शनिवार, 23 सितंबर 2017

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना

 माननीय  न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले मं  तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? क्या यह स्पष्टतौर पर दो समुदायों को दुश्मन बनाने वाला फैसला नहीं था? यकीनन उत्तर है- हाँ। न्यायालय में भी यही सिद्ध हुआ है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध के निर्णय के विरुद्ध सुनवाई करते हुए कलकत्ता न्यायालय ने ममता सरकार को जो आईना दिखाया है, उसमें उनकी राजनीति की असल तस्वीर बहुत स्पष्ट नजर आ रही है। न्यायालय ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए एक गंभीर प्रश्न पूछा - 'सौहार्द खतरे में होने की आशंका जता कर क्या सांप्रदायिक विभेद पैदा नहीं किया जा रहा है?' इस प्रश्न का जो उत्तर है, वह सब जानते हैं। सरकार भी जानती है, लेकिन उसका उत्तर देने की ताकत उसमें नहीं है। न्यायालय के मात्र इसी प्रश्न ने ममता सरकार की समूची राजनीति को उधेड़ कर रख दिया।
          कलकत्ता उच्च न्यायालय ने जो प्रश्न उठाया है, सामान्य समाज की चिंता भी वही है। पश्चिम बंगाल में ही नहीं, अपितु देश के अन्य हिस्सों में भी ममता सरकार का निर्णय चर्चा का विषय बना हुआ था। जब भारत के अन्य राज्यों में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन और मुहर्रम एक साथ मनाए जा सकते हैं, तब पश्चिम बंगाल में दुर्गा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसी मुद्दे पर पिछले वर्ष भी न्यायालय में ममता बनर्जी को सबक मिला था। पिछले वर्ष भी उन्होंने ऐसा ही तुगलकी फरमान जारी कर दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाया था। हिंदू समाज ने तब भी न्यायालय की शरण ली और न्याय प्राप्त किया था। कोई भी निष्ठावान और निष्पक्ष राजनेता एक ही भूल बार-बार नहीं दोहराता है। किंतु, जिसके मन में कपट हो, जिसकी नीति ही 'फूट डालो और शासन करो' पर आधारित हो, वह भला कहाँ और किस न्यायालय के सबक को याद रखता है। ममता बनर्जी को हिंदुओं की चिंता नहीं है, क्योंकि वह वोटबैंक नहीं है। एक लोककल्याणकारी सरकार के निर्वाचन का जब अवसर आता है, तब हिंदू जाति, व्यक्ति, पसंद और पार्टी के नाम पर बँट जाता है। बहुसंख्यक होकर भी वह ऐसी सरकार नहीं चुन पाता, जो 'सबका विकास-सबका साथ' की अवधारणा पर काम करे। पश्चिम बंगाल में 27 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं। बांग्लादेश से आए अवैध घुसपैठिये भी सबसे अधिक पश्चिम बंगाल में ही हैं। ममता बनर्जी इन्हीं मुसलमानों के एकजुट वोट के आधार पर पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपना सिक्का चला रही हैं। एक आंकड़े के अनुसार पिछले चुनाव में ममता बनर्जी को जितना वोट मिला, उसमें लगभग 51 प्रतिशत वोट मुस्लिम समाज का है। ममता बनर्जी अपने इस वोटबैंक को खुश करने के लिए ही हिंदू समाज को चोट पहुँचा रही हैं। इसीलिए उन्हें पिछले वर्ष का न्यायालय का सबक याद नहीं रहा। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर उन्हें जो संदेश देना था, वह दे चुकीं। 
