया गया फर्जी फोटो है, जो एबीपी न्यूज चैनल के वायरल सच कार्यक्रम में भी झूठा साबित हो चुका है। संघ के इंदौर विभाग के प्रचार प्रमुख सागर चौकसे ने इस मामले में प्रेमचंद गुड्डू और अन्य के विरुद्ध हीरा नगर थाने (इंदौर) में शिकायत दर्ज कराई है। इसके साथ ही इंदौर संभाग के पुलिस महानिरीक्षक और इंदौर के पुलिस अधीक्षक को त्वरित कार्रवाई के लिए ज्ञापन दिया है। हालाँकि, पुलिस में शिकायत के बाद और अपने झूठ की पोल खुलने पर कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रेमचंद गुड्डू ने फर्जी फोटो और आपत्तिजनक संदेश अपने फेसबुक पेज से हटा लिया है। 
          कांग्रेस के इस झूठ को उजागर करने वाले संघ के कार्यकर्ता सागर चौकसे ने बताया कि कांग्रेस नेता प्रेमचंद गुड्डू ने अपने अधिकृत फेसबुक पेज पर फोटो और उसके साथ आपत्तिजनक संदेश जारी किया। फोटो में ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया को सलामी देते हुए स्वयंसेवकों को दिखाया गया। इस फोटो के साथ कांग्रेस नेता ने संदेश लिखा है कि देश की आजादी में संघी गिरोह के योगदान की एक छोटी-सी झलक। संदेश की भाषा शैली और शब्द चयन से स्पष्ट है कि कांग्रेस नेता ने यह फोटो संघ को बदनाम करने के लिए अपने फेसबुक पेज और सोशल मीडिया पर साझा किया था। संघ को बदनाम करने के लिए विक्टोरिया का फोटो स्वयंसेवकों के फोटो के साथ शरारतपूर्ण ढंग से जोड़ा गया है। जबकि वास्तविक फोटो में सिर्फ स्वयंसेवक दिख रहे हैं। उल्लेखनीय है कि यह झूठ बहुत पहले से चल रहा है। कांग्रेस और वामपंथी समूह के 'गोएबल्स' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देशभक्त छवि को धूमिल करने के लिए इस प्रकार के झूठ प्रचारित-प्रसारित करते रहते हैं। चूँकि झूठ के पैर नहीं होते, इसलिए वह सत्य की जमीन पर टिकते नहीं है। इस झूठ का नकाब पहले भी उतर चुका है। एबीवी न्यूज चैनल ने अपने चर्चित कार्यक्रम 'वायरल सच' में 'स्वयंसेवकों द्वारा महारानी विक्टोरिया को सलामी' देने वाले इस फोटो का पोस्टमार्टम किया था, जिसमें यह फोटो फर्जी सिद्ध हो चुका है। उस समय यह फोटो कांग्रेस के नेता संजय निरूपम ने सोशल मीडिया में साझा किया था। फोटो साझा करने से पहले दो मिनट भी यदि कांग्रेस नेताओं ने इस फोटो को ध्यान से देखा होता, तो वह यह गलती नहीं करते। दरअसल, जिस समय का यह फोटो बताया जा रहा है, उस समय संघ की गणवेश ऐसी नहीं थी, जैसी फोटो में स्वयंसेवक पहने हुए हैं। संघ की गणवेश में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं। किंतु, जिन्हें सिर्फ संघ के नाम से ही एलर्जी हो, वह इतना भी ध्यान क्यों देंगे। यही कारण है कि संघ पर आरोप लगाने से पहले कांग्रेस के नेता थोड़ी-सी पड़ताल करना भी उचित नहीं समझते हैं। वर्तमान समय में संघ को बदनाम करना, उसकी प्रतिष्ठा को धूमिल करना, उस पर अनर्गल आरोप लगाना, कांग्रेस में एक नया चलन बन गया है। ऐसा करने वालों की कांग्रेस पार्टी में आजकल पूछ भी बहुत है। यही कारण है कि पार्टी में अपनी साख बढ़ाने के लिए कांग्रेस नेता प्रेमचंद गुड्डू और उनके साथियों ने दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक संगठन आरएसएस की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए झूठ का सहारा लिया।  