          ममता बनर्जी को यह समझना चाहिए कि वह जिस प्रकार की विस्फोटक राजनीति कर रही हैं, उससे उन्हें तात्कालिक राजनीतिक लाभ तो मिल सकता है। किंतु, इसका जो सामाजिक नुकसान होगा, वह सबके लिए घातक और दीर्घगामी होगा। आज जो आग सुलगाई जा रही है, वह सबको जला कर भस्म कर देगी, बंगाल की पहचान को भी। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार है। यह समूचे बंगाल की सांस्कृतिक पहचान भी है। सत्ता की ताकत के बल पर दुर्गा पूजा में बाधा उत्पन्न करना पश्चिम बंगाल की पहचान और संस्कृति को चोट पहुँचाना है। यह संविधान के विरुद्ध भी है। संविधान ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति और धर्म का पालन करने का मौलिक अधिकार प्रदान किया है। न्यायालय ने इस संदर्भ में टिप्पणी भी की है कि आप अपनी आशंका के आधार पर किसी के मौलिक अधिकार को नहीं छीन सकते। आखिर सरकार ने यह कैसे तय कर लिया कि विसर्जन और मुहर्रम साथ होने से कानून व्यवस्था बिगड़ेगी और उसका एक ही उपाय है कि विसर्जन पर प्रतिबंद लगा दिया जाए? इस संदर्भ ने न्यायालय ने उचित ही कहा है कि प्रशासन ने अपनी दुर्बलता छिपाने के लिए विसर्जन पर रोक लगाई है। हालाँकि, वास्तविकता सिर्फ इतनी नहीं है कि प्रशासन कमजोर है। यह बात सही है कि पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक और कट्टरवादी ताकतों के सामने प्रशासन ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए हैं। पिछले कुछ वर्षों में वहाँ जिस तरह से सांप्रदायिक घटनाएं घटी हैं, वह सब इस बात की गवाही देती हैं। 
          'सोनार बांग्ला' को 'बर्बाद बांग्ला' बनाने की ओर तेजी से अग्रसर ममता बनर्जी को चाहिए कि देश राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की दुर्गति से सबक ले। कांग्रेस के सिकुडऩे में बहुत हद तक उसकी तुष्टीकरण की राजनीति ही प्रमुख कारण है। यह स्वयं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मूल्याकंन के बाद स्वीकार करते हैं। किसी भी सरकार की जिम्मेदारी होती है कि सबको समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं। किसी के प्रति विशेष प्रेम प्रकट करना और किसी का तिरस्कार करना, एक निष्पक्ष सरकार की पहचान नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में पक्षपाती सरकार को सत्ता में रहने का कोई हक नहीं। इस पूरे मामले में सरकार कोई ठोस पक्ष नहीं रख सकी है। वह एक ही बात बार-बार रट रही है कि सांप्रदायिक सौहार्द बिगडऩे की आशंका थी। यदि सरकार को किसी प्रकार से सांप्रदायिक सौहार्द बिगडऩे की आशंका थी, तब वह पुलिस प्रशासन को चौकस कर सकती थी। विसर्जन और मुहर्रम के जुलूस के दौरान अधिक पुलिस बल तैनात करके भी स्थितियों को बिगडऩे से रोका जा सकता था। यदि राज्य को अपने पुलिस बल पर भरोसा नहीं था, तब केंद्र से सुरक्षा बल की माँग की जा सकती थी। अन्य अवसरों पर भी यही उपाय किया जाता है। दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना कतई इसका समाधान नहीं था। इस प्रकार सरकार ने समाज में अच्छा संदेश नहीं दिया। सरकार के इस निर्णय से कहीं न कहीं दो समुदायों के मन में विभेद की बात आई है। लोकतंत्र में इस प्रकार के तानाशाही निर्णयों के लिए किंचित भी जगह नहीं होनी चाहिए। उम्मीद है कि एक ही गलती के लिए दूसरी बार न्यायालय से फटकार के बाद ममता सरकार कोई सबक लेगी। सबको एक दृष्टि से देखा जाएगा और सबको समान अवसर उपलब्ध कराया जाएगा। हालाँकि, न्यायालय के निर्णय के बाद उनके जिस प्रकार के वक्तव्य आए हैं, उन्हें सुनकर उनसे ऐसी उम्मीद करना निरर्थक है।
राजएक्सप्रेस में प्रकाशित लेख

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नक्सली हिंसा पर खामोशी

 देश  में असहिष्णुता और हिंसा पर आजकल बहुत बहस हो रही है। विशेषकर, जब किसी कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े या विशेष समुदाय के व्यक्ति के साथ हिंसा होती है, तब असहिष्णुता का भूत अचानक से प्रकट होता है। जबकि अन्य हत्याओं पर न हमें असहिष्णुता दिखाई देती है और नहीं किसी प्रकार हमारे माथे पर बल पड़ता है। पश्चिम बंगाल की ममता सरकार में हिंदू समाज के साथ हो रही ज्यादती भी असहिष्णुता की श्रेणी में नहीं आती है और केरल में एक के बाद एक राष्ट्रीय विचारधारा से संबंद्ध व्यक्तियों की हत्याएं भी हमें विचलित नहीं करती हैं। नक्सली हिंसा पर तो तमाम बुद्धिजीवी गजब की खामोशी साध जाते हैं। अनेक अवसर पर तो प्रसन्नता भी जाहिर करते हैं। नक्सलियों द्वारा 76 जवानों की हत्या के दौरान अपने यह कम्युनिस्टों को जश्न मनाते देखा है। कम्युनिस्ट विचारधारा के नेता, लेखक एवं पत्रकार नक्सलियों की हिंसा का बचाव करते दिखते हैं। जबकि यह खूंखार किस्म के असहिष्णु हैं। कम्युनिस्ट नक्सलियों का बचाव इसलिए करते हैं, क्योंकि वैचारिक रूप से दोनों सहोदर हैं। नक्सलियों की बर्बरता को देखकर इन्हें किसी भी प्रकार आतंकवादियों से कमतर नहीं माना जा सकता। बीते रविवार झारखंड के गुमला में पति-पत्नी को गोलियों से भूनकर इस बात को सिद्ध कर दिया है।

रोहिंग्या मुद्दे पर सरकार का पक्ष राष्ट्रहित में

कश्मीरी पंडितों को उनकी भूमि और न्याय दिलाये बिना, रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए सरकार पर दबाव बनाना, अपने लोगों के साथ बेईमानी है. ये लोग वर्षों से तम्बू में सो रहे हैं, पहले इनके लिए आवाज़ बुलंद करो.
 यह  सुखद है कि राष्ट्रहित में वर्तमान सरकार कठोर कदम उठाने में हिचकिचाती नहीं है। पूर्ववर्ती सरकारें प्रत्येक मामले को पहले वोट की तराजू पर तोलती थीं और उस वजन के आधार पर निर्णय करती थीं। जबकि वर्तमान सरकार ने अनेक अवसरों पर अपने निर्णयों से बताया है कि उसके लिए राष्ट्रहित सबसे पहले है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी सरकार ने अनेक प्रकार की आलोचनाओं की चिंता न करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपना स्पष्ट पक्ष रखा है। केंद्र सरकार ने बीते सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय से रोहिंग्या मुद्दे पर हस्तक्षेप न करने का आग्रह करते हुए कहा कि उन्हें प्रत्यर्पित करने का निर्णय सरकार का नीतिगत फैसला है। केंद्र सरकार ने बिना लाग-लपेट के कह दिया है कि उनमें से कुछ का संबंध पाकिस्तानी आतंकवादी गुटों से है। 
          शीर्ष न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार वापस भेजने के केंद्र के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने जब इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष जानना चाहा, तब केंद्र सरकार ने अपना उक्त पक्ष रखा और कहा कि यह देश हित में लिया गया एक 'आवश्यक कार्यकारी' फैसला है। केंद्र सरकार का कहना गलत नहीं है कि कई रोहिंग्या मुसलमानों का संबंध आतंकवादी समूहों से है। ऐसे अनेक मामले सामने आ चुके हैं। घोर शांतिप्रिय बौद्ध बाहुल्य देश म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय को लेकर जिस प्रकार का वातावरण बना है, वह भी इस ओर इशारा करता है। शरणार्थियों को आश्रय नहीं देने और संप्रग सरकार के समय में आ चुके रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस भेजने के सरकार के निर्णय की आलोचना करने से पहले हमें यह विचार जरूर करना चाहिए कि आखिर वह कौन-से कारण हैं कि इस्लामिक देश भी रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए तैयार नहीं है।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