पहले भी ऐसा कर चुके हैं कांग्रेस के नेता : संघ को बदनाम करने के लिए झूठे तथ्य और फोटो का सहारा कांग्रेस के नेताओं ने पहली बार नहीं लिया है, बल्कि वह ऐसा पहले भी कई बार कर चुके हैं। हालाँकि प्रत्येक मौके पर उनका झूठ उजागर हुआ है। उज्जैन के महीदपुर से कांग्रेस की पूर्व विधायक कल्पना परुलेकर को तो फर्जी फोटो के मामले में पिछले दिनों ही न्यायालय ने दो साल की कैद और 12 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है। नवंबर-2011 में फर्जी तस्वीर का उपयोग कर कल्पना परूलेकर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और तत्कालीन लोकायुक्त (संवैधानिक पद) पीपी नावलेकर को बदनाम करने के लिए किया था। उन्होंने विधानसभा सत्र के दौरान आरोप लगाया था कि लोकायुक्त पीपी नावलेकर का आरएसएस के साथ संबंध है। प्रमाण के तौर पर उन्होंने पत्रकार वार्ता में एक तस्वीर लहराई थी। उन्होंने जो तस्वीर दिखाई थी, वह संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत की थी, जिसमें छेड़छाड़ कर डॉ. भागवत के चेहरे की जगह नावलेकर का चेहरा लगा दिया गया था। 
          इसी तरह कांग्रेस ने सितंबर-2015 में हुए पेटलावद हादसे के समय आरएसएस को जबरन बदनाम करने का प्रयास किया था। कांग्रेस के पेटलावद हादसे के मुख्य आरोपी राजेंद्र कांसवा को संघ का स्वयंसेवक बताने के लिए पथसंचलन का फोटो जारी किया था, जिसमें एक स्वयंसेवक पर गोल घेरा लगाकर उसे कांसवा बताया गया था। जबकि वह फोटो मध्यप्रदेश का ही नहीं था। फोटो था पंजाब के फरीदकोट के पथ संचलन का और फोटो में कांग्रेस ने जिसे कांसवा बताया था, वह फरीदकोट का स्वयंसेवक श्यामलाल था। इस मामले में भी पेटलावद पुलिस ने धारा 469, 500 (34) के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष अरुण यादव, रतलाम-झाबुआ सांसद कांतिलाल भूरिया, प्रदेश कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा एवं प्रेस विज्ञप्ति जारी करने वाले संजीव श्रीवास्तव को नोटिस जारी किया था। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी संघ पर झूठा आरोप लगाने के मामले में न्यायालय में कार्यवाही का सामना कर रहे हैं। 
नेताओं की इस प्रवृत्ति पर न्यायालय की टिप्पणी : सोशल मीडिया पर इस प्रकार के फर्जी फोटो बहुत साझा किए जाते हैं, वह अलग बात है। अनेक हताश लोग अपनी खीज मिटाने के लिए सभी दलों एवं संगठनों के नेताओं के फोटो/वीडियो के साथ छेड़छाड़ करके सोशल मीडिया में प्रसारित करते हैं। उनका ऐसा करना चिंताजनक तो है, लेकिन इतना अधिक नहीं है। क्योंकि, उनकी स्वयं की विश्वसनीयता नहीं है। उनका अनुसरण भी कोई नहीं करता है। परंतु, जिम्मेदार व्यक्ति से इस प्रकार के आचरण की अपेक्षा नहीं की जाती है। क्योंकि, उनके कहे का असर समाज पर पड़ता है। उनकी बात पर कम से कम उनके अनुसरणकर्ता तो भरोसा करते ही हैं। इस संबंध में कल्पना परुलेकर मामले में न्याय करने वाले अपर-सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार की टिप्पणी बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि कल्पना परुलेकर एक संवैधानिक संस्था की सदस्य रही हैं और उनका आचरण उच्च मूल्यों के अनुसार नहीं था। किसी जनप्रतिनिधि से ऐसे आचरण की उम्मीद नहीं की जाती। इससे जनता में गलत संदेश जाता है। ऐसे कृत्यों से आधारविहीन दोषारोपण को बढ़ावा मिलता है। किसी भी राजनीतिक दल को यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए वह अन्याय के प्रतिकार के नाम पर असंवैधानिक काम करे। 
          न्यायालय की टिप्पणी उचित ही है, एक सामान्य व्यक्ति और जनप्रतिनिधि या संवैधानिक पद पर रहे व्यक्ति के आचरण में अंतर होता है। जनप्रतिनिधि समाज का नेतृत्वकर्ता होता है, वह समाज को दिशा देने का काम करता है। यदि उसका ही आचरण ठीक नहीं होगा, तब वह समाज को क्या दिशा देगा। इसलिए कांग्रेस सहित सभी दलों के नेताओं को विचार करना चाहिए कि शुचिता की राजनीति की ओर लौटें। अपने वैचारिक या राजनीतिक विरोधी की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए झूठ का सहारा न लें। समाज में झूठी, फर्जी और भ्रामक जानकारी का प्रचार-प्रसार न करें। इस प्रकार की प्रवृत्ति न तो उनके लिए ठीक है, न उनकी राजनीति के लिए और न ही समाज के लिए ठीक है।