पतन का प्रतीक अमर्यादित भाषा

 विरोध  की भाषा बताती है कि वह कितना नैतिक है और कितना अनैतिक। जब विरोधी भाषा की मर्यादा को त्याग कर गली-चौराहे की भाषा में बात करने लगें, समझिए कि उनका विरोध खोखला है। उनका विरोध चिढ़ में बदल चुका है। अपशब्दों का उपयोग करने वाला व्यक्ति भीतर से घृणा और नफरत से भरा होता है। वह पूरी तरह कुंठित हो चुका होता है। अमर्यादित भाषा से वह अपने भीतर की कुंठा को ही प्रकट करता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की भाषा में उपरोक्त स्थिति दिखाई देती है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके एवं वर्तमान में कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने पिछले दिनों जिस प्रकार के अपशब्दों का उपयोग देश के प्रधानमंत्री के लिए किया था, उसी परिपाटी को अब वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने आगे बढ़ाया है। शब्द इस प्रकार के हैं कि उनका सार्वजनिक उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। मनीष तिवारी ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल कर स्पष्ट कर दिया है कि कांग्रेस के नेता किस स्तर तक नरेन्द्र मोदी के प्रति घृणा का भाव रखते हैं।

सोमवार, 18 सितंबर 2017

अफसरी से बाहर आओ अल्फोंस साहब

 'भूखे  तो नहीं मर रहे हैं ना, इसलिए चुकाइए टैक्स।' केंद्रीय पर्यटन मंत्री अल्फोंस कन्ननथम का यह कथन बताता है कि वह मंत्री तो बन गए हैं, लेकिन अभी उनकी अफसरी नहीं छूटी है। उनके इस कथन से यह भी साबित होता है कि वह देश-समाज की वास्तविकता से परिचत नहीं हैं। उन्हें भारतीय जनमानस की समझ भी नहीं है। उनकी राजनीतिक समझ भी शून्य है। अन्यथा इस प्रकार का बयान नहीं देते। चूँकि वह एक नेता के रूप में जनता के बीच कभी रहे नहीं, सीधे मंत्री बने हैं, इसलिए उन्हें नहीं पता कि इस प्रकार के बयान जनता के मन पर क्या असर छोड़ते हैं और पार्टी को अनर्गल बयानों का क्या नुकसान उठाना पड़ता है। यह पहली बार नहीं है जब अल्फोंस अपने कथन से स्वयं तो विवाद में आए ही, बल्कि भाजपा के सामने भी संकट खड़ा किया है। इससे पूर्व मंत्री बनने के तत्काल बाद ही वह अनावश्यक रूप से बीफ के विषय में भी बोल चुके हैं।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

हिन्दी की अस्मिता का प्रश्न

 सर्वसमावेशी  भाषा होना हिन्दी का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। हिन्दी ने बड़ी सहजता और सरलता से, समय के साथ चलते हुए कई बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने आंचल में समेट लिया है। पहले से ही समृद्ध हिन्दी का शब्द भण्डार और अधिक समृद्ध हो गया है। हिन्दी को कभी भी अन्य भाषाओं के शब्दों से परहेज नहीं रहा। भारतीय भाषाएं तो उसकी अपनी सगी बहनें हैं, उनके साथ तो हिन्दी का लेन-देन स्वाभाविक ही है। लेकिन, हिन्दी ने बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी बिना किसी फेरबदल के, उनके स्वाभाविक सौंदर्य के साथ स्वीकार किया है। वास्तव में, हिन्दी जीवंत भाषा है। वह समय के साथ बही है, कहीं ठहरी नहीं। जीवंत भाषाएं शब्दों की छुआछूत नहीं मानती हैं। शब्द जिधर से भी आए, हिन्दी ने आत्मसात कर लिए। शब्दों का आना, हिन्दी के आंचल में जगह पाना, स्वाभाविक और स्वत: था, तब तक तो ठीक था लेकिन, जब से बाहरी भाषाओं के शब्दों को हिन्दी के आंचल में जबरन ठेला जाने लगा है, अस्वाभाविक हो गया है। यह हिन्दी की अस्मिता का प्रश्न बन गया है। ऐसी स्थिति में प्रश्र यह रह ही नहीं जाता है- 'हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रचलन हिन्दी के लिए आशीर्वाद है या अभिशाप? '