शनिवार, 30 सितंबर 2017

सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास


विजयादशमी उत्सव के उद्बोधन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि निर्भयतापूर्वक सज्जनशक्ति को आगे आना होगा, समाज को निर्भय, सजग और प्रबुद्ध बनना होगा
 विश्व  के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी उत्सव का बहुत महत्त्व है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर ही संघ की स्थापना स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। विजयादशमी के अवसर पर होने वाला सरसंघचालक का उद्बोधन देश-दुनिया में भारतवंदना में रत स्वयंसेवकों के लिए पाथेय का काम करता है। इस उद्बोधन से संघ की वर्तमान नीति भी स्पष्ट होती है, इसलिए स्वयंसेवकों के अलावा बाकी अन्य लोग भी सरसंघचालक के उद्बोधन को ध्यानपूर्वक सुनते हैं। इस दशहरे पर संघ के वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में महत्त्वपूर्ण विषयों पर संघ के दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया। अपने इस उद्बोधन में उन्होंने समाज की सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास किया है। समाज में सज्जन लोगों का प्रतिशत और उनकी शक्ति अधिक है, लेकिन महावीर हनुमान की तरह समाज को अपनी सज्जनशक्ति का स्मरण नहीं है। रामकथा में माता सीता की खोज पर निकले हनुमान सहित अन्य वीर जब समुद्र के विस्तार को देखते हैं, तब उनका उत्साह कम हो जाता है। तब जामवन्त ने हनुमान को उनके पराक्रम से परिचित कराया था। जब पराक्रमी हनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण होता है, तब 100 योजन विशाल समुद्र भी उनके मार्ग में बाधा नहीं बन सका। जब समाज की सज्जनशक्ति को अपने बल का परिचय प्राप्त हो जाएगा, तब भारत को विश्वगुरु की खोयी हुई प्रतिष्ठा प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता। 

शनिवार, 23 सितंबर 2017

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना

 माननीय  न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले मं  तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा - 'सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?' इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है, लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नक्सली हिंसा पर खामोशी

 देश  में असहिष्णुता और हिंसा पर आजकल बहुत बहस हो रही है। विशेषकर, जब किसी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े या विशेष समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, तब असहिष्णुता का भूत अचानक से प्रकट होता है। जबकि अन्य हत्याओं पर न हमें असहिष्णुता दिखाई देती है और नहीं किसी प्रकार हमारे माथे पर बल पड़ता है। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में हिंदू समाज के साथ हो रही ज्यादती भी असहिष्णुता की श्रेणी में नहीं आती है और केरल में एक के बाद एक राष्ट्रीय विचारधारा से संबंद्ध व्यक्तियों की हत्याएं भी हमें विचलित नहीं करती हैं। नक्सली हिंसा पर तो तमाम बुद्धिजीवी गजब की खामोशी साध जाते हैं। अनेक अवसर पर तो प्रसन्नता भी जाहिर करते हैं। नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या के दौरान अपने यह कम्युनिस्टों को जश्न मनाते देखा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता, लेखक एवं पत्रकार नक्सलियों की हिंसा का बचाव करते दिखते हैं। जबकि यह खूंखार किस्म के असहिष्णु हैं। कम्युनिस्ट नक्सलियों का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से दोनों सहोदर हैं। नक्सलियों की बर्बरता को देखकर इन्हें किसी भी प्रकार आतंकवादियों से कमतर नहीं माना जा सकता। बीते रविवार झारखंड के गुमला में पति-पत्नी को गोलियों से भूनकर इस बात को सिद्ध कर दिया है।