नये भारत में वंशवाद को स्थान नहीं

 अमेरिका  के बर्कले विश्वविद्यालय में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ओर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा का प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने एक बार फिर अपनी अपरिपक्वता को जाहिर किया है। वंशवाद पर राहुल गांधी का बयान बताता है कि उन्हें देश के जनमानस की कतई समझ नहीं है। अब राजा-महाराजाओं का जमाना नहीं है। यह लोकतंत्र है। लोकतंत्र में कोई भी समझदार व्यक्ति वंशवाद का समर्थक नहीं होता। लोकतंत्र और वंशवाद परस्पर विरोधाभासी हैं। नये भारत में तो वंशवाद के लिए किंचित भी स्थान नहीं है। वंशवाद के समर्थन में राहुल गांधी ने जिनके नाम बताए, उन्हें भी समाज की स्वीकृति नहीं है। अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश की जनता ने अस्वीकार कर दिया। अभिषेक बच्चन भी अपने पिता, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के प्रभाव के बाद भी भारतीय सिनेमा में स्थान नहीं बना पाए हैं। 'बच्चन' उपनाम होने के बाद भी अभिषेक को सिनेप्रेमियों ने नकार दिया है। अर्थात् राहुल गांधी के वंशवाद के गुब्बारे की हवा तो खुद ही निकाल ली। उनका स्वयं का उदाहरण भी इस बात को समझने के लिए पर्याप्त है कि देश की जनता वंशवाद के नाम पर हर किसी को सहन करने के लिए तैयार नहीं है।

रविवार, 10 सितंबर 2017

गौरी लंकेश हत्याकांड : जवाब माँगते कुछ सवाल

गौरी लंकेश क्या लिखती थीं, उसका बहुत छोटा उदहारण है यह
 लोकतंत्र  और सभ्य समाज में हत्या के लिए किंचित भी स्थान नहीं है। किसी भी व्यक्ति की हत्या मानवता के लिए कलंक है। चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो या फिर लेखक, पत्रकार और राजनीतिक दल का कार्यकर्ता। हत्या और हत्यारों का विरोध ही किया जाना चाहिए। लोकतंत्र किसी भी प्रकार तानाशाही या साम्यवादी शासन व्यवस्था नहीं है, जहाँ विरोधी को खोज-खोज कर खत्म किया जाए। लोकतंत्र में वामपंथी कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या का विरोध ही किया जा सकता है, समर्थन नहीं। किंतु, जिस तरह से लंकेश की हत्या के तुरंत बाद पूरे देश में एक सुर से भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व को हत्यारा ठहराया गया, क्या यह उचित है? यह पत्रकारिता का धर्म तो कतई नहीं है। अनुमान के आधार पर निर्णय सुनाना कहाँ जायज है? पत्रकारों को तथ्यों के प्रकाश में अपने सवाल उछालने चाहिए। पत्रकारों का यह काम नहीं है कि न्यायाधीश बन कर या बिना जाँच-पड़ताल तत्काल किसी मामले में निर्णय सुना दें। आखिर किस आधार पर पत्रकारों ने एक सुर में भाजपा और आरएसएस को लंकेश की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया और देश में राष्ट्रीय विचारधारा के प्रति घृणा का वातावरण बनाने का प्रयास किया? क्या सिर्फ इसलिए कि वह कम्युनिस्टों की घोर समर्थक थीं और स्वयं को कॉमरेड कहती थीं? क्या सिर्फ इसलिए कि गौरी लंकेश अपने फेसबुक-ट्वीटर अकांउट और अपनी पत्रिका 'लंकेश पत्रिके' में ज्यादातर भाजपा, आरएसएस एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लिखती थीं?