रोहिंग्या मुद्दे पर सरकार का पक्ष राष्ट्रहित में

कश्मीरी पंडितों को उनकी भूमि और न्याय दिलाये बिना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना, अपने लोगों के साथ बेईमानी है. ये लोग वर्षों से तम्बू में सो रहे हैं, पहले इनके लिए आवाज़ बुलंद करो.
 यह  सुखद है कि राष्ट्रहित में वर्तमान सरकार कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारें प्रत्येक मामले को पहले वोट की तराजू पर तोलती थीं और उस वजन के आधार पर निर्णय करती थीं। जबकि वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर अपने निर्णयों से बताया है कि उसके लिए राष्ट्रहित सबसे पहले है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सरकार ने अनेक प्रकार की आलोचनाओं की चिंता न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपना स्पष्ट पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने बीते सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से रोहिंग्या मुद्दे पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें प्रत्यर्पित करने का निर्णय सरकार का नीतिगत फैसला है। केंद्र सरकार ने बिना लाग-लपेट के कह दिया है कि उनमें से कुछ का संबंध पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों से है। 
          शीर्ष न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष जानना चाहा, तब केंद्र सरकार ने अपना उक्त पक्ष रखा और कहा कि यह देश हित में लिया गया एक 'आवश्यक कार्यकारी' फैसला है। केंद्र सरकार का कहना गलत नहीं है कि कई रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध आतंकवादी समूहों से है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। घोर शांतिप्रिय बौद्ध बाहुल्य देश म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय को लेकर जिस प्रकार का वातावरण बना है, वह भी इस ओर इशारा करता है। शरणार्थियों को आश्रय नहीं देने और संप्रग सरकार के समय में आ चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के निर्णय की आलोचना करने से पहले हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि आखिर वह कौन-से कारण हैं कि इस्लामिक देश भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए तैयार नहीं है।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

पतन का प्रतीक अमर्यादित भाषा

 विरोध  की भाषा बताती है कि वह कितना नैतिक है और कितना अनैतिक। जब विरोधी भाषा की मर्यादा को त्याग कर गली-चौराहे की भाषा में बात करने लगें, समझिए कि उनका विरोध खोखला है। उनका विरोध चिढ़ में बदल चुका है। अपशब्दों का उपयोग करने वाला व्यक्ति भीतर से घृणा और नफरत से भरा होता है। वह पूरी तरह कुंठित हो चुका होता है। अमर्यादित भाषा से वह अपने भीतर की कुंठा को ही प्रकट करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की भाषा में उपरोक्त स्थिति दिखाई देती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके एवं वर्तमान में कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों जिस प्रकार के अपशब्दों का उपयोग देश के प्रधानमंत्री के लिए किया था, उसी परिपाटी को अब वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने आगे बढ़ाया है। शब्द इस प्रकार के हैं कि उनका सार्वजनिक उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। मनीष तिवारी ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस के नेता किस स्तर तक नरेन्द्र मोदी के प्रति घृणा का भाव रखते हैं।

सोमवार, 18 सितंबर 2017

अफसरी से बाहर आओ अल्फोंस साहब

 'भूखे  तो नहीं मर रहे हैं ना, इसलिए चुकाइए टैक्स।' केंद्रीय पर्यटन मंत्री अल्फोंस कन्ननथम का यह कथन बताता है कि वह मंत्री तो बन गए हैं, लेकिन अभी उनकी अफसरी नहीं छूटी है। उनके इस कथन से यह भी साबित होता है कि वह देश-समाज की वास्तविकता से परिचत नहीं हैं। उन्हें भारतीय जनमानस की समझ भी नहीं है। उनकी राजनीतिक समझ भी शून्य है। अन्यथा इस प्रकार का बयान नहीं देते। चूँकि वह एक नेता के रूप में जनता के बीच कभी रहे नहीं, सीधे मंत्री बने हैं, इसलिए उन्हें नहीं पता कि इस प्रकार के बयान जनता के मन पर क्या असर छोड़ते हैं और पार्टी को अनर्गल बयानों का क्या नुकसान उठाना पड़ता है। यह पहली बार नहीं है जब अल्फोंस अपने कथन से स्वयं तो विवाद में आए ही, बल्कि भाजपा के सामने भी संकट खड़ा किया है। इससे पूर्व मंत्री बनने के तत्काल बाद ही वह अनावश्यक रूप से बीफ के विषय में भी बोल चुके हैं।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी की अस्मिता का प्रश्न

 सर्वसमावेशी  भाषा होना हिन्दी का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। हिन्दी ने बड़ी सहजता और सरलता से, समय के साथ चलते हुए कई बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने आंचल में समेट लिया है। पहले से ही समृद्ध हिन्दी का शब्द भण्डार और अधिक समृद्ध हो गया है। हिन्दी को कभी भी अन्य भाषाओं के शब्दों से परहेज नहीं रहा। भारतीय भाषाएं तो उसकी अपनी सगी बहनें हैं, उनके साथ तो हिन्दी का लेन-देन स्वाभाविक ही है। लेकिन, हिन्दी ने बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी बिना किसी फेरबदल के, उनके स्वाभाविक सौंदर्य के साथ स्वीकार किया है। वास्तव में, हिन्दी जीवंत भाषा है। वह समय के साथ बही है, कहीं ठहरी नहीं। जीवंत भाषाएं शब्दों की छुआछूत नहीं मानती हैं। शब्द जिधर से भी आए, हिन्दी ने आत्मसात कर लिए। शब्दों का आना, हिन्दी के आंचल में जगह पाना, स्वाभाविक और स्वत: था, तब तक तो ठीक था लेकिन, जब से बाहरी भाषाओं के शब्दों को हिन्दी के आंचल में जबरन ठेला जाने लगा है, अस्वाभाविक हो गया है। यह हिन्दी की अस्मिता का प्रश्न बन गया है। ऐसी स्थिति में प्रश्र यह रह ही नहीं जाता है- 'हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रचलन हिन्दी के लिए आशीर्वाद है या अभिशाप? '

नये भारत में वंशवाद को स्थान नहीं

 अमेरिका  के बर्कले विश्वविद्यालय में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ओर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा का प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने एक बार फिर अपनी अपरिपक्वता को जाहिर किया है। वंशवाद पर राहुल गांधी का बयान बताता है कि उन्हें देश के जनमानस की कतई समझ नहीं है। अब राजा-महाराजाओं का जमाना नहीं है। यह लोकतंत्र है। लोकतंत्र में कोई भी समझदार व्यक्ति वंशवाद का समर्थक नहीं होता। लोकतंत्र और वंशवाद परस्पर विरोधाभासी हैं। नये भारत में तो वंशवाद के लिए किंचित भी स्थान नहीं है। वंशवाद के समर्थन में राहुल गांधी ने जिनके नाम बताए, उन्हें भी समाज की स्वीकृति नहीं है। अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश की जनता ने अस्वीकार कर दिया। अभिषेक बच्चन भी अपने पिता, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के प्रभाव के बाद भी भारतीय सिनेमा में स्थान नहीं बना पाए हैं। 'बच्चन' उपनाम होने के बाद भी अभिषेक को सिनेप्रेमियों ने नकार दिया है। अर्थात् राहुल गांधी के वंशवाद के गुब्बारे की हवा तो खुद ही निकाल ली। उनका स्वयं का उदाहरण भी इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि देश की जनता वंशवाद के नाम पर हर किसी को सहन करने के लिए तैयार नहीं है।

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