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

गौरी लंकेश हत्याकाण्ड : विरोध या सियासत

 वामपंथी  पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद देश में जिस प्रकार का वातावरण बनाया गया है, वह आश्चर्यचकित करता है। नि:संदेह हत्या का विरोध किया जाना चाहिए। सामान्य व्यक्ति की हत्या भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। समवेत स्वर में हत्याओं का विरोध किया जाना चाहिए। लेकिन, गौरी लंकेश की हत्या के बाद उठ रही विरोध की आवाजों से पत्रकार की हत्या के विरुद्ध आक्रोश कम वैचारिक राजनीति का शोर अधिक आ रहा है। आप आगे पढ़े, उससे पहले एक बार फिर दोहरा देता हूं कि सभ्य समाज में हत्याएं कलंक से अधिक कुछ नहीं। हत्या की निंदा ही की जा सकती है और हत्यारों के लिए कड़ी सजा की माँग। बहरहाल, लंकेश की हत्या के तत्काल बाद, बिना किसी जाँच पड़ताल के किसी राजनीतिक दल और सामाजिक-वैचारिक संगठन को हत्यारा ठहरा देने की प्रवृत्ति को क्या उचित कहा जा सकता है? पत्रकार और लेखक बिरादरी के लोग इस प्रकार के निर्णय देंगे, तब विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही इस बिरादरी के प्रति अविश्वास का वातावरण और अधिक गहराएगा। इस प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप राजनीतिक कार्यकर्ता भी नहीं लगाते। भारत में असहमति के स्तर को हम कितना नीचे ले जाना चाहते हैं? बिना किसी पड़ताल के हम कैसे इस निर्णय पर पहुँच सकते हैं कि गौरी लंकेश की हत्या उनके लिखने-पढ़ने और बोलने के कारण हुई है। क्या हत्या के और कोई कारण नहीं हो सकते? यदि हम लंकेश के भाई को सुने, तब हत्या के दूसरे कारण भी नजर आएंगे। उनके भाई ने तो हत्या में नक्सलियों के शामिल होने का संदेह जताया है।

रविवार, 3 सितंबर 2017

संस्कार की पाठशाला हैं महिलाएं एवं बुजुर्ग

हिन्दू गर्जना में प्रकाशित लेख
 भारतीय  परंपरा में परिवार व्यवस्था अद्धितीय है। हम जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति की पहली गुरु माँ और पहली पाठशाला परिवार होता है। परिवार संस्कार की पाठशाला है। परिवार में व्यक्ति का सामाजिक शिक्षण होता है। यहाँ हम जीवनमूल्य सीखते हैं। भारतीयता की धुरी परिवार अपने ढंग से मनुष्य को त्याग, सहयोग, सम्मान, दुलार, आत्मीयता, कर्तव्य और अनुशासन इत्यादि का पाठ पढ़ाते हैं। लेकिन, हमारा दुर्भाग्य है कि विरासत में प्राप्त अपनी सबसे बड़ी और सुघड़ रचना को हम छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। हम अपने शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र को ध्वस्त करने में व्यस्त हैं। आज समाज में हम मानवीयता का जो अवमूल्यन देख रहे हैं, उसका सबसे बड़ा कारण है परिवार व्यवस्था का कमजोर होना। जब हम भारत के प्राचीन इतिहास के पन्ने पलटने बैठते हैं, तब हमें ध्यान आता है कि हमारे यहाँ महिलाओं और बुजुर्गों का अत्यधिक सम्मान था। उनका अपमान तो बहुत दूर की बात थी, उनकी अनदेखी भी संभव नहीं थी। घर में उनका शीर्ष स्थान था। उनकी देखरेख में ही परिवार का संचालन होता था। लेकिन, आज इस प्रकार के परिवार की कल्पना भी मुश्किल है। हालाँकि हमारी परिवार व्यवस्था कमजोर जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। हमारी संस्कृति की ताकत है कि वह अनेक झंझावात सहकर भी अपने संस्कारों को बचाते हुए गतिमान है।

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